राजनीति पश्चिम बंगाल

केंद्रीय कानून से टकराव पर राष्ट्रपति ने 'एंटी-गुंडा' विधेयक लौटाया

पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित 'एंटी-गुंडा' विधेयक को राष्ट्रपति ने पुनर्विचार के लिए लौटा दिया है। केंद्र ने स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम, 1985 से टकराव का मुद्दा उठाया। 'गुंडा' की परिभाषा में एनडीपीएस अपराध शामिल करने से पीआईटीएनडीपीएस अधिनियम, 1988 के समानांतर निवारक निरोध व्यवस्था बन सकती है और अनुच्छेद 254 के तहत असंगति का प्रश्न उठ सकता है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, संशोधन के बाद विधेयक फिर विधानसभा में रखा जा सकता है। 6 अगस्त को कलकत्ता हाईकोर्ट ने तीन जनहित याचिकाएं समय-पूर्व बताकर खारिज कर दीं।

स्रोत

Indian Express — Cities · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#anti-goonda bill#west bengal#presidents assent#ndps act#calcutta high court

डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • The President returned West Bengal's 'anti-Goonda' Bill for reconsideration after the Centre flagged a conflict with the NDPS Act, 1985. — Attributed in source to the Centre's note; text of the note is quoted at length.
  • The Centre said the Bill's reference to NDPS offences may create a parallel preventive-detention mechanism and raise repugnancy under Article 254, and should be deleted from Section 2(d)(iii)(B). — Direct quotation from the Central government's note as reproduced in the source.
  • A senior state official said the Bill can be amended, re-tabled in the Assembly and sent again for the President's assent. — Attributed to an unnamed senior state administration official; not independently sourced.
  • On August 6, a Calcutta High Court division bench of Justice Tapabrata Chakraborty and Justice Partha Sarathi Chatterjee dismissed three PILs against the Bill as premature. — Specific date, bench and quoted observation appear in the source.
  • Suvendu Adhikari had claimed the Bill already had the Governor's assent and was being invoked over July 24 Esplanade violence, which the state's submission contradicts. — Source states this as its own finding based on the state's submission to the court; no direct quote of the earlier claims is provided.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

कागज़ पर यह आपत्ति तकनीकी दिखती है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार के लिए असहज झटका है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बार-बार यह दावा करने के बाद कि 'गुंडा दमन' कानून लागू हो चुका है और उसके तहत कार्रवाई हुई है, अब राज्य सरकार ने ही हाईकोर्ट में कहा है कि विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलनी बाकी है। केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी होने के बावजूद आपत्ति आना विपक्ष को तैयार हथियार देता है।

  • केंद्र का आधार राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि कानूनी सतर्कता है — एनडीपीएस अपराधों को शामिल करने से पीआईटीएनडीपीएस अधिनियम के समानांतर निवारक निरोध व्यवस्था बन सकती है और अनुच्छेद 254 के तहत विरोधाभास पैदा हो सकता है; यह सुधार कानून को अदालत में टिकाऊ भी बना सकता है।
  • फिर भी राजनीतिक छवि सरकार के विरुद्ध है: विपक्ष कह सकता है कि भाजपा का 'कड़ा कानून' वाला बड़ा वादा अब तक लागू ही नहीं हो पाया।
  • मौजूदा कानून के तहत कार्रवाई का दावा और अदालत में यह कहना कि विधेयक अभी कानून नहीं बना — यही विरोधाभास सबसे तीखा राजनीतिक मुद्दा और विश्वसनीयता पर सवाल बन सकता है।
  • तीन जनहित याचिकाओं को 'समय-पूर्व' कहकर खारिज करना सरकार को केवल अस्थायी राहत देता है, क्योंकि पीठ ने मंजूरी मिलने के बाद चुनौती का रास्ता खुला रखा है।
  • दुरुपयोग न होने के मुख्यमंत्री के आश्वासन के बावजूद, निवारक गिरफ्तारी और एक वर्ष तक जिले से बाहर रखने के प्रावधान विपक्ष के अभियान का केंद्र बने रहने की संभावना है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि संशोधित विधेयक कितनी तेज़ी से विधानसभा में वापस आता है, एनडीपीएस संदर्भ हटाया जाता है या नहीं, और मंजूरी मिलते ही नई कानूनी चुनौतियाँ दाखिल होती हैं या नहीं।

यह खबर राष्ट्रपति की आपत्ति के पीछे किसी राजनीतिक मंशा को स्थापित नहीं करती, न ही यह बताती है कि संशोधन कैसे होंगे, प्रक्रिया में कितना समय लगेगा या अंत में मंजूरी मिलेगी या नहीं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार ने असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश के लिए 'पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों का नियंत्रण विधेयक, 2026' जून में पेश किया था, जिसे 'एंटी-गुंडा' या 'गुंडा दमन' विधेयक कहा जा रहा है। विधेयक में 'गुंडा' की परिभाषा, निवारक गिरफ्तारी तथा किसी क्षेत्र/जिले में एक वर्ष तक प्रवेश पर रोक के प्रावधान हैं। राष्ट्रपति ने केंद्र की आपत्ति के बाद इसे पुनर्विचार के लिए लौटा दिया है, क्योंकि यह एनडीपीएस अधिनियम, 1985 और पीआईटीएनडीपीएस अधिनियम, 1988 से टकराता प्रतीत होता है। स्रोत के अनुसार मुख्यमंत्री शुवेंदु अधिकारी बार-बार यह दावा करते रहे कि यह कानून बन चुका है, जबकि राज्य ने हाईकोर्ट में बताया कि राष्ट्रपति की स्वीकृति अभी लंबित है।

मुख्य तथ्य

  • राष्ट्रपति ने पश्चिम बंगाल के 'एंटी-गुंडा' विधेयक पर आपत्ति दर्ज करते हुए उसे पुनर्विचार के लिए राज्य को लौटा दिया।
  • केंद्र का कहना है कि विधेयक की धारा 2(d)(iii)(B) में एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के अपराधों का उल्लेख हटाया जाए, ताकि दोहराव न हो।
  • केंद्र के अनुसार यह प्रावधान पीआईटीएनडीपीएस अधिनियम, 1988 के निवारक निरोध ढांचे के समानांतर व्यवस्था बना सकता है और अनुच्छेद 254 के तहत असंगति का प्रश्न उठा सकता है।
  • 'पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों का नियंत्रण विधेयक, 2026' जून में विधानसभा में पेश किया गया था।
  • विधेयक में 'गुंडा' को निर्दिष्ट क्षेत्र/जिले से बाहर करने और एक वर्ष से अधिक नहीं की अवधि तक वहाँ लौटने पर रोक का प्रावधान है।
  • यह आदेश जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर, या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत डीआईजी रैंक से नीचे का न हो, ऐसा पुलिस अधिकारी दे सकता है।
  • 6 अगस्त को कलकत्ता हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी की खंडपीठ ने विधेयक को चुनौती देने वाली तीन जनहित याचिकाएँ समय-पूर्व बताकर खारिज कीं।
  • राज्य ने हाईकोर्ट को बताया कि विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं मिली है, इसलिए वह कानून नहीं बना है।

समयरेखा

  1. जूनभाजपा सरकार ने 'पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों का नियंत्रण विधेयक, 2026' विधानसभा में पेश किया।
  2. 24 जुलाईएस्प्लानेड में विरोध मार्च के दौरान हिंसा; अधिकारी ने विधानसभा में दावा किया कि आरोपियों पर 'गुंडा दमन कानून' लगाया गया।
  3. 6 अगस्तकलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विधेयक को चुनौती देने वाली तीन जनहित याचिकाएँ समय-पूर्व बताकर खारिज कीं।
  4. स्रोत में तारीख नहीं दी गईकेंद्र की आपत्ति के बाद राष्ट्रपति ने विधेयक पुनर्विचार हेतु लौटाया; संशोधन के बाद इसे फिर विधानसभा में रखा जा सकता है।

किसका दाँव

  • पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार / मुख्यमंत्री शुवेंदु अधिकारी — कानून को शीघ्र लागू करना चाहती है; राष्ट्रपति द्वारा विधेयक लौटाना स्रोत के अनुसार सरकार के लिए झटका है।
  • राष्ट्रपति — विधेयक पर स्वीकृति देने या पुनर्विचार के लिए लौटाने का अधिकार; इस मामले में आपत्ति दर्ज की।
  • केंद्र सरकार — एनडीपीएस, 1985 और पीआईटीएनडीपीएस, 1988 जैसे केंद्रीय कानूनों के साथ दोहराव/टकराव रोकना।
  • कलकत्ता हाईकोर्ट — विधेयक की वैधता पर चुनौती की सुनवाई; स्वीकृति मिलने के बाद याचिकाकर्ता फिर आ सकते हैं।
  • विपक्ष व याचिकाकर्ता — निवारक गिरफ्तारी के प्रावधानों के दुरुपयोग और राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका।
  • 'गुंडा' घोषित किए जा सकने वाले व्यक्ति — क्षेत्र से निष्कासन, एक वर्ष तक प्रवेश पर रोक और गतिविधियों की रिपोर्टिंग की बाध्यता।

क्यों अहम है

यह मामला दिखाता है कि राज्य विधान जब केंद्रीय कानून के दायरे में प्रवेश करता है तो अनुच्छेद 254 के तहत असंगति का प्रश्न खड़ा होता है और राष्ट्रपति की स्वीकृति निर्णायक बन जाती है। साथ ही यह निवारक निरोध जैसी कठोर शक्तियों और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का प्रश्न उठाता है। राज्य द्वारा हाईकोर्ट में दी गई जानकारी ने मुख्यमंत्री के सार्वजनिक दावों का खंडन किया, जिससे विधायी प्रक्रिया की पारदर्शिता भी बहस में है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • अनुच्छेद 254 — केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच असंगति (रिपगनेंसी) से संबंधित प्रावधान।
  • एनडीपीएस अधिनियम, 1985 — स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ से जुड़ा केंद्रीय कानून।
  • पीआईटीएनडीपीएस अधिनियम, 1988 — नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार में लिप्त व्यक्तियों के निवारक निरोध का केंद्रीय कानून।
  • विवादित विधेयक: पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों का नियंत्रण विधेयक, 2026 (जून में पेश)।
  • विधेयक के तहत निष्कासन आदेश की अधिकतम अवधि — एक वर्ष से अधिक नहीं।
  • 6 अगस्त: कलकत्ता हाईकोर्ट ने तीन जनहित याचिकाएँ 'समय-पूर्व' कहकर खारिज कीं, क्योंकि विधेयक कानून नहीं बना था।

मेन्स दृष्टिकोण

पश्चिम बंगाल के 'एंटी-गुंडा' विधेयक का लौटाया जाना भारतीय संघवाद में विधायी अधिकारिता और निवारक निरोध की संवैधानिक सीमाओं—दोनों को रेखांकित करता है। केंद्र की आपत्ति का मूल यह है कि 'गुंडा' की परिभाषा में एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के अपराध शामिल करने से पीआईटीएनडीपीएस अधिनियम, 1988 के समानांतर एक दूसरी निवारक निरोध व्यवस्था बन जाएगी, जिससे अनुच्छेद 254 के तहत असंगति का प्रश्न उठेगा; इसलिए धारा 2(d)(iii)(B) से एनडीपीएस संदर्भ हटाने की सलाह दी गई। दूसरी ओर, जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर या डीआईजी स्तर के अधिकारी को किसी व्यक्ति को क्षेत्र से हटाने, एक वर्ष तक लौटने से रोकने और गतिविधियों की रिपोर्टिंग के लिए बाध्य करने की शक्ति देने पर विपक्ष ने राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका जताई, जिस पर मुख्यमंत्री ने दुरुपयोग न होने का आश्वासन दिया। न्यायिक पक्ष यह है कि हाईकोर्ट ने चुनौती को समय-पूर्व मानते हुए स्वीकृति मिलने के बाद पुनः आने की छूट दी। आगे का रास्ता, जैसा राज्य के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, केंद्रीय कानून से टकराव वाले प्रावधानों में आवश्यक संशोधन कर विधेयक को दोबारा विधानसभा में रखना और फिर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजना है—जिसमें कानून-व्यवस्था की आवश्यकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कसौटी रहेगा।

मुख्य शब्द

एंटी-गुंडा / गुंडा दमन विधेयक
पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों का नियंत्रण विधेयक, 2026 का प्रचलित नाम।
एनडीपीएस अधिनियम, 1985
स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ से जुड़े अपराधों पर केंद्रीय कानून।
पीआईटीएनडीपीएस अधिनियम, 1988
नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार में लगे व्यक्तियों के निवारक निरोध से जुड़ा विशिष्ट केंद्रीय कानून।
अनुच्छेद 254 (असंगति/रिपगनेंसी)
केंद्रीय व राज्य कानून में टकराव होने पर लागू संवैधानिक प्रावधान, जिसका मुद्दा केंद्र ने उठाया।
निवारक निरोध
अपराध होने से पहले ही आशंका के आधार पर व्यक्ति को हिरासत/प्रतिबंध में रखने की व्यवस्था।
जनहित याचिका (पीआईएल)
जनहित में दायर याचिका; यहाँ तीन पीआईएल विधेयक कानून न बनने के कारण समय-पूर्व मानी गईं।

अभ्यास प्रश्न

  1. अनुच्छेद 254 के तहत असंगति का सिद्धांत क्या है? पश्चिम बंगाल के 'एंटी-गुंडा' विधेयक के उदाहरण से समझाइए।
  2. निवारक निरोध के प्रावधान कानून-व्यवस्था की जरूरत और नागरिक स्वतंत्रता के बीच किस प्रकार तनाव पैदा करते हैं? चर्चा कीजिए।
  3. राज्य विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजने की प्रक्रिया और उससे जुड़े संघीय प्रश्नों का परीक्षण कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बररिप्लीज़ 2026 के अंत तक सैन फ्रांसिस्को संग्रहालय बंद करेगा →
← सभी ख़बरें