राजनीति उत्तर प्रदेश

25 नवंबर के बाद संसद में बसपा का कोई सदस्य नहीं

बसपा के एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का छह वर्ष का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो जाएगा, जिसके बाद पार्टी का संसद के दोनों सदनों में कोई प्रतिनिधित्व नहीं रहेगा। लोकसभा में पार्टी पहले से ही सदस्यविहीन है। 1989 में संसदीय पदार्पण के बाद ऐसा पहली बार होगा। चुनाव आयोग ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश की 10 रिक्त राज्यसभा सीटों पर चुनाव की घोषणा की, जिनमें आठ भाजपा और दो सपा के खाते में जाने के आसार हैं। 403 सदस्यीय विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं है।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • BSP will have no Rajya Sabha member after November 25, when lone MP Ramji Gautam's six-year term ends. — Date and name appear in the source; no external document cited.
  • Election Commission announced polls to 10 vacant Rajya Sabha seats from Uttar Pradesh on Tuesday. — Attributed to the Election Commission in the source; exact date not given beyond 'Tuesday'.
  • BJP is set to win eight of the 10 seats and the Samajwadi Party the remaining two. — Projection stated in the source without attribution to a named official.
  • BSP vote share fell from 6.17% (2009) to 4.19% (2014), 3.67% (2019) and 2.06% (2024). — Figures appear in the source; consistent with the narrative of decline.
  • SC voters make up an estimated 21% of UP, with Jatavs over 54% of them. — Presented as an estimate in the source with no agency named.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

25 नवंबर के बाद संसद के दोनों सदनों में बीएसपी का एक भी सदस्य न होना केवल गणित की बात नहीं है — 1989 में संसदीय सफर शुरू करने वाली दलित राजनीति की इस परियोजना के लिए यह एक संरचनात्मक मोड़ है। 403 सदस्यीय विधानसभा में एक भी विधायक न होने के कारण पार्टी के पास राज्यसभा में वापसी का संख्याबल ही नहीं है, यानी यह रिक्तता जल्दी भरने वाली नहीं है। उत्तर प्रदेश के चुनावी मौसम से ठीक पहले यह घटना बीजेपी, सपा और आजाद समाज पार्टी के बीच उस एससी वोट की होड़ को और तीखा कर देगी, जो कभी बीएसपी का आधार था।

  • संसद में उपस्थिति न रहने से पार्टी की राष्ट्रीय आवाज़ और दृश्यता घटेगी — जिसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल, संसाधनों और मीडिया में जगह पर पड़ता है।
  • खबर के आंकड़े ही लंबी गिरावट की कहानी कहते हैं: 2012 में 206 से 80 सीटें, 2014 में लोकसभा में शून्य, और 2024 में वोट शेयर 2.06% तक।
  • 10 में से आठ सीटें जीतने की स्थिति में बीजेपी को संख्या और नैरेटिव दोनों का लाभ है; दो सीटों के साथ सपा प्रमुख विपक्ष के रूप में अपनी जगह मज़बूत करती है।
  • यूपी में एससी वोट का अनुमान 21% और उसमें जाटव 54% से अधिक — कमज़ोर बीएसपी का यह आधार एकजुट होगा या बँटेगा, यही अगले विधानसभा चुनाव का निर्णायक सवाल है।
  • चुनाव आयोग की आगामी समीक्षा में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा जाने की आशंका चुनावी झटके के ऊपर एक प्रतीकात्मक और संस्थागत चोट है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि यूपी चुनाव से पहले बीएसपी अकेले लड़ने की राह पर बनी रहती है या गठबंधन की ओर बढ़ती है, और आयोग की समीक्षा में राष्ट्रीय दर्जे पर क्या होता है।

सांसद न होने से यह सिद्ध नहीं होता कि ज़मीन पर बीएसपी का वोट आधार बिखर गया है; जाटव वोट किस ओर जा रहा है, इसका कोई प्रमाण खबर में नहीं है और पार्टी की आगे की रणनीति भी स्पष्ट नहीं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना 1984 में कांशीराम ने दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए की थी और 1989 में उसने संसद में पदार्पण किया। उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाने और राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने वाली यह पार्टी 2012 के बाद से लगातार गिरावट झेल रही है। अब उसके एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का छह वर्षीय कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है, जबकि लोकसभा में पार्टी पहले से शून्य पर है। 403 सदस्यीय यूपी विधानसभा में एक भी विधायक न होने के कारण पार्टी नया राज्यसभा सदस्य भी नहीं भेज सकती।

मुख्य तथ्य

  • बसपा के एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का छह वर्ष का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त होगा; इसके बाद दोनों सदनों में पार्टी का कोई प्रतिनिधि नहीं रहेगा।
  • 1989 में संसदीय पदार्पण के बाद पहली बार बसपा का संसद के किसी सदन में प्रतिनिधित्व नहीं होगा।
  • चुनाव आयोग ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश की 10 रिक्त राज्यसभा सीटों पर चुनाव की घोषणा की; भाजपा को आठ और सपा को दो सीटें मिलने के आसार हैं।
  • अगस्त में बलिया की रसड़ा सीट से तीन बार विधायक रहे उमाशंकर सिंह के निधन के बाद 403 सदस्यीय विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं बचा।
  • 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा की सीटें 206 से घटकर 80 रह गईं और वह सत्ता से बाहर हो गई।
  • लोकसभा: 2009 में 21 सीटें और 6.17% वोट; 2014 में शून्य सीट और 4.19% वोट; 2019 में 10 सीटें और 3.67% वोट; 2024 में शून्य सीट और 2.06% वोट।
  • 2014 में भाजपा ने 303 सांसदों के साथ सरकार बनाई और यूपी की 80 में से 71 लोकसभा सीटें जीतीं।
  • यूपी में अनुसूचित जाति वोट बैंक अनुमानित 21% है, जिसमें जाटव अकेले 54% से अधिक आंके जाते हैं।

समयरेखा

  1. 1984कांशीराम ने दलितों को राजनीतिक ताकत और प्रतिनिधित्व देने के लिए बसपा का गठन किया।
  2. 1989बसपा का संसद में पदार्पण।
  3. 2007 (2012 से पूर्व चुनाव)बसपा ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत पाया; मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं।
  4. 2009लोकसभा चुनाव में बसपा को 21 सीटें और 6.17% वोट शेयर।
  5. 2012यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा 80 सीटों पर सिमटी; गिरावट का मोड़।
  6. 2014भाजपा 303 सीटों के साथ सत्ता में; बसपा शून्य सीट, वोट शेयर 4.19%।
  7. 2019सपा व रालोद के साथ महागठबंधन में बसपा ने 10 सीटें, 3.67% वोट पाए।
  8. 2024एनडीए और इंडी गठबंधन दोनों से अलग लड़कर बसपा शून्य सीट, वोट शेयर 2.06%।
  9. अगस्त (इस वर्ष)विधायक उमाशंकर सिंह के निधन से विधानसभा में बसपा का प्रतिनिधित्व समाप्त।
  10. मंगलवारचुनाव आयोग ने यूपी की 10 रिक्त राज्यसभा सीटों के चुनाव की घोषणा की।

किसका दाँव

  • बसपा और प्रमुख मायावती — संसद में शून्य प्रतिनिधित्व, विधानसभा में कोई विधायक नहीं और राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खोने का खतरा।
  • रामजी गौतम — बसपा के एकमात्र राज्यसभा सांसद, जिनका छह वर्षीय कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है।
  • भाजपा — यूपी की 10 राज्यसभा सीटों में आठ जीतने की स्थिति; गैर-जाटव दलित वोट में पैठ बनाने की कोशिश।
  • समाजवादी पार्टी — 10 सीटों में दो जीतने के आसार; एससी वोट के लिए मुकाबले में।
  • आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) — आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति वोट के लिए प्रतिस्पर्धा।
  • चुनाव आयोग — राज्यसभा चुनाव की घोषणा और राजनीतिक दलों के दर्जे की आगामी समयबद्ध समीक्षा।
  • अनुसूचित जाति मतदाता, विशेषकर जाटव — यूपी में 21% एससी वोट बैंक का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सौदेबाजी की ताकत।

क्यों अहम है

दलित राजनीति की सबसे प्रमुख स्वतंत्र आवाज रही बसपा का संसद से पूरी तरह बाहर हो जाना 1989 के बाद पहली बार हो रहा है, जो एक सामाजिक आंदोलन से निकली पार्टी के चुनावी क्षरण को दर्शाता है। यूपी विधानसभा चुनाव नजदीक आने पर 21% एससी वोट के लिए भाजपा, सपा और आजाद समाज पार्टी के बीच होड़ तेज हो गई है। साथ ही चुनाव आयोग की समीक्षा में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खोने की आशंका पार्टी की संस्थागत हैसियत पर भी असर डालेगी।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • बसपा की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की; संसदीय पदार्पण 1989 में।
  • कांशीराम का नारा: 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'।
  • उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 सदस्य; राज्यसभा सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष।
  • राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा: चार या अधिक राज्यों में कुल वैध मतों का कम से कम 6% और न्यूनतम चार सांसद; या लोकसभा की कम से कम 2% सीटें तीन राज्यों से; या चार राज्यों में मान्यता प्राप्त राज्य दल।
  • 2019 में बसपा सपा व रालोद के साथ महागठबंधन में थी; 2024 में एनडीए और इंडी गठबंधन दोनों से अलग लड़ी।
  • यूपी में एससी वोट अनुमानित 21%, जिसमें जाटव 54% से अधिक।

मेन्स दृष्टिकोण

बसपा का संसद से पूर्ण बहिष्करण भारतीय राजनीति में अस्मिता-आधारित दलों के जीवनचक्र का अध्ययन है: 1984 में कांशीराम द्वारा 'जिसकी जितनी संख्या भाारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के विचार पर खड़ी पार्टी 2007 में 206 सीटों के पूर्ण बहुमत तक पहुंची, लेकिन 2012 में 80 सीटों पर सिमटने के बाद उसकी गिरावट अटूट रही। कारणों में 2014 के बाद भाजपा की व्यापक लामबंदी और दलित मतों का खिसकना (यूपी की 80 में 71 लोकसभा सीटें भाजपा को), गठबंधन-रणनीति में अस्थिरता (2019 में महागठबंधन के साथ 10 सीटें, 2024 में अकेले लड़कर शून्य और 2.06% वोट), तथा जाटव-केंद्रित आधार के बाहर विस्तार न कर पाना शामिल हैं। परिणाम दोहरे हैं—संस्थागत स्तर पर विधायक-शून्यता के कारण राज्यसभा में प्रवेश असंभव और राष्ट्रीय दल का दर्जा खोने का जोखिम; प्रातिनिधिक स्तर पर 21% एससी मतदाताओं की स्वायत्त सौदेबाजी क्षमता का क्षरण, जिसे भाजपा, सपा और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) आपस में बांटने की होड़ में हैं। आगे का रास्ता संगठनात्मक पुनर्निर्माण, गैर-जाटव दलितों तक पहुंच और स्पष्ट गठबंधन विकल्पों पर निर्भर करेगा, क्योंकि प्रतिनिधित्व के बिना एजेंडा-निर्धारण की शक्ति सीमित हो जाती है।

मुख्य शब्द

बसपा (बहुजन समाज पार्टी)
1984 में कांशीराम द्वारा दलितों को राजनीतिक ताकत व प्रतिनिधित्व देने के लिए बनाई गई पार्टी, जिसने बाद में राष्ट्रीय दर्जा पाया।
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा
चुनाव आयोग द्वारा दी जाने वाली मान्यता, जिसके लिए चार राज्यों में 6% वोट व चार सांसद, या लोकसभा की 2% सीटें तीन राज्यों से, या चार राज्यों में राज्य दल होना जरूरी है।
जाटव
उत्तर प्रदेश की प्रमुख अनुसूचित जाति उपसमूह, जो राज्य के 21% एससी वोट का 54% से अधिक और बसपा का मुख्य आधार माना जाता है।
महागठबंधन (2019)
2019 लोकसभा चुनाव में बसपा, सपा और राष्ट्रीय लोक दल का विपक्षी गठबंधन, जिसमें बसपा ने 10 सीटें जीतीं।
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम)
यूपी में अनुसूचित जाति मतों के लिए भाजपा और सपा के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा दल।
जिसकी जितनी संख्या भाारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी
कांशीराम का दिया नारा—जिस समूह की आबादी जितनी अधिक, सत्ता में उसका हिस्सा उतना ही होना चाहिए।

अभ्यास प्रश्न

  1. बसपा के 2012 के बाद के चुनावी क्षरण के कारणों की जांच करें और बताएं कि इसका उत्तर प्रदेश में दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर क्या प्रभाव पड़ा है।
  2. किसी राजनीतिक दल को 'राष्ट्रीय पार्टी' का दर्जा देने की चुनाव आयोग की कसौटियां क्या हैं? दर्जा खोने के व्यावहारिक परिणामों पर चर्चा करें।
  3. क्या अस्मिता-आधारित क्षेत्रीय दलों का पतन भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक समूहों की सौदेबाजी क्षमता को कमजोर करता है? बसपा के उदाहरण से समझाएं।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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