सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की रिहाई याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो मामलों में अलग-अलग सजा मिलने पर विचाराधीन कैदी के रूप में बिताई अवधि केवल एक सजा में समायोजित होगी, चाहे ट्रायल कोर्ट ने सजाएं साथ-साथ चलाने का आदेश दिया हो। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पाया कि 2015 और 2017 के दो आतंकी मामलों में उम्रकैद पाए अबू सलेम ने वह अवधि दो बार गिनकर 25 साल पूरे होने का दावा किया। सरकारी हलफनामे के अनुसार उनकी संभावित रिहाई 31 जनवरी 2046 को है। पुर्तगाल को दिया आश्वासन उम्रकैद को 25 साल की सजा में नहीं बदलता।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • A bench of Justices Vikram Nath and Sandeep Mehta held undertrial custody can be set off against only one of two separately imposed sentences, even if they run concurrently. — Attributed to the Supreme Court bench, with direct quotes reproduced in the source.
  • Abu Salem was extradited from Portugal on November 11, 2005, on an assurance he would not get the death penalty or a jail term beyond 25 years. — Stated in the source as background; no separate document cited.
  • Salem was awarded life sentences in two terror cases in 2015 and 2017. — Figures and years appear in the source; internally consistent with the ruling described.
  • A government affidavit put Salem's probable release date at January 31, 2046, after set-off and remission. — Attributed to a government affidavit referred to by the court.
  • The 25-year cap flows from the sovereign assurance to Portugal and does not convert life imprisonment into a fixed 25-year term. — Direct quote attributed to the Supreme Court.

विश्लेषकों की राय राय

AI రాజకీయ విశ్లేషకులు · తెలుగు

ఇది న్యాయపరమైన లెక్కల తీర్పు అయినా, దాని రాజకీయ ప్రతిఫలనాలు స్పష్టం — 1993 ముంబై పేలుళ్ల నేపథ్యంతో ముడిపడిన అబూ సలేం విడుదల ప్రశ్న ఎప్పుడూ ఉగ్రవాదంపై కఠినత్వం అనే రాజకీయ కథనానికి పరీక్ష. కేంద్రం అఫిడవిట్‌లో సలేంను 50 ఏళ్ల శిక్ష కేటగిరీలో చూపి, 2046 జనవరి 31ను విడుదల తేదీగా పేర్కొనడం ద్వారా ప్రభుత్వం ముందుగానే కఠిన వైఖరిని రికార్డులో పెట్టింది; సుప్రీంకోర్టు దానికి అనుకూలంగా తీర్పు ఇవ్వడం ప్రభుత్వ స్థానానికి బలం. అదే సమయంలో, పోర్చుగల్‌కు ఇచ్చిన సార్వభౌమ హామీని కోర్టు రద్దు చేయలేదు — దాన్ని అమలు చేసే బాధ్యత కార్యనిర్వాహక వర్గంపైనే మిగిలింది, అంటే రాజకీయంగా సున్నితమైన నిర్ణయం భవిష్యత్తుకు వాయిదా పడిందని అర్థం.

  • కోర్టు తీర్పు ప్రభుత్వ లెక్కలను సమర్థించడం వల్ల, ఉగ్రవాద కేసుల్లో మెతకదనం అనే విమర్శకు కేంద్రానికి ఇప్పుడు తక్షణ రాజకీయ ఒత్తిడి తగ్గుతుంది.
  • శిక్ష స్వరూపం చట్టసభలది, దాని అన్వయం న్యాయవ్యవస్థది, ఉపశమనం/విడుదల కార్యనిర్వాహక వర్గానిది అని కోర్టు గీసిన విభజన రేఖ — భవిష్యత్తులో ఏ నిర్ణయానికైనా రాజకీయ బాధ్యత ఎవరిపై పడుతుందో నిర్దేశిస్తుంది.
  • పోర్చుగల్‌కు ఇచ్చిన హామీ యావజ్జీవాన్ని 25 ఏళ్లుగా మార్చదని కోర్టు స్పష్టం చేయడం, దౌత్య నిబద్ధత వర్సెస్ దేశీయ రాజకీయ సున్నితత్వం మధ్య సమతుల్యం చేసే భారాన్ని ప్రభుత్వానికే వదిలేసింది.
  • అప్పగింత హామీలు భవిష్యత్ కేసుల్లో ఎలా అమలవుతాయనేది ఇప్పుడు దౌత్య-రాజకీయ చర్చకు అంశం అవుతుంది, ఎందుకంటే విదేశాల సహకారం ఇటువంటి హామీల విశ్వసనీయతపైనే ఆధారపడుతుంది.
  • సలేం విడుదల ఏ దశలోనైనా తెరపైకి వస్తే, అది మహారాష్ట్ర రాజకీయాల్లోనూ, జాతీయ భద్రతా కథనంలోనూ పార్టీల మధ్య పరస్పర ఆరోపణలకు తక్షణ ఆస్కారం ఇచ్చే అంశం.

किस पर नज़र रखें — పోర్చుగల్‌కు ఇచ్చిన 25 ఏళ్ల హామీని కేంద్రం ఉపశమనం/క్షమాభిక్ష రూపంలో ఎప్పుడు, ఎలా అమలు చేస్తుందనే ప్రశ్నపై రాజకీయ, దౌత్య స్పందనలను గమనించాలి — ఎందుకంటే ఆ నిర్ణయ భారం ఇప్పుడు కోర్టు నుంచి ప్రభుత్వానికి మారింది.

సలేం విడుదలపై కేంద్రం భవిష్యత్తులో ఏ నిర్ణయం తీసుకుంటుందో, పోర్చుగల్ లేదా ఏ రాజకీయ పక్షమైనా ఈ తీర్పుపై ఎలా స్పందించిందో ఈ కథనం చెప్పలేదు; ఇందులో ఉన్నది కేవలం శిక్షా కాలం లెక్కింపుపై కోర్టు నిర్ణయం మాత్రమే.

गहराई से

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सार

पृष्ठभूमि

गैंगस्टर अबू सलेम को नवंबर 2005 में पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किया गया था, जिसके लिए भारत सरकार ने गंभीर (solemn) आश्वासन दिया था कि उसे मृत्युदंड या 25 वर्ष से अधिक की कैद नहीं दी जाएगी। उसे 2015 और 2017 के दो आतंकी मामलों में उम्रकैद की सजा मिली। सलेम ने दावा किया कि वह पहले ही 25 साल जेल में बिता चुका है, इसलिए उसे रिहा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका खारिज करते हुए विचाराधीन कैद (undertrial) अवधि की गणना का सिद्धांत स्पष्ट किया।

मुख्य तथ्य

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा: दो मामलों में अलग-अलग सजा होने पर विचाराधीन कैदी के रूप में बिताई अवधि केवल एक ही सजा में समायोजित (set-off) होगी, दोनों में नहीं।
  • यह व्यवस्था तब भी लागू है जब ट्रायल कोर्ट ने दोनों सजाएं साथ-साथ (concurrently) चलाने का आदेश दिया हो।
  • फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दिया।
  • अबू सलेम को 11 नवंबर 2005 को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था।
  • प्रत्यर्पण के समय भारत सरकार ने आश्वासन दिया था कि सलेम को मृत्युदंड या 25 वर्ष से अधिक कैद नहीं दी जाएगी।
  • सलेम को 2015 और 2017 के दो आतंकी मामलों में उम्रकैद की सजा मिली।
  • सरकारी हलफनामे में सलेम को 50 वर्ष की कैद पाए कैदियों की श्रेणी में रखा गया; सेट-ऑफ और छूट (remission) घटाने के बाद संभावित रिहाई तिथि 31 जनवरी 2046 बताई गई, यानी अब से 20 साल बाद।
  • कोर्ट ने कहा कि पुर्तगाल को दिया संप्रभु आश्वासन उम्रकैद को 25 वर्ष की निश्चित अवधि की सजा में परिवर्तित नहीं करता।

समयरेखा

  1. 11 नवंबर 2005लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अबू सलेम का पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पण; भारत सरकार का आश्वासन कि मृत्युदंड या 25 वर्ष से अधिक कैद नहीं होगी।
  2. 2015पहले आतंकी मामले में सलेम को उम्रकैद की सजा।
  3. 2017दूसरे आतंकी मामले में सलेम को उम्रकैद की सजा; दोनों सजाएं साथ-साथ चलाने का निर्देश।
  4. फैसले की तिथि (स्रोत में नहीं दी गई)सुप्रीम कोर्ट ने सलेम की अपील खारिज की और विचाराधीन अवधि की दोहरी गणना अस्वीकार की।
  5. 31 जनवरी 2046सरकारी हलफनामे के अनुसार सलेम की संभावित रिहाई तिथि।

किसका दाँव

  • अबू सलेम — 25 साल पूरे होने के आधार पर रिहाई का दावा खारिज; सरकारी गणना के अनुसार 2046 तक जेल में रहना।
  • सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस विक्रम नाथ व जस्टिस संदीप मेहता) — सजा की गणना और सेट-ऑफ के सिद्धांत तय करना; न्यायिक व कार्यपालिका अधिकारों की सीमा स्पष्ट करना।
  • केंद्र सरकार — पुर्तगाल को दिए संप्रभु आश्वासन का पालन और हलफनामे में सजा की गणना व छूट का ब्योरा प्रस्तुत करना।
  • पुर्तगाल सरकार — प्रत्यर्पण की शर्त — 25 वर्ष से अधिक सजा न देने के आश्वासन का सम्मान।
  • अन्य कैदी व जेल प्रशासन — एक से अधिक मामलों में सजा पाए कैदियों की विचाराधीन अवधि के समायोजन पर स्पष्ट नियम।

क्यों अहम है

यह फैसला उन कैदियों के लिए महत्वपूर्ण है जो एक से अधिक मामलों में सजा पाते हैं, क्योंकि अब एक ही विचाराधीन अवधि को दो सजाओं में गिनकर दोहरा लाभ नहीं लिया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्यर्पण के समय दिया संप्रभु आश्वासन न्यायिक दंड-निर्धारण को नहीं बदलता, वह कार्यपालिका की छूट/रिहाई शक्तियों के दायरे में आता है। इससे विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सजा से जुड़ी भूमिकाओं का विभाजन भी रेखांकित होता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • सुप्रीम कोर्ट: दो अलग-अलग सजाओं में विचाराधीन कैद की अवधि केवल एक सजा में समायोजित होगी, साथ-साथ चलने वाली सजाओं में भी।
  • अबू सलेम का पुर्तगाल से प्रत्यर्पण: 11 नवंबर 2005; आश्वासन — मृत्युदंड नहीं, 25 वर्ष से अधिक कैद नहीं।
  • सलेम को 2015 और 2017 के दो आतंकी मामलों में उम्रकैद।
  • सरकारी हलफनामा: सलेम की संभावित रिहाई तिथि 31 जनवरी 2046; उसे 50 वर्ष की कैद वाली श्रेणी में रखा गया।
  • बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता।
  • कोर्ट: दंड का स्वरूप विधायिका तय करती है, उसका अनुप्रयोग न्यायपालिका करती है, तथा छूट/लघुकरण/रिहाई कार्यपालिका के अधिकार में है।

मेन्स दृष्टिकोण

अबू सलेम मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो संवैधानिक-आपराधिक प्रश्नों को जोड़ता है — सजा की गणना में विचाराधीन कैद के समायोजन का दायरा, और अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण में दिए संप्रभु आश्वासन का न्यायिक निर्णय पर प्रभाव। कोर्ट ने कहा कि साथ-साथ चलने वाली सजाएं एक साथ प्रभावी होती हैं, इसलिए वही अवधि एक सजा के लिए विचाराधीन कैद और दूसरी के लिए दोषसिद्धि-पश्चात कैद मानकर दोहरा लाभ नहीं लिया जा सकता; सलेम ने 2015 और 2017 की दो उम्रकैद सजाओं में यही गणना करके 25 वर्ष पूरे होने का दावा किया था। दूसरे पहलू पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुर्तगाल को दिया आश्वासन उम्रकैद को 25 वर्ष की निश्चित सजा में नहीं बदलता; दंड-निर्धारण विधायिका व न्यायपालिका का क्षेत्र है, जबकि छूट, लघुकरण और रिहाई कार्यपालिका के विधि-प्रदत्त अधिकार हैं — अर्थात आश्वासन का पालन कार्यपालिका के स्तर पर होगा, न कि सजा घटाकर। आगे का रास्ता यह है कि सेट-ऑफ और छूट की गणना पारदर्शी व एकरूप हो, जैसा सरकारी हलफनामे में 31 जनवरी 2046 की संभावित रिहाई तिथि के रूप में प्रस्तुत किया गया, और प्रत्यर्पण आश्वासनों का निर्वाह अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता बनाए रखते हुए न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना किया जाए।

मुख्य शब्द

प्रत्यर्पण (Extradition)
एक देश द्वारा अभियुक्त/दोषी को दूसरे देश को सौंपना; सलेम को 11 नवंबर 2005 को पुर्तगाल से भारत सौंपा गया।
संप्रभु आश्वासन (Solemn/Sovereign Assurance)
प्रत्यर्पण के लिए भारत सरकार का वचन कि सलेम को मृत्युदंड या 25 वर्ष से अधिक कैद नहीं दी जाएगी।
सेट-ऑफ (Set-off)
विचाराधीन कैदी के रूप में बिताई अवधि को अंतिम सजा में समायोजित करना; कोर्ट के अनुसार यह केवल एक सजा में मिलेगा।
साथ-साथ चलने वाली सजाएं (Concurrent Sentences)
दो या अधिक सजाएं एक साथ प्रभावी होती हैं, क्रमवार नहीं; इसलिए एक ही अवधि दो बार नहीं गिनी जा सकती।
छूट/लघुकरण (Remission/Commutation)
कानून द्वारा कार्यपालिका को दी गई शक्ति जिससे सजा में कमी या रिहाई की जा सकती है।
उम्रकैद (Life Imprisonment)
आजीवन कारावास; कोर्ट ने कहा कि यह किसी आश्वासन के कारण स्वतः 25 वर्ष की निश्चित अवधि की सजा नहीं बन जाती।

अभ्यास प्रश्न

  1. अबू सलेम मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में विचाराधीन कैद की अवधि के समायोजन (सेट-ऑफ) और साथ-साथ चलने वाली सजाओं के संबंध को समझाइए।
  2. प्रत्यर्पण के समय दिया गया संप्रभु आश्वासन न्यायिक दंड-निर्धारण को किस सीमा तक बाध्य कर सकता है? चर्चा कीजिए।
  3. सजा निर्धारण में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिकाओं का विभाजन इस फैसले से कैसे स्पष्ट होता है?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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