राज ठाकरे ने सीईसी ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगा

एमएनएस अध्यक्ष राज ठाकरे ने गुरुवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग में कथित "मैच फिक्सिंग" की जांच की मांग की। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 बार आयोग के फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के अनुसार मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और मतदाता सूची सॉफ्टवेयर से जुड़े आदेश आयोग की मंजूरी के बिना जारी हुए। ठाकरे ने विपक्ष से ईवीएम के बजाय बैलट पेपर की मांग को लेकर आंदोलन का आह्वान किया।

स्रोत

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Two Election Commissioners, Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi, formally objected to poll panel decisions 14 times in 10 months — Attributed in source to an Indian Express report; figure appears in source, though Thackeray elsewhere refers to a 14-month period, an internal inconsistency.
  • Orders on voter registration, deletion of names and voter list software were issued without Election Commission approval — Attributed to the cited Indian Express report; not independently verified in the source text.
  • In Goa, 97 individuals were found eligible by local officials but were left out of the final list due to software limitations — Stated by Thackeray; figure appears in source with no separate official confirmation.
  • 16.10 lakh appeals were filed in West Bengal against voters added by local officials — Figure cited by Thackeray; no independent sourcing given in the text.
  • Gyanesh Kumar was appointed Chief Election Commissioner in February 2025 — Stated by Thackeray in the source; date appears twice consistently.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह राज ठाकरे का एक अख़बारी रिपोर्ट को पूरा राजनीतिक हथियार बना लेने का प्रयास है। चुनाव आयोग के भीतर मतभेद पर आई रिपोर्ट को अपने पुराने आरोपों की "पुष्टि" बताकर वे महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय नतीजों के बाद कमज़ोर पड़ी अपनी पार्टी के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा तलाश रहे हैं। सीईसी के इस्तीफ़े की मांग से आगे बढ़कर ईवीएम के विरुद्ध बैलट पेपर आंदोलन का आह्वान करना विपक्ष की बहस की दिशा तय करने की कोशिश है।

  • चुनावी हार को संस्थागत खराबी से जोड़ना विपक्ष की जानी-पहचानी रणनीति है — इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहता है, पर यह अपने आप में मतदाता वापस लाने का कार्यक्रम नहीं है।
  • अपने दावों की जगह एक प्रकाशित रिपोर्ट को आधार बनाना ठाकरे को विश्वसनीयता का कवच देता है; अब उन्हें नकारने का अर्थ रिपोर्ट को नकारना होगा।
  • सत्ता में आई सरकार के भी इस्तीफ़े की मांग व्यवहार में संभव नहीं — यह राजनीतिक संदेश है, प्रशासनिक प्रस्ताव नहीं।
  • ईवीएम-विरोधी और बैलट समर्थक आह्वान विपक्ष के भीतर ही मतभेद पैदा कर सकता है, क्योंकि उन्हीं मशीनों से जीतने वाले दलों के लिए इसे पूरे मन से अपनाना कठिन है।
  • इस खबर में चुनाव आयोग या भाजपा की प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है; वे कह सकते हैं कि बहु-सदस्यीय संस्था में मतभेद सामान्य हैं और बहुमत के निर्णय वैध रहते हैं।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि कांग्रेस और अन्य बड़े विपक्षी दल ठाकरे के बैलट पेपर आह्वान को उठाते हैं या केवल सीईसी की जवाबदेही की मांग तक सीमित रहते हैं — इसी से तय होगा कि यह राष्ट्रीय अभियान बनेगा या नहीं।

रिपोर्ट दो आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का ज़िक्र करती है, पर यह साबित नहीं करती कि "मैच फिक्सिंग" हुई, नतीजे बदले गए या बाहरी दबाव था; इसमें आयोग या सरकार का पक्ष भी शामिल नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) अध्यक्ष राज ठाकरे ने इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने 10 महीनों में 14 बार आयोग के फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई, जिनमें मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और मतदाता सूची सॉफ्टवेयर से जुड़े आदेश आयोग की मंजूरी के बिना जारी होने का उल्लेख है। ठाकरे ने इसे चुनाव आयोग में "मैच फिक्सिंग" बताया और विपक्ष से ईवीएम के बदले बैलट पेपर की मांग पर जनआंदोलन का आह्वान किया। यह विवाद एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) और मतदाता सूची शुद्धिकरण पर चल रही व्यापक राजनीतिक बहस से जुड़ा है।

मुख्य तथ्य

  • इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई।
  • आपत्ति दर्ज कराने वाले चुनाव आयुक्त हैं सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।
  • रिपोर्ट के मुताबिक मतदाता पंजीकरण, नामों को हटाने और मतदाता सूची सॉफ्टवेयर से संबंधित कुछ आदेश चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना जारी किए गए।
  • ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति फरवरी 2025 में हुई; ठाकरे ने कहा कि पद संभालने के क्षण से ही उन्होंने 'आकाओं को खुश करना' शुरू कर दिया।
  • ठाकरे के अनुसार गोवा में स्थानीय अधिकारियों ने दस्तावेज़ जांच कर 97 व्यक्तियों को पात्र पाया, पर सॉफ्टवेयर में समय पर नाम फिर जोड़ने का प्रावधान न होने से वे अंतिम सूची से बाहर रह गए।
  • पश्चिम बंगाल में स्थानीय अधिकारियों द्वारा जोड़े गए मतदाताओं के विरुद्ध आयोग की ओर से 16.10 लाख अपीलें दायर की गईं।
  • 'फॉर्म 6' (एसआईआर) में पूछा गया कि आवेदक या उसके परिवार का नाम पिछले एसआईआर में था या नहीं; दोनों आयुक्तों ने कहा कि विधायी संशोधन के बिना आयोग को यह पूछने का अधिकार नहीं है।
  • फरवरी 2025 के बाद बिहार, असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव तथा महाराष्ट्र में नगर निकाय व अन्य स्थानीय चुनाव हुए।

समयरेखा

  1. फरवरी 2025ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर नियुक्त हुए।
  2. फरवरी 2025 के बादबिहार, असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए।
  3. 2025 के अंतमहाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों से पहले विपक्षी नेताओं की राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मुलाकातें; ठाकरे के अनुसार उनके पास कोई वास्तविक अधिकार नहीं दिखा।
  4. पिछले 10 महीने (रिपोर्ट के अनुसार)चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।
  5. गुरुवार (रिपोर्ट प्रकाशन के बाद)राज ठाकरे ने एक्स पर पोस्ट कर सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और जांच की मांग की।

किसका दाँव

  • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — इस्तीफे की मांग और मनमाने ढंग से निर्णय लेने के आरोपों का सामना; संस्थागत विश्वसनीयता पर सवाल।
  • चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — आपत्तियां रिकॉर्ड पर दर्ज कराईं; ठाकरे के अनुसार उन्हें हाशिए पर रखा गया और अंधेरे में रखा गया।
  • राज ठाकरे / मनसे — रिपोर्ट को अपने आरोपों की पुष्टि बताकर राजनीतिक विमर्श गढ़ना; ईवीएम विरोधी आंदोलन का नेतृत्व।
  • भाजपा और सत्तारूढ़ सरकार — ठाकरे का आरोप कि आयोग के दुरुपयोग से चुनाव जीते गए; उन्होंने सरकार के इस्तीफे की भी मांग की।
  • विपक्षी दल — ठाकरे ने एकता और बैलट पेपर की मांग पर जनआंदोलन का आह्वान किया।
  • स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) और मतदाता — ठाकरे के अनुसार ईआरओ की मतदाता सूची में बदलाव की शक्ति छिन गई; गोवा के 97 पात्र लोग सूची से बाहर रहे।

क्यों अहम है

चुनाव आयोग की स्वायत्तता और उसकी आंतरिक सामूहिक निर्णय प्रक्रिया भारत की चुनावी विश्वसनीयता की नींव है; आयुक्तों की लिखित आपत्तियां इस प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करती हैं। मतदाता सूची, एसआईआर और सॉफ्टवेयर से जुड़े आदेशों पर विवाद सीधे मताधिकार से जुड़ा है, जैसा गोवा और पश्चिम बंगाल के उदाहरणों में दिखा। यह मुद्दा अब ईवीएम बनाम बैलट पेपर की व्यापक राजनीतिक बहस में बदल रहा है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • ज्ञानेश कुमार फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने; अन्य दो आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।
  • फॉर्म 6 मतदाता सूची में नाम जोड़ने का आवेदन प्रपत्र है; एसआईआर = विशेष गहन पुनरीक्षण।
  • ईआरओ (निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी) मतदाता सूची में नाम जोड़ने/हटाने के लिए जिम्मेदार अधिकारी होते हैं।
  • इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट: 10 महीनों में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों की औपचारिक आपत्ति।
  • पश्चिम बंगाल में आयोग की ओर से 16.10 लाख अपीलें दायर की गईं; गोवा में 97 पात्र मतदाता अंतिम सूची से बाहर।
  • राज्य चुनाव आयोग स्थानीय निकाय चुनाव कराता है, जो भारत निर्वाचन आयोग से अलग संस्था है।

मेन्स दृष्टिकोण

भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है जहाँ निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाने की अपेक्षा होती है; इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों द्वारा 10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराना और मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने व मतदाता सूची सॉफ्टवेयर से जुड़े आदेश आयोग की मंजूरी के बिना जारी होने का दावा इस सामूहिकता पर प्रश्न खड़ा करता है। राज ठाकरे इसे "मैच फिक्सिंग" कहकर सीईसी के इस्तीफे, "डोर खींचने वाली सत्ता" की जांच और ईवीएम के स्थान पर बैलट पेपर की मांग तक ले गए हैं, साथ ही यह तर्क भी दिया कि स्थानीय ईआरओ और राज्यों के पास अधिकार नहीं बचे। परिणाम के स्तर पर उन्होंने गोवा (97 पात्र मतदाता सूची से बाहर) और पश्चिम बंगाल (16.10 लाख अपीलें) का उदाहरण दिया कि प्रक्रियागत केंद्रीकरण और सॉफ्टवेयर की खामियां मताधिकार को प्रभावित कर सकती हैं। आगे का रास्ता, स्रोत में व्यक्त तर्कों के अनुरूप, आयोग के भीतर पारदर्शी सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, ईआरओ स्तर पर प्रक्रियात्मक अधिकार की स्पष्टता, फॉर्म 6/एसआईआर जैसी अपेक्षाओं के लिए विधायी आधार, और आरोपों की विश्वसनीय जांच पर केंद्रित दिखता है—हालांकि ठाकरे स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं कि ऐसी जांच कौन करेगा। भाजपा या चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया स्रोत में नहीं दी गई है।

मुख्य शब्द

मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना)
राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र की राजनीतिक पार्टी, जिसने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
एसआईआर
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण; इससे जुड़े फॉर्म 6 के प्रश्न पर आयुक्तों ने विधायी अधिकार का सवाल उठाया।
ईआरओ (निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी)
स्थानीय अधिकारी जो मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने का कार्य करते हैं; ठाकरे के अनुसार उनकी शक्ति छीन ली गई।
फॉर्म 6
मतदाता सूची में नाम जोड़ने का आवेदन प्रपत्र, जिसमें पिछले एसआईआर में नाम होने की जानकारी मांगी गई।
राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ)
राज्य स्तर पर चुनाव संचालन का शीर्ष अधिकारी; ठाकरे ने कहा कि विपक्ष की मुलाकातों में वे अधिकारहीन दिखे।
राज्य चुनाव आयोग
स्थानीय निकाय चुनाव कराने वाली संस्था; ठाकरे का आरोप कि महाराष्ट्र में यह "दिल्ली की ओर देख रही थी"।

अभ्यास प्रश्न

  1. भारत निर्वाचन आयोग की बहु-सदस्यीय संरचना में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया क्यों आवश्यक है? आयुक्तों की लिखित आपत्तियों के प्रकरण के आलोक में परीक्षण करें।
  2. मतदाता सूची पुनरीक्षण में प्रौद्योगिकी (सॉफ्टवेयर) के प्रयोग से जुड़े जोखिम क्या हैं? गोवा और पश्चिम बंगाल के उदाहरणों से समझाइए।
  3. "चुनाव आयोग की स्वायत्तता अब केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित है"—इस आरोप के संदर्भ में चुनावी संस्थाओं में जनविश्वास बहाल करने के उपायों पर चर्चा करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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