भारत बहुपक्षवाद मंच में शामिल, यूएन महासभा के दौरान शुरुआत

संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में हुए पहले पी4एम शिखर सम्मेलन में भारत ने यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और कनाडा के साथ बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समृद्धि के लिए मंच की शुरुआत की। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था दबाव में है और सहभागी विचार-विमर्श तथा पारदर्शी निर्णय जरूरी हैं। सात हस्ताक्षरकर्ताओं की संयुक्त घोषणा में संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं के सुधार की मांग की गई।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#multilateralism#united nations#jaishankar#diplomacy#p4m summit

डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • India joined the EU, Australia, Brazil and Canada to launch the P4M platform on the margins of the UN General Assembly. — Stated in source; event described as inaugural P4M Summit in New York on September 21.
  • Participants included Jaishankar, Antonio Costa, Anthony Albanese, Mario Vieira, Mia Mottley, Mark Carney and William Ruto. — Names appear in source text as attendees of the summit.
  • Jaishankar said reformed multilateralism is essential and the global order is 'under stress'. — Direct quotes attributed to Jaishankar at the meeting.
  • The joint declaration called the UN Charter-based multilateral system 'indispensable' but in need of renewal and reform. — Quoted from the joint declaration in the source.
  • Seven signatories tasked senior officials with setting up a coordination channel and invited other countries to join. — Figure and action appear in source; no further sourcing given.

विश्लेषकों की राय राय

AI रणनीतिक मामलों के विश्लेषक

पी4एम को गुट के रूप में नहीं, बल्कि सामरिक हेजिंग की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए — ऐसे समय में जब महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा नियम-आधारित व्यवस्था पर दबाव डाल रही है, मध्यम शक्तियां एकजुट होकर उसे बचाने का प्रयास कर रही हैं। सह-प्रायोजक के रूप में जुड़ना भारत को संयुक्त राष्ट्र सुधार की अपनी पुरानी मांग उठाने का एक और व्यापक मंच देता है, और साथ ही उसकी सामरिक स्वायत्तता भी बनी रहती है। जयशंकर की "चोकपॉइंट प्रभुत्व", डी-रिस्किंग और विविधीकरण वाली भाषा इस पहल के असली आर्थिक-सुरक्षा मर्म को उजागर करती है।

  • संस्थापकों का यह स्पष्ट कहना कि यह "कोई और विशिष्ट गुट" नहीं है, इस कूटनीतिक सावधानी को दर्शाता है कि इसे गठबंधन-निर्माण न समझा जाए।
  • भारत की मौजूदगी समूह का स्वरूप बदल देती है — ब्राज़ील, केन्या और बारबाडोस के साथ यह पश्चिमी जमावड़े की जगह उत्तर-दक्षिण गठजोड़ दिखता है, जो सुरक्षा परिषद सुधार के राजनीतिक तर्क को मज़बूत करता है।
  • आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण, डी-रिस्किंग और उभरती तकनीकों पर गार्डरेल मिलकर एक आर्थिक-सुरक्षा एजेंडा बनाते हैं, जो किसी देश का नाम लिए बिना सामरिक निर्भरता घटाने की बात करता है।
  • ईंधन, भोजन, उर्वरक और वित्त पर संघर्षों के असर पर भारत का ज़ोर ग्लोबल साउथ के हितों की आवाज़ बनने की उसकी स्थापित स्थिति के अनुरूप है।
  • फिलहाल यह घोषणात्मक स्तर पर ही है — अधिकारियों को समन्वय चैनल बनाने का काम सौंपने के अलावा, कोई क्रियान्वयन तंत्र, वित्तपोषण या निर्णय-अधिकार सामने नहीं आया है।

किस पर नज़र रखें — देखना यह होगा कि वरिष्ठ अधिकारियों का समन्वय चैनल किन प्राथमिक क्षेत्रों को चुनता है और खुले निमंत्रण पर कौन से नए देश — विशेषकर एशिया और अफ्रीका से — जुड़ते हैं; यही इस मंच का असली वज़न तय करेगा।

यह खबर यह स्पष्ट नहीं करती कि पी4एम का संस्थागत ढांचा, संसाधन या समयसीमा क्या होगी, न ही यह कि वह संयुक्त राष्ट्र सुधार को व्यवहार में आगे बढ़ा पाएगा या अन्य बड़ी शक्तियां कैसी प्रतिक्रिया देंगी।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में "बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समृद्धि के भागीदार" (पी4एम) नामक नए मंच का पहला शिखर सम्मेलन हुआ। भारत इसमें यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, बारबाडोस और केन्या के साथ सह-प्रायोजक के रूप में शामिल हुआ। इस पहल का विचार पहले यूरोपीय परिषद अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो और ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा के एक संयुक्त लेख में रखा गया था, जिसमें कहा गया कि यह "कोई और विशिष्ट गुट" नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र व बहुपक्षीय संस्थाओं के सुधार का प्रयास है।

मुख्य तथ्य

  • पहला पी4एम (Partners for multilateralism, international law, peace and prosperity) शिखर सम्मेलन 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में यूएन महासभा के इतर हुआ।
  • भारत की ओर से विदेश मंत्री एस जयशंकर शामिल हुए, जो यूएन महासभा में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे थे।
  • मंच में सात हस्ताक्षरकर्ता हैं; भारत, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, बारबाडोस और केन्या के नेता/मंत्री बैठक में शामिल हुए।
  • उपस्थित नेता: यूरोपीय परिषद अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा, ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बानीज़, ब्राजील के विदेश मंत्री मारियो विएरा, बारबाडोस की पीएम मिया मोटली, कनाडा के पीएम मार्क कार्नी, केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो।
  • जयशंकर ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था "दबाव में" है और "सुधारित बहुपक्षवाद" आवश्यक है; अधिक सहभागी विचार-विमर्श और पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया लंबे समय से बाकी हैं।
  • संयुक्त घोषणा में यूएन चार्टर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था को "अपरिहार्य" बताया गया, पर कहा गया कि इसे अधिक प्रभावी, प्रतिनिधिक और समावेशी बनाने के लिए नवीकृत व सुधारित किया जाना चाहिए।
  • सात हस्ताक्षरकर्ताओं ने वरिष्ठ अधिकारियों को समन्वय चैनल बनाने और प्राथमिकता क्षेत्र तय करने का काम सौंपा, तथा अन्य देशों को शामिल होने का निमंत्रण दिया।
  • कार्नी ने इस पहल को गति दी, जो जनवरी में दावोस के विश्व आर्थिक मंच में मध्यम शक्तियों से बहुपक्षवाद की रक्षा हेतु एकजुट होने की उनकी अपील पर आधारित थी।

समयरेखा

  1. जनवरी (दावोस, विश्व आर्थिक मंच)मार्क कार्नी ने मध्यम शक्तियों से बहुपक्षवाद की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया, जिससे पहल को गति मिली।
  2. शिखर सम्मेलन से पहलेकोस्टा, कार्नी, रुटो और लूला दा सिल्वा के संयुक्त ऑप-एड में पहल की रूपरेखा रखी गई; कहा गया कि यह "और एक विशिष्ट गुट" नहीं होगा।
  3. 21 सितंबरन्यूयॉर्क में यूएन महासभा के इतर पहला पी4एम शिखर सम्मेलन; संयुक्त घोषणा जारी; भारत सह-प्रायोजक के रूप में शामिल।

किसका दाँव

  • भारत (विदेश मंत्री एस जयशंकर) — सह-प्रायोजक के रूप में "सुधारित बहुपक्षवाद", पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया और यूएन संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग को आगे बढ़ाना।
  • यूरोपीय संघ (यूरोपीय परिषद अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा) — टकराव को सहयोग में बदलना; यूएन चार्टर की रक्षा, जलवायु वित्त/एआई जैसी चुनौतियाँ और संस्थागत सुधार की तीन प्राथमिकताएँ।
  • कनाडा (पीएम मार्क कार्नी) — पहल को उत्प्रेरित करने वाला देश; मध्यम शक्तियों की साझा कार्रवाई से बहुपक्षवाद की रक्षा।
  • ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, बारबाडोस, केन्या — हस्ताक्षरकर्ता के रूप में समन्वय चैनल, प्राथमिकता क्षेत्रों और ठोस परिणामों में हिस्सेदारी; क्षेत्रीय संगठनों से साझेदारी।
  • संयुक्त राष्ट्र प्रणाली — सुधार का दबाव—संस्थाओं को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधिक, समावेशी और "कल की दुनिया के अनुरूप" बनाना।
  • अन्य देश (विशेषकर विकासशील देश) — मंच में शामिल होने का निमंत्रण; व्यापार सुधार, आपूर्ति शृंखला, विकास वित्त और जलवायु न्याय जैसे मुद्दों पर आवाज़।

क्यों अहम है

अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के बीच बहुपक्षीय संस्थाएँ कमजोर पड़ रही हैं; पी4एम उन देशों का साझा मंच है जो यूएन को खारिज करने की जगह उसका सुधार चाहते हैं। भारत की भागीदारी उसकी लंबे समय से चली आ रही "सुधारित बहुपक्षवाद" की मांग और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के दावे को एक नया मंच देती है। घोषणा में आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण, व्यापार व वित्तीय ढाँचे के सुधार और एआई-डिजिटल सहयोग पर जोर सीधे व्यापार, तकनीक और विकास वित्त की भारतीय प्राथमिकताओं से जुड़ता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • पी4एम का पूरा नाम: Partners for multilateralism, international law, peace and prosperity; पहला शिखर सम्मेलन 21 सितंबर, न्यूयॉर्क।
  • पी4एम के सात हस्ताक्षरकर्ता: भारत, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, बारबाडोस, केन्या।
  • भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री एस जयशंकर ने किया; वे यूएन महासभा में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता थे।
  • पहल की रूपरेखा कोस्टा, कार्नी, रुटो और लूला दा सिल्वा के संयुक्त ऑप-एड से; प्रेरणा जनवरी में दावोस में कार्नी की टिप्पणी।
  • संयुक्त घोषणा: यूएन चार्टर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था "अपरिहार्य" पर सुधार आवश्यक; अन्य देशों को शामिल होने का न्योता।
  • कोस्टा की तीन प्राथमिकताएँ: यूएन चार्टर व विवादों का शांतिपूर्ण समाधान; जलवायु वित्त-सतत विकास-एआई; वैश्विक संस्थाओं का सुधार।

मेन्स दृष्टिकोण

वैश्विक व्यवस्था के पुनर्संतुलन के दौर में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों ने बहुपक्षीय संस्थाओं की वैधता और प्रभावशीलता पर प्रश्न खड़े किए हैं—यही पृष्ठभूमि पी4एम के गठन की है, जिसमें भारत सहित सात हस्ताक्षरकर्ता यूएन चार्टर आधारित व्यवस्था को "अपरिहार्य" मानते हुए भी उसके नवीकरण और सुधार की मांग करते हैं। जयशंकर का तर्क है कि "सुधारित बहुपक्षवाद" के लिए अधिक सहभागी विचार-विमर्श और पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया लंबे समय से लंबित है, और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, जलवायु न्याय, उभरती तकनीकों, विकास वित्त, आपूर्ति शृंखलाओं, महामारी तैयारी तथा आतंकवाद-निरोध पर सहयोग अनिवार्य है; संघर्षों के ईंधन, खाद्य, उर्वरक और वित्त पर पड़ने वाले असर से निपटना, नई क्षमताओं के लिए ढाँचे व सुरक्षा-कवच बनाना, तथा चोकपॉइंट-प्रभुत्व के खतरे के विरुद्ध डी-रिस्किंग व विविधीकरण उसकी ठोस मांगें हैं। आगे की राह मंच के अपने खाके में ही है—वरिष्ठ अधिकारियों का समन्वय चैनल, प्राथमिकता क्षेत्रों की पहचान, ठोस परिणाम, क्षेत्रीय संगठनों से निकट साझेदारी और अन्य देशों की भागीदारी—बशर्ते यह, जैसा संस्थापकों ने कहा, "एक और विशिष्ट गुट" बनने से बचे और वास्तव में संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधिक, प्रभावी व विश्वसनीय बनाने पर केंद्रित रहे।

मुख्य शब्द

पी4एम (P4M)
बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समृद्धि के भागीदार—21 सितंबर को न्यूयॉर्क में शुरू हुआ सात हस्ताक्षरकर्ताओं का नया मंच।
सुधारित बहुपक्षवाद
जयशंकर द्वारा रेखांकित विचार कि बहुपक्षीय संस्थाओं में अधिक सहभागी विचार-विमर्श और पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया लाई जाए।
यूएन चार्टर
संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक दस्तावेज़, जिसे संयुक्त घोषणा बहुपक्षीय व्यवस्था की नींव और "अपरिहार्य" बताती है।
डी-रिस्किंग और विविधीकरण
चोकपॉइंट-प्रभुत्व व व्यवधान के खतरे को घटाने के लिए आपूर्ति शृंखलाओं के स्रोत बढ़ाने की रणनीति, जिसे जयशंकर ने प्रोत्साहित किया।
मध्यम शक्तियाँ (Middle powers)
कार्नी की दावोस अपील में वे देश जिन्हें बहुपक्षवाद की रक्षा हेतु एकजुट होना चाहिए—पी4एम की वैचारिक जड़।
संयुक्त घोषणा (Joint declaration)
बैठक में जारी दस्तावेज़ जो निष्पक्ष, खुला, लचीला आर्थिक सहयोग, व्यापार व वित्तीय ढाँचे का सुधार और एआई-डिजिटल-वैश्विक स्वास्थ्य समन्वय का समर्थन करता है।

अभ्यास प्रश्न

  1. पी4एम जैसे "समान विचार वाले" समूह संयुक्त राष्ट्र सुधार की प्रक्रिया को मजबूत करते हैं या बहुपक्षीय व्यवस्था को और खंडित करते हैं? स्रोत में दिए तर्कों के आधार पर परीक्षण करें।
  2. "सुधारित बहुपक्षवाद" पर भारत के रुख की व्याख्या करें और बताएँ कि पी4एM की संयुक्त घोषणा के प्रावधान इस रुख से कैसे मेल खाते हैं।
  3. वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में "चोकपॉइंट प्रभुत्व" के जोखिम क्या हैं और डी-रिस्किंग व विविधीकरण उससे निपटने में कैसे सहायक हो सकते हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बरमहाराष्ट्र में सूखा राहत कैबिनेट उपसमिति गठित →
← सभी ख़बरें