प्रधानमंत्रियों के भोज पर नई किताब, नेहरू से मोदी तक

इस महीने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पूरी तरह शाकाहारी भोजन पर विवाद के बाद प्रधानमंत्रियों की मेज़ पर आधारित नई किताब चर्चा में है। पत्रकार पुरबी श्रीधर और संघिता सिंह की किताब 'द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल: डेलिकेसीज़ एंड डिप्लोमेसीज़ फ्रॉम द एरा ऑफ नेहरू टू मोदी' सात वर्ष से अधिक के साक्षात्कारों पर आधारित है और इसमें 14 अध्याय हैं। शेफ सुधीर सिबल के अनुसार, 1983 के चोगम के मसौदा मेन्यू में टर्की रोस्ट देखकर इंदिरा गांधी ने पूछा, "इन्हें बिरयानी क्यों नहीं दे सकते?"

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • All-vegetarian fare at this month's Brics Summit triggered controversy. — Stated in source without attribution to a named source; framed as background context.
  • 'The Prime Minister's Table: Delicacies and Diplomacies from the Era of Nehru to Modi' by Purabi Shridhar and Sanghita Singh draws on over seven years of interviews and has 14 chapters. — Attributed to the book and its authors in the source.
  • Indira Gandhi asked 'Why cannot you give them biryani?' about a turkey roast on the 1983 CHOGM draft menu. — Attributed in the book to chef Sudhir Sibal.
  • A 1956 office note said Nehru was 'not used to spice and chillies at all'. — Quoted from a document cited in the book; figure/date appears in source.
  • Manmohan Singh made 73 foreign visits in 10 years, including a 2009 White House state dinner serving green prawn curry. — Figures appear in the source as drawn from the book; not independently verifiable here.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

भोज का मेन्यू कभी महज़ रसोई का फ़ैसला नहीं होता — वह इस बात का संकेत होता है कि हर प्रधानमंत्री अपनी राजनीतिक पहचान कैसे पेश करना चाहता था। ख़बर स्वयं बताती है कि इस महीने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पूर्ण शाकाहारी भोज पर उठे विवाद के बाद इस किताब में दिलचस्पी बढ़ी, यानी भोजन आज भी राजनीतिक प्रतीकों की ज़मीन है। नेहरू का राजकीय भोजों का भारतीयकरण, इंदिरा गांधी का टर्की रोस्ट की जगह बिरयानी मांगना, वाजपेयी का चांदनी चौक की चाट मेज़ तक लाना — ये सब अलग-अलग दौर की राजनीतिक आत्म-प्रस्तुति हैं।

  • 1983 के चोगम में इंदिरा गांधी की बिरयानी की मांग और नेहरू द्वारा गुलदस्तों की जगह मालाएं व भारतीय व्यंजन लाना, औपनिवेशिक शैली से हटने के राष्ट्रवादी संकेत के तौर पर पढ़े जा सकते हैं।
  • मोरारजी देसाई का मद्यनिषेध, चरण सिंह की लौकी-केंद्रित मेज़ और देवेगौड़ा का रागी का गोला दिखाते हैं कि निजी आदतें नेताओं के सामाजिक-राजनीतिक आधार का संकेत भी बन जाती हैं।
  • किताब के मुताबिक मोदी के सरकारी मेन्यू उनके शाकाहारी भोजन के अनुरूप हैं; ब्रिक्स विवाद बताता है कि ऐसे चुनाव घरेलू खान-पान की राजनीति से जुड़ जाते हैं।
  • दूसरी ओर, शेफ सिबल का यह कहना कि राजकीय भोज "पूरी तरह प्रोटोकॉल से बंधे" होते हैं, इस चेतावनी जैसा है कि हर व्यंजन को वैचारिक बयान मानना अतिरेक होगा।
  • यह विवरण प्रधानमंत्रियों की पत्नियों — सोनिया गांधी, शीला गुजराल, गुरशरण कौर — को मेज़बानी पर चुपचाप असर रखने वाले वास्तविक प्रभाव-केंद्रों के रूप में भी सामने लाता है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि विरोधी दल किताब के इन प्रसंगों को अपनी खान-पान की राजनीति के पक्ष में कैसे इस्तेमाल करते हैं और ब्रिक्स मेन्यू की बहस आगे बढ़ती है या नहीं।

यह ख़बर यह स्पष्ट नहीं करती कि ब्रिक्स का शाकाहारी मेन्यू किसने तय किया, आपत्ति किसने उठाई, या सरकार की प्रतिक्रिया क्या रही।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

इस महीने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसे जाने पर उठे विवाद के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि भारत अपने आधिकारिक मेज़ पर मेहमानों को क्या परोसता है। पत्रकार पुरबी श्रीधर और संघिता सिंह की नई किताब 'द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल: डेलिकेसीज़ एंड डिप्लोमेसीज़ फ्रॉम द एरा ऑफ नेहरू टू मोदी' दिखाती है कि 1940 के दशक के अंत में जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजकीय भोजों का भारतीयकरण शुरू करने के बाद से मेन्यू हर नेता की रुचि और राजनीति को दर्शाता रहा है। किताब सात वर्ष से अधिक के साक्षात्कारों पर आधारित है और इसमें 14 अध्याय हैं। यह भोजन को कूटनीति (गैस्ट्रो-डिप्लोमेसी) और प्रोटोकॉल के एक औज़ार के रूप में देखने का अवसर देती है।

मुख्य तथ्य

  • किताब 'द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल: डेलिकेसीज़ एंड डिप्लोमेसीज़ फ्रॉम द एरा ऑफ नेहरू टू मोदी' पत्रकार पुरबी श्रीधर और संघिता सिंह ने लिखी है; सात वर्ष से अधिक के साक्षात्कार, 14 अध्याय।
  • 1983 के राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्ष सम्मेलन (CHOGM) के मसौदा मेन्यू में टर्की रोस्ट देखकर इंदिरा गांधी ने पूछा, "इन्हें बिरयानी क्यों नहीं दे सकते?" — शेफ सुधीर सिबल के अनुसार रसोई ने मान लिया।
  • नेहरू के दौर में बुके की जगह माला और मेन्यू में भारतीय व्यंजन आए; टोस्ट संतरे के रस से उठाए जाते थे — चित्रकार अंजोली एला मेनन के विवरण के हवाले से।
  • 1956 के एक कार्यालय नोट में कहा गया कि नेहरू "मसाले और मिर्च के आदी बिल्कुल नहीं" थे।
  • 1962 में यूपी के मुख्यमंत्री चंद्र भानु गुप्ता के आग्रह पर लखनऊ के स्वागत समारोह हेतु शेफ इम्तियाज़ क़ुरैशी ने लौकी की 'मछली', कटहल का 'मुर्ग मुसल्लम' और बैंगन के 'चिकन लेग' बनाए।
  • मोरारजी देसाई की मद्यनिषेध नीति के कारण 1977 में सोवियत नेता लियोनिद ब्रेज़नेव के भोज में टोस्ट मिनरल वाटर से उठाए गए — पूर्व विदेश सचिव के. रघुनाथ के अनुसार।
  • मनमोहन सिंह ने 10 वर्षों में 73 विदेश यात्राएँ कीं, यानी लगभग सात प्रति वर्ष; 2009 के व्हाइट हाउस राजकीय भोज में ग्रीन प्रॉन करी परोसी गई।
  • 2017 में इज़राइल ने नरेंद्र मोदी के लिए भारतीय शाकाहारी रात्रिभोज रखा; 2015 के यूएई भोज शेफ संजीव कपूर ने बनाए।

समयरेखा

  1. 1940 के दशक का अंतनेहरू ने राजकीय भोजों का स्वरूप बदला — बुके की जगह माला, मेन्यू में भारतीय व्यंजन, संतरे के रस से टोस्ट।
  2. 1956एक कार्यालय नोट में दर्ज कि नेहरू मसाले और मिर्च के आदी नहीं थे।
  3. 1962लखनऊ के स्वागत समारोह के लिए इम्तियाज़ क़ुरैशी ने पूर्ण शाकाहारी मेन्यू तैयार किया; नेहरू ने कहा, "इम्तियाज़, तुमने सचमुच रिकॉर्ड तोड़ दिया।"
  4. 1977ब्रेज़नेव के भोज में मोरारजी देसाई के लिए मिनरल वाटर से टोस्ट; शराब नहीं परोसी गई।
  5. 1983CHOGM के मसौदा मेन्यू में टर्की रोस्ट पर इंदिरा गांधी का सवाल — "इन्हें बिरयानी क्यों नहीं दे सकते?"
  6. राजीव गांधी का कार्यकालभोज प्लेटेड 'नूवेल क्यूज़ीन' की ओर मुड़े; शेफ सिबल और एम.एस. गुप्ता ने ब्रिटेन में तीन महीने प्रशिक्षण लिया।
  7. आगरा शिखर सम्मेलन (वाजपेयी काल)परवेज़ मुशर्रफ की यात्रा के भोज में श्रीमती मुशर्रफ ने मुलिगाटॉनी सूप की विधि मांगी।
  8. 2009मनमोहन सिंह के लिए व्हाइट हाउस राजकीय भोज, जिसमें ग्रीन प्रॉन करी परोसी गई।
  9. 2015मोदी के यूएई भोज शेफ संजीव कपूर ने तैयार किए।
  10. 2017इज़राइल ने मोदी के लिए भारतीय शाकाहारी रात्रिभोज आयोजित किया।

किसका दाँव

  • प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय/प्रोटोकॉल तंत्र — राजकीय भोज "पूरी तरह रेजिमेंटल और प्रोटोकॉल से बंधे" होते हैं (सुधीर सिबल); मेन्यू से देश की छवि जुड़ी है।
  • शेफ (सुधीर सिबल, एम.एस. गुप्ता, इम्तियाज़ क़ुरैशी, संजीव कपूर) — नेता की आहार-रुचि, स्वास्थ्य और कूटनीतिक आवश्यकता के बीच संतुलन बनाकर मेन्यू गढ़ना।
  • प्रधानमंत्रियों के परिवार (सोनिया गांधी, शीला गुजराल, गुरशरण कौर, सीता कुमारी) — मेन्यू, क्रॉकरी और मेज़बानी की निगरानी; सीता कुमारी कहती हैं वे किसी आधिकारिक भोज में शामिल नहीं हुईं।
  • विदेशी मेहमान व मेज़बान देश — भारतीय नेताओं की आहार-आदतों के अनुसार व्यवस्था — जैसे देसाई के लिए मिनरल वाटर, मोदी के लिए शाकाहारी भोज।
  • द अशोक होटल व हैदराबाद हाउस जैसी आतिथ्य संस्थाएँ — राजकीय भोज की तैयारी; गुजराल के दो मेन्यू और राव के लिए ताज़ा फुल्के बनाने वाला रसोइया इसी व्यवस्था का हिस्सा।
  • किताब के लेखक और पाठक — सात वर्ष के साक्षात्कारों से बना यह अभिलेख भारत की खान-पान कूटनीति का दस्तावेज़ीकरण करता है।

क्यों अहम है

राजकीय भोज केवल खाना नहीं, कूटनीति का औज़ार और नेतृत्व की राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान का संकेत है — नेहरू के भारतीयकरण से इंदिरा की बिरयानी और मोदी के शाकाहारी मेन्यू तक। ब्रिक्स में शाकाहारी भोजन पर विवाद बताता है कि मेहमानों की पसंद, मेज़बान की आस्था और प्रोटोकॉल के बीच संतुलन आज भी संवेदनशील प्रश्न है। यह किताब सात वर्ष के साक्षात्कारों के ज़रिए इस कम दर्ज हुए संस्थागत इतिहास को सामने लाती है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • किताब: 'द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल: डेलिकेसीज़ एंड डिप्लोमेसीज़ फ्रॉम द एरा ऑफ नेहरू टू मोदी' — लेखक पुरबी श्रीधर व संघिता सिंह, 14 अध्याय।
  • CHOGM = राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्ष सम्मेलन; 1983 का CHOGM और इंदिरा गांधी की बिरयानी वाली टिप्पणी।
  • 1962 लखनऊ: शेफ इम्तियाज़ क़ुरैशी का लौकी की 'मछली' व कटहल के 'मुर्ग मुसल्लम' वाला शाकाहारी मेन्यू।
  • मनमोहन सिंह: 10 वर्ष में 73 विदेश यात्राएँ; 2009 का व्हाइट हाउस राजकीय भोज।
  • 1977: ब्रेज़नेव के भोज में मोरारजी देसाई के लिए मिनरल वाटर से टोस्ट (मद्यत्याग)।
  • वाजपेयी: आगरा शिखर सम्मेलन के भोज में मुलिगाटॉनी सूप; चांदनी चौक की चाट-जलेबी निजी पार्टियों में।

मेन्स दृष्टिकोण

भारत की 'गैस्ट्रो-डिप्लोमेसी' का इतिहास बताता है कि राजकीय भोज का मेन्यू नेता की व्यक्तिगत रुचि, स्वास्थ्य, आस्था और राष्ट्रीय आत्म-छवि के प्रतिच्छेदन पर बनता है। नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद बुके की जगह माला और मेन्यू में भारतीय व्यंजन लाकर औपनिवेशिक औपचारिकता का भारतीयकरण किया; इंदिरा गांधी ने 1983 के CHOGM में टर्की रोस्ट के बजाय बिरयानी का आग्रह कर 'भारतीयता' को कूटनीतिक संकेत बनाया; राजीव गांधी के दौर में प्लेटेड नूवेल क्यूज़ीन और ब्रिटेन में शेफ का प्रशिक्षण वैश्विक आधुनिकता की ओर झुकाव दिखाता है; मोरारजी देसाई का मद्यत्याग, देवेगौड़ा का रागी बॉल, नरसिंह राव की दाल-फुल्का और मोदी का शाकाहारी आहार दर्शाते हैं कि व्यक्तिगत अनुशासन कैसे प्रोटोकॉल को ढालता है। इसके निहितार्थ दोहरे हैं — भोजन नरम शक्ति (सॉफ्ट पावर) और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम है ("किसी देश की संस्कृति जानने के लिए उसका खाना खाना पड़ता है"), लेकिन ब्रिक्स के पूर्णतः शाकाहारी भोजन पर विवाद बताता है कि मेज़बान की पसंद और मेहमानों की विविधता के बीच संतुलन न बने तो यह विवाद का विषय बन जाता है। आगे का रास्ता सिबल की उस टिप्पणी में निहित है कि भोज "रेजिमेंटल और प्रोटोकॉल से बंधे" होते हैं — यानी संस्थागत प्रोटोकॉल, विकल्पों की उपलब्धता और मेहमानों की आहार-प्राथमिकताओं का पूर्व-संज्ञान ही कूटनीतिक शिष्टाचार की कुंजी है।

मुख्य शब्द

CHOGM
राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्ष सम्मेलन; 1983 के आयोजन के मसौदा मेन्यू पर इंदिरा गांधी ने बिरयानी का सुझाव दिया।
राजकीय भोज (स्टेट बैंक्वेट)
विदेशी मेहमानों के सम्मान में सरकारी स्तर का औपचारिक भोज, जो शेफ सिबल के शब्दों में पूरी तरह प्रोटोकॉल से बंधा होता है।
नूवेल क्यूज़ीन
हल्की, रसोई में ही प्लेट पर सजाकर परोसी जाने वाली शैली, जो राजीव गांधी के काल में राजकीय भोजों में आई।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
बहुपक्षीय शिखर बैठक, जिसमें इस महीने पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसे जाने पर विवाद हुआ।
आगरा शिखर सम्मेलन
परवेज़ मुशर्रफ की भारत यात्रा से जुड़ी शिखर बैठक, जिसके भोज में मुलिगाटॉनी सूप परोसा गया।
हैदराबाद हाउस
दिल्ली स्थित आधिकारिक आतिथ्य स्थल, जहाँ पी.वी. नरसिंह राव के लिए ताज़ा फुल्के बनाने हेतु रसोइया तैनात था।

अभ्यास प्रश्न

  1. राजकीय भोज को 'नरम शक्ति' और कूटनीति का साधन कैसे माना जा सकता है? नेहरू से मोदी तक के उदाहरणों से समझाइए।
  2. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पूर्णतः शाकाहारी भोजन पर हुए विवाद के आलोक में चर्चा कीजिए कि मेज़बान देश की सांस्कृतिक पहचान और मेहमानों की विविध आहार-प्राथमिकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
  3. भारत में राजकीय आतिथ्य के प्रोटोकॉल के विकास पर प्रधानमंत्रियों की व्यक्तिगत रुचियों और अनुशासन के प्रभाव का परीक्षण कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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