राजनीति ओडिशा

ओडिशा में एसआईआर पूरा, 17.67 लाख नाम सूची से हटे

ओडिशा की मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सोमवार को पूरा हुआ। मुख्य निर्वाचन अधिकारी आर.एस. गोपालन के अनुसार राज्य के मतदाताओं में करीब 17.67 लाख नाम कम हुए, यानी शुद्ध कटौती लगभग 5.3 प्रतिशत। एसआईआर से पहले 3,33,99,591 मतदाता थे, जबकि 21 सितंबर को प्रकाशित अंतिम सूची में 3,16,32,754 रहे। केवल केरल (3.22%) की दर कम रही, गुजरात (13.4%) और उत्तर प्रदेश (13.2%) में अधिक। ओडिशा में गणना फॉर्म वापसी दर 93.97% रही।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#sir#electoral rolls#election commission#odisha#voter deletion

डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Odisha's electorate fell by about 17.67 lakh names, a net deletion of around 5.3%, after the SIR concluded on Monday. — Attributed to Chief Electoral Officer R.S. Gopalan in the source; figures appear in source text.
  • Pre-SIR electors numbered 3,33,99,591; draft roll (July 5) 3,13,87,034; final roll (September 21) 3,16,32,754. — Figures appear in source; internally consistent with the stated net reduction.
  • Deletion rates: Kerala 3.22%, Rajasthan 5.74%, Bihar 5.95%, MP 5.97%, UP about 13.2%, Gujarat 13.4%. — Attributed to ECI figures in the source.
  • Nationally about 70% of exclusions were due to migration or absence, 21% deceased and 9% duplicate registrations. — Figure appears in source without a named official source; presented as national data.
  • Form-7 applications in Bhadrak district sought deletion of minority voters' names. — Source explicitly states these are reported allegations, not an established finding; attribute carefully.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ओडिशा में एसआईआर का समापन एक साफ राजनीतिक संकेत देता है — 5.3 प्रतिशत शुद्ध कटौती के साथ यहाँ विवाद गुजरात, यूपी या बंगाल जैसी तीव्रता तक नहीं पहुँचा। गणना फॉर्म की 93.97 प्रतिशत वापसी दर बताती है कि ज़मीनी मशीनरी और पार्टियों के बूथ स्तरीय नेटवर्क, दोनों सक्रिय रहे; रिपोर्ट के अनुसार बीजेडी ने एसआईआर शुरू होने से पहले ही चुनाव आयोग से प्रवासी श्रमिकों के नाम न हटाने का आग्रह किया था। फिर भी मसौदा चरण में 20 लाख से अधिक नाम हटने पर भाजपा, बीजेडी और कांग्रेस के बीच बहस छिड़ी, यानी राजनीतिक अध्याय अभी बंद नहीं हुआ।

  • ओडिशा की तुलनात्मक रूप से कम कटौती दर राज्य में एसआईआर-विरोधी राजनीतिक गुस्से की धार कम कर सकती है, जो प्रशासनिक तंत्र के लिए राहत है।
  • रिपोर्ट संकेत देती है कि लगभग ढाई दशक के शासन में बने बीजेडी के निर्वाचन क्षेत्र-स्तरीय कैडर ने जाँच और स्थानीय सत्यापन में भूमिका निभाई — विपक्ष में रहकर भी संगठनात्मक ताकत बची होने का प्रमाण।
  • कांग्रेस की अधिक समय और जन-जागरूकता अभियान की मांग हटाए गए मतदाताओं के साथ खड़े होकर प्रासंगिक बने रहने की कोशिश दिखती है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 70 प्रतिशत बहिष्करण पलायन या अनुपस्थिति से जुड़े थे, और रिपोर्ट में उद्धृत विश्लेषण कहता है कि गरीब व कम पढ़े वर्ग सबसे कमज़ोर हैं — यह सवाल जीवित रहता है कि नुकसान किसके वोट बैंक को उठाना पड़ा।
  • भद्रक में अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम हटाने वाले फॉर्म-7 आवेदनों पर उठे आरोप स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक राजनीति की गुंजाइश बनाते हैं — लेकिन ये आरोप हैं, सिद्ध निष्कर्ष नहीं।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि कटे नाम वाले कितने मतदाता जिला कलेक्टर और सीईओ के पास अपील या फॉर्म-6 का सहारा लेते हैं, और पार्टियाँ इसे कैडर-आधारित अभियान में बदलती हैं या नहीं।

यह रिपोर्ट यह स्थापित नहीं करती कि किस दल को कितना नुकसान हुआ या किन सामाजिक वर्गों पर सबसे अधिक असर पड़ा, और भद्रक के आरोप चुनाव अधिकारियों के विरुद्ध सिद्ध निष्कर्ष नहीं हैं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

चुनाव आयोग द्वारा देशभर में चलाए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत ओडिशा में यह प्रक्रिया सोमवार को पूरी हुई। इसमें गणना फॉर्म भरवाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जाता है और मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, अप्राप्य या दोहरी प्रविष्टि वाले नाम हटाए जाते हैं। ओडिशा में शुद्ध रूप से लगभग 17.67 लाख नाम घटे, जो कई बड़े राज्यों की तुलना में कम कटौती दर है। मसौदा चरण में 20 लाख से अधिक नाम हटने पर बीजेडी, कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक विवाद भी हुआ।

मुख्य तथ्य

  • मुख्य निर्वाचन अधिकारी आर.एस. गोपालन के अनुसार ओडिशा के मतदाताओं में लगभग 17.67 लाख नाम कम हुए, यानी शुद्ध कटौती करीब 5.3%।
  • एसआईआर से पहले ओडिशा में 3,33,99,591 मतदाता थे; 5 जुलाई की मसौदा सूची में 3,13,87,034 और 21 सितंबर की अंतिम सूची में 3,16,32,754 मतदाता।
  • कटौती दर तुलना: केरल 3.22%, ओडिशा ~5.3%, राजस्थान 5.74%, बिहार 5.95%, मध्य प्रदेश 5.97%, पुदुचेरी 7.5%, गोवा 10.75%, तमिलनाडु 11.55%, छत्तीसगढ़ 11.77%, पश्चिम बंगाल ~11.9%, उत्तर प्रदेश ~13.2%, गुजरात 13.4%।
  • ओडिशा में गणना फॉर्म वापसी दर 93.97% रही; केवल 6.03% यानी लगभग 20 लाख लोगों ने फॉर्म जमा नहीं किया और मसौदा चरण में बाहर हुए।
  • मसौदा चरण की करीब 20.12 लाख कटौतियों में 8.32 लाख मृत मतदाता, 10.07 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित/अप्राप्य और 1.58 लाख दोहरी प्रविष्टियाँ थीं।
  • राष्ट्रीय स्तर पर बहिष्करण के कारण: प्रवास/अनुपस्थिति ~70%, मृत मतदाता 21%, दोहरी या बहु-स्थान प्रविष्टि 9%।
  • प्रवास से जुड़े बहिष्करण उत्तर प्रदेश में 75% और महाराष्ट्र व कर्नाटक में 74% प्रत्येक रहे।
  • 2023 में ओडिशा के सीईओ ने विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान चलाकर लगभग 3.45 लाख मृत मतदाताओं के नाम हटाए थे।

समयरेखा

  1. 2023ओडिशा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान चलाकर करीब 3.45 लाख मृत मतदाताओं के नाम हटाए।
  2. अगस्त 2025एसआईआर शुरू होने से पहले विपक्षी बीजू जनता दल ने चुनाव आयोग से आग्रह किया कि प्रवासी श्रमिकों के नाम सूची से न हटाए जाएँ।
  3. 5 जुलाईओडिशा की मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित, जिसमें 3,13,87,034 मतदाता थे; 20 लाख से अधिक नाम हटने पर राजनीतिक बहस छिड़ी।
  4. 21 सितंबरअंतिम मतदाता सूची प्रकाशित, जिसमें 3,16,32,754 मतदाता दर्ज।
  5. सोमवार (कथित तिथि स्रोत में नहीं)ओडिशा में एसआईआर प्रक्रिया औपचारिक रूप से पूरी होने की घोषणा।

किसका दाँव

  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) — 30 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर संचालित कर रहा है; सूची की शुद्धता और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उसकी विश्वसनीयता दांव पर।
  • ओडिशा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी आर.एस. गोपालन — राज्य में एसआईआर के आँकड़े घोषित किए; हटाए गए नामों की अपील का दूसरा स्तर उनके पास।
  • हटाए गए 17.67 लाख मतदाता — मताधिकार पर सीधा असर; जिला कलेक्टर व सीईओ के पास अपील या फॉर्म 6 से नए समावेशन का रास्ता।
  • प्रवासी/मौसमी श्रमिक — ओडिशा का बाहरी प्रवास मुख्यतः मौसमी होने से वे 'स्थायी स्थानांतरित' श्रेणी से बचे, पर देशभर में प्रवास ही 70% बहिष्करण का कारण।
  • बीजू जनता दल (बीजेडी) — प्रवासी मतदाताओं के नाम न हटाने की मांग की; पारदर्शिता की कमी और हटाए नामों के विवरण के खुलासे पर सवाल उठाए।
  • कांग्रेस और भाजपा — कांग्रेस ने अधिक समय और जन-जागरूकता अभियान की मांग की; मसौदा चरण की कटौतियों पर तीनों दलों के बीच राजनीतिक बहस।
  • निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) — पुनः समावेशन के दावों की जाँच; संतुष्ट होना होगा कि व्यक्ति पात्र और उस क्षेत्र का सामान्य निवासी है।

क्यों अहम है

मतदाता सूची लोकतंत्र का आधार है—गलत विलोपन का मतलब है मताधिकार से वंचित होना, और शोध बताता है कि महिलाएँ, ग्रामीण, कम साक्षर, अल्पसंख्यक, युवा और दिव्यांग इस जोखिम के सबसे निकट हैं। ओडिशा की तुलनात्मक रूप से कम 5.3% कटौती दर दिखाती है कि उच्च फॉर्म वापसी, पूर्व सत्यापन और स्थानीय राजनीतिक निगरानी से बहिष्करण घटाया जा सकता है। साथ ही अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद भी बहाली का बोझ मतदाता पर पड़ता है, जो प्रक्रियात्मक न्याय का सवाल उठाता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • एसआईआर के बाद ओडिशा में मतदाता 3,33,99,591 से घटकर 3,16,32,754 (21 सितंबर की अंतिम सूची) रह गए; शुद्ध कटौती ~5.3%।
  • सबसे अधिक कटौती दर: गुजरात 13.4%, उत्तर प्रदेश ~13.2%; सबसे कम केरल 3.22%।
  • मसौदा चरण में तीसरे चरण के 17 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में ओडिशा की 6.03% कटौती दर दूसरी सबसे कम रही, मिजोरम (5.27%) के बाद; सभी 30 राज्यों/यूटी में सबसे कम लक्षद्वीप में।
  • राष्ट्रीय स्तर पर बहिष्करण: प्रवास/अनुपस्थिति ~70%, मृत्यु 21%, दोहरी प्रविष्टि 9%।
  • हटाए गए मतदाता पहले जिला कलेक्टर और फिर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास अपील कर सकते हैं; नए समावेशन के लिए फॉर्म 6।
  • फॉर्म-7 का उपयोग नाम हटाने के आवेदन के लिए होता है—भद्रक जिले में इसके दुरुपयोग के आरोप लगे।

मेन्स दृष्टिकोण

ओडिशा का एसआईआर अनुभव दर्शाता है कि मतदाता सूची शुद्धिकरण और मताधिकार संरक्षण के बीच संतुलन प्रशासनिक तैयारी पर निर्भर करता है। राज्य में 93.97% गणना फॉर्म वापसी, कम दोहरी प्रविष्टियाँ (20.12 लाख मसौदा कटौतियों में केवल 1.58 लाख), मौसमी/चक्रीय प्रवास की प्रकृति जिसमें श्रमिक स्थायी पता बनाए रखते हैं, तथा 2023 के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण में 3.45 लाख मृत नामों की पूर्व-सफाई—इन कारणों से कटौती दर 5.3% रही, जबकि गुजरात (13.4%) और उत्तर प्रदेश (~13.2%) में यह दोगुने से अधिक थी। विपक्षी बीजेडी की अगस्त 2025 की अपील और बूथ-स्तरीय कैडर निगरानी ने अधिकारियों को प्रवासी व मौसमी अनुपस्थित मतदाताओं पर सतर्क रखा—यह दिखाता है कि राजनीतिक दलों की भागीदारी सुधार का उपकरण बन सकती है। पर चिंताएँ बनी हुई हैं: मसौदा चरण में 20 लाख से अधिक नाम हटने पर पारदर्शिता के सवाल, भद्रक में फॉर्म-7 के जरिए अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम हटाने के आरोप (जो आरोप हैं, सिद्ध निष्कर्ष नहीं), और यह तथ्य कि "स्थायी स्थानांतरित" या "अप्राप्य" के आधार पर हटाए व्यक्ति को अब स्वयं सिद्ध करना पड़ता है कि निष्कर्ष गलत था—आधार या पुराना मतदाता पहचान पत्र बहाली की गारंटी नहीं। आगे का रास्ता: हटाए नामों के कारणों का सार्वजनिक खुलासा, जन-जागरूकता अभियान, अपील प्रक्रिया की समयबद्धता और प्रवासी मतदाताओं के लिए व्यावहारिक पंजीकरण विकल्प।

मुख्य शब्द

एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण)
चुनाव आयोग का अभियान जिसमें गणना फॉर्म के जरिए मतदाताओं का घर-घर सत्यापन कर अपात्र/दोहरे/मृत नाम हटाए जाते हैं।
गणना फॉर्म
एसआईआर में मतदाता को भरकर लौटाना होता है; ओडिशा में वापसी दर 93.97% रही, न लौटाने वाले 6.03% मसौदा चरण में बाहर हुए।
फॉर्म 6 / फॉर्म 7
फॉर्म 6 नए नाम जोड़ने के लिए आवेदन; फॉर्म 7 किसी नाम को सूची से हटाने की मांग के लिए आवेदन।
ईआरओ (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी)
वह अधिकारी जिसे संतुष्ट होना होता है कि आवेदक पात्र और उस निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी है।
विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण
सूची अद्यतन का नियमित/संक्षिप्त अभियान; 2023 में ओडिशा में इससे ~3.45 लाख मृत मतदाता हटाए गए।
International IDEA
लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्थान, जहाँ प्रो. बनस्मिता बोरा ने कमजोर वर्गों के मताधिकार-वंचन पर लिखा।

अभ्यास प्रश्न

  1. ओडिशा में एसआईआर के तहत कटौती दर (5.3%) गुजरात और उत्तर प्रदेश की तुलना में काफी कम क्यों रही? प्रशासनिक और सामाजिक-आर्थिक कारणों की चर्चा करें।
  2. मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण में प्रवासी श्रमिकों के मताधिकार की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है? उपाय सुझाएँ।
  3. "मतदाता सूची की शुद्धता और समावेशन परस्पर विरोधी लक्ष्य नहीं हैं।" एसआईआर के अनुभव के आलोक में परीक्षण करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बरआईआईटी बॉम्बे विवाद: प्रो. दूल्ला के समर्थन में रामगोपाल राव →
← सभी ख़बरें