कृषि कोकरनाग

कश्मीर में मध्यम आकार के ग्राफ्टेड अखरोट पेड़ों को बढ़ावा

जम्मू-कश्मीर, जहां सालाना 3.5 लाख टन अखरोट यानी देश के कुल उत्पादन का करीब 90 प्रतिशत होता है, अब शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (स्कुआस्ट) के साथ मध्यम आकार के ग्राफ्टेड पेड़ों को बढ़ावा दे रहा है। राज्य में लगभग 80,000 हेक्टेयर में अखरोट की खेती है, जिसमें अधिकतर बीज से उगे पेड़ हैं। कैलिफोर्निया और चिली से मुकाबले के बीच एकरूप गुणवत्ता लक्ष्य है। किसान कहते हैं नई किस्मों में परंपरागत स्वाद नहीं है।

स्रोत

Times of India — Top · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#walnut#horticulture#jammu kashmir#skuast#farming#exports

डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • J&K produces 3.5 lakh tonnes of walnuts annually, about 90% of India's output — Figure appears in source without attribution to a specific agency.
  • J&K has about 80,000 hectares under walnut cultivation, mostly seedling-origin trees — Stated in source; sits awkwardly with the later claim that grafting has spread over nearly 90,000 hectares.
  • Grafting-based cultivation has spread over nearly 90,000 hectares despite lack of subsidies — Attributed to Imtiyaz Ahmad Lone, head of SKUAST's Walnut Research Centre.
  • Valley healthcare units treat dozens of patients each year after falls from walnut trees — Attributed to Dr Mohd Yaqoob Bhat, surgeon at Paras Hospital, Srinagar; no official data cited.
  • CM Omar Abdullah opposed a bill allowing landowners to cut walnut trees on private property in March — Attributed to assembly debate as reported in source; no document cited.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

यह मूलतः उत्पादकता और उत्पाद-मानकीकरण की कोशिश है — अखरोट में जम्मू-कश्मीर की घरेलू पकड़ लगभग एकाधिकार जैसी है (देश के कुल उत्पादन का करीब 90%, सालाना 3.5 लाख टन), लेकिन कैलिफोर्निया और चिली के एक-समान, पतले छिलके वाले अखरोट से निर्यात बाज़ार में कीमत का दबाव है। कलमी, मध्यम ऊंचाई के पेड़ जल्दी फल, उसी 80,000 हेक्टेयर में घनी रोपाई और वह एकरूपता देते हैं जिसके लिए निर्यात खरीदार ज़्यादा दाम देते हैं; दूसरी तरफ पारंपरिक कश्मीरी अखरोट के स्वाद पर मिलने वाला प्रीमियम किसानों की नज़र में उनकी असली मोलभाव-ताकत है। कहानी एक ऐसी लागत की ओर भी इशारा करती है जो पैदावार के हिसाब में नहीं आती — ऊंचे पेड़ों से गिरने की चोटें और लकड़ी के शिल्प उद्योग पर असर।

  • कलम लगाने का आर्थिक तर्क सीधा है — कम समय में फल, घनी रोपाई और आकार-रंग की एकरूपता प्रति हेक्टेयर वास्तविक आय और बेहतर निर्यात चैनल खोलती है।
  • किसानों का विरोध भी भावनात्मक भर नहीं, आर्थिक है: अगर पारंपरिक अखरोट को स्वाद के कारण ऊंचा दाम मिलता है, तो एकरूप किस्मों की ओर जाना एक ख़ास बाज़ार-लाभ को मात्रा से बदलना हो सकता है।
  • स्रोत के मुताबिक अब तक का प्रसार सब्सिडी के बिना हुआ है, जिससे कुछ व्यावसायिक खिंचाव तो दिखता है, पर बदलाव की लागत — पुनर्रोपण के वर्षों में छूटी आय — मुख्यतः किसान पर ही पड़ती है।
  • पेड़ों की ऊंचाई घटाने का एक बिना-कीमत वाला सुरक्षा लाभ है: कहानी में गिरने और रीढ़ की गंभीर चोटों का ज़िक्र है, जिसका इलाज और श्रम-हानि का बोझ आज परिवार उठाते हैं।
  • लकड़ी शिल्प क्षेत्र दूसरे दर्जे का नुकसान झेलता दिखता है, और कटाई पर कानूनी रोक तथा विधानसभा में हुई बहस बताती है कि लकड़ी की आपूर्ति और संरक्षण के लक्ष्य आपस में टकरा रहे हैं।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि सरकार इस अभियान के साथ सब्सिडी, पौध सामग्री की आपूर्ति और दाम-प्राप्ति के आंकड़े जोड़ती है या नहीं — यह प्रमाण न मिले कि कलमी अखरोट प्रति किलो ज़्यादा कमाते हैं, और बदलाव-अवधि में सहारा न हो, तो अपनाने की रफ्तार असमान रहने की आशंका है।

कहानी कलमी और पारंपरिक अखरोट की तुलनात्मक कीमतों, आय या निर्यात कमाई का कोई आंकड़ा नहीं देती, न यह कि वास्तव में कितने हेक्टेयर या परिवार बदल चुके हैं — इसलिए किसानों को शुद्ध वित्तीय लाभ कितना होगा, यह अनिश्चित है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

कश्मीर में सदियों से अखरोट के पेड़ बीज से उगाए जाते रहे हैं, जिससे हर पेड़ अपनी अलग किस्म बन जाता है और फलों के आकार, रंग व गुणवत्ता में एकरूपता नहीं रहती। जम्मू-कश्मीर सालाना 3.5 लाख टन अखरोट पैदा करता है, जो देश के कुल उत्पादन का करीब 90% है, लेकिन कैलिफोर्निया और चिली की पतले छिलके वाली किस्मों से वैश्विक बाजार में मुकाबला कड़ा है। अब जम्मू-कश्मीर प्रशासन और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (स्कुआस्ट) मध्यम आकार के ग्राफ्टेड (कलमी) अखरोट पेड़ों को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि बिखरे बागानों की जगह ज्ञात किस्मों के व्यवस्थित बाग बनें। किसानों का एक वर्ग नई किस्मों के स्वाद को परंपरागत कश्मीरी अखरोट के मुकाबले कमतर मानता है।

मुख्य तथ्य

  • जम्मू-कश्मीर में सालाना 3.5 लाख टन अखरोट उत्पादन, जो देश के कुल उत्पादन का करीब 90% है।
  • राज्य में लगभग 80,000 हेक्टेयर क्षेत्र अखरोट की खेती के अंतर्गत, जिसमें अधिकतर बीज से उगे (seedling-origin) पेड़ हैं।
  • स्कुआस्ट के वॉलनट रिसर्च सेंटर के प्रमुख प्रो. इम्तियाज अहमद लोन के अनुसार, सब्सिडी के अभाव के बावजूद ग्राफ्टिंग आधारित खेती लगभग 90,000 हेक्टेयर में फैल चुकी है।
  • परंपरागत बीज से उगे अखरोट पेड़ कीटनाशक के बिना फल देने में लगभग 15 वर्ष ले सकते हैं; ग्राफ्टेड पेड़ जल्दी फल देते हैं।
  • स्कुआस्ट में फ्रूट साइंस विभाग प्रमुख प्रो. अशफाक ए. पंडित: "बीज बोने पर जो उगता है वही पेड़ बन जाता है; हर पेड़ अपने आप में एक किस्म है।"
  • पुलवामा के 50 साल से इस कारोबार में लगे किसान मोहम्मद सुल्तान का दावा: नई किस्में स्वाद में मुकाबला नहीं करतीं, भुरभुरी और बेस्वाद हैं।
  • श्रीनगर के पारस अस्पताल के सर्जन डॉ. मोहम्मद याकूब भट के अनुसार, घाटी के अस्पतालों में हर साल दर्जनों मरीज अखरोट पेड़ से गिरने के बाद आते हैं, कुछ को गंभीर रीढ़ की चोट।
  • जम्मू-कश्मीर में सरकारी अनुमति के बिना अखरोट के पेड़ नहीं काटे जा सकते।

समयरेखा

  1. पीढ़ियों से (परंपरागत रूप से)कश्मीर में अखरोट के पेड़ बीज से उगाए जाते रहे, जिससे प्रत्येक पेड़ अलग किस्म बना।
  2. मार्च (इस वर्ष, स्रोत में माह उल्लिखित)विधानसभा में निजी भूमि पर अखरोट पेड़ काटने की अनुमति देने वाले विधेयक पर बहस; मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विरोध किया और प्रतिबंध का बचाव किया।
  3. वर्तमान (कटाई का मौसम, बुधवार को मंडी में सायर उत्सव)कोकरनाग के गोहान गांव में शबीर अहमद सहित ग्रामीण ऊंचे पेड़ों से बिना सुरक्षा उपकरण अखरोट तोड़ते दिखे; एक अखरोट एक रुपये में बिका।
  4. वर्तमान में जारीजम्मू-कश्मीर और स्कुआस्ट मध्यम आकार के ग्राफ्टेड अखरोट पेड़ों तथा नई जारी किस्मों को बढ़ावा दे रहे हैं।

किसका दाँव

  • अखरोट किसान/ग्रामीण (जैसे गोहान के शबीर अहमद, पुलवामा के मोहम्मद सुल्तान) — आय, परंपरागत स्वाद और पहचान; ऊंचे पेड़ों पर चढ़ने का जोखिम तथा नई किस्मों को अपनाने की दुविधा।
  • स्कुआस्ट (शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय) व इसका वॉलनट रिसर्च सेंटर — नई किस्में जारी करना, ग्राफ्टिंग तकनीक का प्रसार, एकरूप गुणवत्ता और निर्यात क्षमता बढ़ाना।
  • जम्मू-कश्मीर सरकार व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला — बागवानी उत्पादकता बढ़ाना, साथ ही अखरोट और चिनार पेड़ों के संरक्षण हेतु कटाई पर प्रतिबंध बनाए रखना।
  • अखरोट की लकड़ी पर आधारित हस्तशिल्प उद्योग — पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध और परंपरागत ऊंचे पेड़ों से ग्राफ्टेड मध्यम पेड़ों की ओर बदलाव से कच्चे माल पर असर।
  • स्वास्थ्य तंत्र/घाटी के अस्पताल (जैसे पारस अस्पताल, श्रीनगर) — कटाई के मौसम में पेड़ से गिरने की चोटों, विशेषतः रीढ़ की गंभीर चोटों का इलाज; कोई तंत्र न होने की समस्या।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धी (कैलिफोर्निया, चिली की पतले छिलके वाली किस्में) — एकरूप गुणवत्ता वाले अखरोट से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कश्मीरी अखरोट पर दबाव।

क्यों अहम है

देश के लगभग 90% अखरोट जम्मू-कश्मीर से आते हैं, इसलिए वहां की खेती का स्वरूप भारत की निर्यात क्षमता और हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका तय करता है। ग्राफ्टेड बागों की ओर बदलाव उत्पादकता, जल्दी फलन और एकरूप गुणवत्ता का वादा करता है, लेकिन इसमें परंपरागत स्वाद, आनुवंशिक विविधता, लकड़ी आधारित शिल्प और कटाई के दौरान श्रमिक सुरक्षा जैसे सवाल भी जुड़े हैं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • जम्मू-कश्मीर: सालाना 3.5 लाख टन अखरोट उत्पादन, देश के कुल उत्पादन का लगभग 90%।
  • अखरोट खेती क्षेत्र: लगभग 80,000 हेक्टेयर; ग्राफ्टिंग आधारित खेती लगभग 90,000 हेक्टेयर तक फैली (स्कुआस्ट के अनुसार)।
  • स्कुआस्ट = शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय; इसमें वॉलनट रिसर्च सेंटर कार्यरत।
  • कश्मीरी अखरोट के मुख्य वैश्विक प्रतिस्पर्धी: कैलिफोर्निया और चिली की पतले छिलके वाली (soft-shelled) किस्में।
  • जम्मू-कश्मीर में सरकारी अनुमति के बिना अखरोट के पेड़ काटना प्रतिबंधित; कानून का उद्देश्य अखरोट व चिनार का संरक्षण।
  • परंपरागत बीज-मूल पेड़ कीटनाशक के बिना फल देने में लगभग 15 वर्ष लेते हैं।

मेन्स दृष्टिकोण

जम्मू-कश्मीर का अखरोट क्षेत्र एक क्लासिक संक्रमण के दौर में है: सदियों से बीज से उगे, ऊंचे और आनुवंशिक रूप से अद्वितीय पेड़ों पर आधारित बिखरी खेती अब आधुनिक बाजार की एकरूपता की मांग के आगे चुनौती बन गई है, जहां खरीदार समान आकार-रंग और पतले छिलके वाली किस्में चाहते हैं। इसी कारण जम्मू-कश्मीर और स्कुआस्ट मध्यम आकार के ग्राफ्टेड पेड़ों व नई जारी किस्मों को बढ़ावा दे रहे हैं, जिनके पक्ष में शोधकर्ता जल्दी फलन, तेज प्रतिफल, एकरूप गुणवत्ता, अधिक उत्पादकता और बेहतर निर्यात संभावना के तर्क देते हैं, जबकि परंपरागत पेड़ों को फल देने में लगभग 15 वर्ष लगते हैं। दूसरी ओर अनुभवी किसानों की आपत्ति है कि नई किस्में स्वाद में परंपरागत कश्मीरी अखरोट का मुकाबला नहीं करतीं; साथ ही ग्राफ्टिंग का प्रसार सब्सिडी के अभाव में हुआ है, अखरोट की लकड़ी पर टिके शिल्प उद्योग पर असर पड़ा है, और कटाई के दौरान सुरक्षा उपकरणों व दुर्घटना-प्रबंधन तंत्र की कमी से रीढ़ की चोटें जैसी घटनाएं सामने आती हैं। आगे का रास्ता संतुलित हो सकता है: अनुत्पादक बीज-मूल पेड़ों का क्रमिक प्रतिस्थापन, परंपरागत किस्मों के स्वाद व आनुवंशिक विविधता का संरक्षण, किसानों के लिए प्रोत्साहन/सहायता, गुणवत्ता आधारित विपणन तथा कटाई में सुरक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था—साथ ही अखरोट और चिनार संरक्षण संबंधी कानूनी प्रतिबंधों पर संवाद।

मुख्य शब्द

ग्राफ्टेड (कलमी) अखरोट पेड़
ज्ञात किस्म की कलम लगाकर तैयार पेड़, जो जल्दी फल देता है और एकरूप गुणवत्ता व आकार का फल देता है।
बीज-मूल (seedling-origin) पेड़
सीधे बीज से उगा पेड़, जो अपने आप में एक अलग किस्म बन जाता है और फल में एकरूपता नहीं रहती।
स्कुआस्ट (SKUAST)
शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, जिसने नई अखरोट किस्में जारी की हैं और ग्राफ्टिंग को बढ़ावा दे रहा है।
वॉलनट रिसर्च सेंटर
स्कुआस्ट का अखरोट अनुसंधान केंद्र, जिसके प्रमुख प्रो. इम्तियाज अहमद लोन हैं।
पतले छिलके वाली (soft-shelled) किस्में
कैलिफोर्निया और चिली में उगाई जाने वाली अखरोट किस्में, जो वैश्विक बाजार में कश्मीरी अखरोट की प्रतिस्पर्धी हैं।
अखरोट-चिनार कटाई प्रतिबंध
जम्मू-कश्मीर में सरकारी अनुमति के बिना अखरोट पेड़ काटने पर रोक; उद्देश्य अखरोट व चिनार का संरक्षण।

अभ्यास प्रश्न

  1. जम्मू-कश्मीर में बीज-मूल अखरोट पेड़ों से ग्राफ्टेड बागवानी की ओर बदलाव के आर्थिक लाभ और सामाजिक-पारिस्थितिक लागतों का परीक्षण कीजिए।
  2. वैश्विक बाजार में एकरूप गुणवत्ता की मांग भारत की परंपरागत बागवानी फसलों की आनुवंशिक विविधता को कैसे प्रभावित करती है? कश्मीरी अखरोट के उदाहरण से समझाइए।
  3. अखरोट कटाई के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य जोखिम कम करने के लिए किस प्रकार की संस्थागत व्यवस्था आवश्यक है? स्रोत में उल्लिखित तथ्यों के आधार पर चर्चा कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बरजम्मू-कश्मीर के उधमपुर में दो जैश आतंकी ढेर →
← सभी ख़बरें