उत्सर्जन पर पश्चिम की धारणा पर मोदी का सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को उस धारणा पर सवाल उठाया जिसमें कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी विकासशील देशों पर डाली जाती है और ऐतिहासिक प्रदूषकों के रूप में पश्चिमी देशों को बरी कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि विकसित देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भारत से छह गुना अधिक है। भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.2 टन है, वैश्विक औसत 4.7 टन। 1751-2024 में कुल उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी 3.5%, अमेरिका की 23.5% है। दिल्ली में एनजीटी सम्मेलन में उन्होंने कहा, पेरिस कॉप21 वादे समय से पहले पूरे करने वाला भारत एकमात्र जी20 देश है।
स्रोत
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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- PM Modi said per capita carbon emissions in developed countries are six times higher than India's. — Direct quote attributed to the Prime Minister in the source.
- India's per capita emission is 2.2 tonnes a year against a global average of 4.7 tonnes; US 14.2 tonnes and Russia 14 tonnes. — Figures appear in the source without naming the dataset; reproduce as reported.
- India's cumulative (1751-2024) share of carbon emissions is 3.5%, versus US 23.5%, China 15.4%, Russia 6.6%, Germany 5.1%, UK 4.3%. — Figures appear in the source with no external citation given.
- India is the only G20 country to have fulfilled all COP21 Paris commitments, ahead of schedule. — Attributed as a direct quote to PM Modi; a claim by the speaker, not independently checked.
- COP31 is scheduled for November in Antalya, Turkey; environment minister Bhupender Yadav said India will press for equity and implementation. — Attributed to the source report and to the minister.
विश्लेषकों की राय राय
नवंबर में तुर्किये में होने वाले वैश्विक जलवायु सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री ने भारत की मोलभाव की ज़मीन सार्वजनिक रूप से तैयार कर दी है। प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और 1751-2024 की संचयी हिस्सेदारी — इन दो आंकड़ों को आगे रखकर उन्होंने कड़े लक्ष्यों के दबाव को 'समानता' के सवाल में बदल दिया, जो कूटनीतिक और घरेलू, दोनों मोर्चों पर काम करता है। पेरिस के वादे समय से पहले पूरे करने वाला एकमात्र जी20 देश होने का दावा उन्हें रक्षात्मक दिखे बिना दबाव ठुकराने की नैतिक बढ़त देता है।
- सम्मेलन से पहले यह तर्क रखना बातचीत का एजेंडा अपनी शर्तों पर तय करने की कोशिश है।
- 'ऐतिहासिक प्रदूषक' का ढांचा विकासशील और संवेदनशील देशों के बीच भारत के नेतृत्व के दावे को मज़बूत करता है।
- घरेलू स्तर पर संदेश यह है कि विकास और ऊर्जा ज़रूरतों से समझौता नहीं होगा — पश्चिमी दबाव में न झुकने की कथा को इससे बल मिलता है।
- पश्चिम का जवाबी तर्क यह रहेगा कि भारत आज तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है; प्रति व्यक्ति आंकड़ों से इसका सामना करना भारत की पुरानी रणनीति है।
- पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का समानता, कार्यान्वयन और कमज़ोर देशों की ज़रूरतों पर ज़ोर बताता है कि यह इकलौती टिप्पणी नहीं, समन्वित सरकारी रुख है।
किस पर नज़र रखें — देखना यह है कि तुर्किये के अंताल्या में कॉप31 में भारत इस समानता के तर्क को अन्य विकासशील देशों के साझा गुट में बदल पाता है या नहीं।
यह खबर यह नहीं बताती कि भारत कौन से नए लक्ष्य स्वीकार या अस्वीकार करेगा और पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया क्या होगी — भाषण में दिए आंकड़ों से आगे कोई नया नीतिगत फ़ैसला इसमें नहीं है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स' में उस वैश्विक विमर्श पर सवाल उठाया जो कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी विकासशील देशों पर डालता है और ऐतिहासिक प्रदूषक पश्चिमी देशों को उनकी भूमिका से बरी कर देता है। उनकी टिप्पणियाँ तुर्किये के अंताल्या में नवंबर में प्रस्तावित वैश्विक जलवायु सम्मेलन (कॉप31) की तैयारियों के बीच आई हैं। इन्हें पश्चिम के उस प्रयास के प्रतिवाद के रूप में देखा जा रहा है जिसमें भारत पर कड़े उत्सर्जन-कटौती लक्ष्य स्वीकार करने का दबाव बनाया जाता है।
मुख्य तथ्य
- मोदी के अनुसार विकसित देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत से छह गुना अधिक है।
- भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.2 टन प्रति वर्ष है, जो वैश्विक औसत 4.7 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष के आधे से भी कम है।
- अमेरिका का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 14.2 टन और रूस का 14 टन है।
- 1751-2024 की संचयी अवधि में कुल कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी केवल 3.5% है।
- संचयी उत्सर्जन में अमेरिका 23.5%, चीन 15.4%, रूस 6.6%, जर्मनी 5.1% और ब्रिटेन 4.3% के हिस्सेदार हैं।
- भारत वर्तमान में तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है।
- मोदी ने कहा कि भारत जी20 का एकमात्र देश है जिसने पेरिस कॉप21 (2015) के सभी वादे, और वह भी समय से पहले, पूरे किए हैं।
- सम्मेलन में 17 देशों के न्यायविद, शिक्षाविद, नीति-निर्माता, वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ शामिल हुए।
समयरेखा
- 1751-2024इस अवधि के संचयी कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी 3.5%, अमेरिका की 23.5%।
- 2015पेरिस में कॉप21 शिखर सम्मेलन, जहाँ भारत ने जलवायु प्रतिबद्धताएँ कीं।
- शनिवार (सम्मेलन का दिन)विज्ञान भवन, नई दिल्ली में एनजीटी के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मोदी का संबोधन।
- नवंबर (आगामी)तुर्किये के अंताल्या में कॉप31 वैश्विक जलवायु सम्मेलन प्रस्तावित।
किसका दाँव
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी — वैश्विक मंचों पर भारत के कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और जलवायु कार्रवाई के रिकॉर्ड को रखते हुए समता का तर्क।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) — सम्मेलन का आयोजक; पर्यावरणीय न्यायनिर्णयन और अंतरराष्ट्रीय संवाद का मंच।
- केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव — कॉप31 में समता, कार्यान्वयन और संवेदनशील देशों की जरूरतों पर केंद्रित जलवायु कार्रवाई की पैरवी।
- विकसित/पश्चिमी देश (अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि) — ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी और बड़े प्रदूषकों द्वारा कटौती की माँग का सामना।
- विकासशील व संवेदनशील देश — उत्सर्जन-कटौती लक्ष्यों के बोझ का बँटवारा और समता आधारित जलवायु ढाँचा।
- 17 देशों के विशेषज्ञ, न्यायविद व नीति-निर्माता — पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता के भविष्य पर विमर्श में भागीदारी।
क्यों अहम है
कॉप31 से पहले भारत ने संचयी और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आँकड़ों के सहारे यह तर्क दोहराया है कि जलवायु जिम्मेदारी का बँटवारा समता पर आधारित होना चाहिए, न कि वर्तमान उत्सर्जन की कुल मात्रा पर। यह भारत की उस स्थिति को मजबूत करता है जिसमें वह कड़े उत्सर्जन-कटौती लक्ष्यों के दबाव का प्रतिवाद करता है, जबकि पेरिस समझौते के अपने वादे समय से पहले पूरे करने का दावा भी करता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन 2.2 टन/वर्ष; वैश्विक औसत 4.7 टन/वर्ष।
- 1751-2024 संचयी उत्सर्जन: अमेरिका 23.5%, चीन 15.4%, रूस 6.6%, जर्मनी 5.1%, ब्रिटेन 4.3%, भारत 3.5%।
- भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है।
- कॉप21 पेरिस शिखर सम्मेलन 2015 में हुआ; मोदी के अनुसार भारत जी20 का एकमात्र देश है जिसने सभी वादे समय-पूर्व पूरे किए।
- कॉप31 नवंबर में तुर्किये के अंताल्या में प्रस्तावित।
- सम्मेलन 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स' का आयोजक एनजीटी; स्थान विज्ञान भवन, नई दिल्ली।
मेन्स दृष्टिकोण
जलवायु वार्ताओं का केंद्रीय विवाद जिम्मेदारी के बँटवारे का है: पश्चिमी देशों ने दो सदियों तक जीवाश्म ईंधन जलाकर विकास किया, जिससे वैश्विक तापवृद्धि हुई, पर आज दबाव वर्तमान बड़े उत्सर्जकों—जिनमें तीसरे स्थान पर भारत है—पर कड़े लक्ष्य स्वीकारने का बनाया जाता है। भारत का तर्क आँकड़ों पर टिका है: 1751-2024 के संचयी उत्सर्जन में उसका योगदान मात्र 3.5% है जबकि अमेरिका का 23.5%, और उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.2 टन वैश्विक औसत 4.7 टन के आधे से कम तथा अमेरिका (14.2 टन) व रूस (14 टन) से कई गुना कम है। इसके साथ भारत जिम्मेदारी से विमुख नहीं हुआ—मोदी के अनुसार वह जी20 का एकमात्र देश है जिसने कॉप21 की सभी प्रतिबद्धताएँ समय-पूर्व पूरी कीं, और गैर-जीवाश्म ईंधन तथा सौर क्षमता जैसे मानकों पर उसका प्रदर्शन वैश्विक चर्चा का विषय है। आगे का रास्ता, जैसा पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कॉप31 के संदर्भ में कहा, समता, कार्यान्वयन और संवेदनशील देशों की जरूरतों पर केंद्रित जलवायु कार्रवाई की पैरवी तथा बड़े ऐतिहासिक प्रदूषकों द्वारा कटौती पर जोर देना है।
मुख्य शब्द
- एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण)
- पर्यावरण से जुड़ा अधिकरण, जिसने नई दिल्ली में 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स' अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया।
- प्रति व्यक्ति उत्सर्जन
- प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष कार्बन उत्सर्जन; भारत 2.2 टन, वैश्विक औसत 4.7 टन, अमेरिका 14.2 टन।
- संचयी उत्सर्जन
- किसी अवधि (यहाँ 1751-2024) में कुल जमा उत्सर्जन, जो ऐतिहासिक जिम्मेदारी का आधार है।
- कॉप21 / पेरिस समझौता
- 2015 में पेरिस में हुआ जलवायु शिखर सम्मेलन व समझौता, जिसके वादे भारत ने पूरे किए।
- कॉप31
- नवंबर में तुर्किये के अंताल्या में प्रस्तावित आगामी वैश्विक जलवायु सम्मेलन।
- ऐतिहासिक प्रदूषक
- वे देश जिन्होंने पिछले दो सदियों में जीवाश्म ईंधन जलाकर विकास किया और तापवृद्धि के लिए मुख्यतः जिम्मेदार हैं।
अभ्यास प्रश्न
- जलवायु वार्ताओं में 'समता' के सिद्धांत को संचयी और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आँकड़ों के आधार पर समझाइए। भारत का पक्ष कितना सुदृढ़ है?
- भारत तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक होने के बावजूद कड़े उत्सर्जन-कटौती लक्ष्यों का विरोध क्यों करता है? परीक्षण कीजिए।
- पेरिस कॉप21 प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन में भारत के प्रदर्शन का मूल्यांकन कीजिए और कॉप31 के लिए उसकी वार्ता प्राथमिकताएँ बताइए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।