राष्ट्रीय जगदलपुर

झीरम घाटी हमला महीनों पहले रचा गया: एनआईए कोर्ट का आदेश

छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में 2013 में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हुए माओवादी हमले, जिसमें 27 लोग मारे गए थे, की साजिश महीनों पहले रची गई थी। जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत के विस्तृत फैसले के अनुसार 25 मई 2013 के हमले से करीब तीन महीने पहले सीपीआई (माओवादी) की दक्षिण क्षेत्रीय संयुक्त कमान की बैठक में साजिश बनी, जिसके बाद रूट सर्वे, कैडर जुटाव और रिहर्सल हुई। 16 सितंबर के फैसले में 10 जीवित दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • The 2013 Jhiram Valley attack on a Congress convoy killed 27 people. — Figure appears in source, attributed to the NIA court judgment.
  • The conspiracy was hatched about three months earlier at a CPI (Maoist) South Regional Unified Command meeting held February 16-25. — Attributed to the September 16 verdict uploaded to the court website on Friday.
  • A rehearsal was held in a forest near Ekkam-Chakpal six to seven days before the attack. — Attributed to the court order citing NIA investigation and witness testimony.
  • The court sentenced 10 surviving convicts to death; 27 accused remain absconding. — Figures and names appear in source, attributed to the court order.
  • Around 100 armed Maoists set up temporary command centres; one witness estimated 150-200 attackers. — Source presents these as differing accounts from the order and witness testimony; retain both as estimates.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

झीरम घाटी ने एक ही दोपहर में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेतृत्व की एक पूरी पीढ़ी को खत्म कर दिया था, इसलिए यह फैसला कानूनी से कम राजनीतिक घटना नहीं है। अदालत का यह निष्कर्ष कि हमला महीनों पहले रची गई साजिश थी और महेंद्र कर्मा निशाने पर थे, सलवा जुडूम अभियान पर वर्षों पुरानी राजनीतिक बहस को फिर सामने ले आता है। 27 आरोपियों के अब भी फरार होने का तथ्य यह सवाल जिंदा रखता है कि बड़े सूत्रधार कौन थे।

  • एक ही हमले में नंदकुमार पटेल और महेंद्र कर्मा जैसे राज्य स्तर के कांग्रेस नेताओं की मौत ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर दीर्घकालिक असर डाला, और उसकी स्मृति आज भी राजनीतिक रूप से सक्रिय है।
  • फैसले में दर्ज "कर्मा कहां है?" जैसे गवाहों के बयान और सलवा जुडूम की भूमिका का उल्लेख उस विवादित बहस को फिर खोल सकता है कि वह अभियान उचित था या नहीं।
  • 10 दोषियों को मौत की सजा के साथ-साथ अदालत का यह उल्लेख कि प्रमुख नामों समेत 27 आरोपी फरार हैं, इस आलोचना को बल देगा कि बड़े किरदार जवाबदेही से बच निकले।
  • आरोपियों के डर के मारे सहयोग करने वाले ग्रामीण होने के बचाव तर्क को अदालत ने खारिज किया, जिससे बस्तर के संदर्भ को लेकर अधिकार-केंद्रित और सुरक्षा-केंद्रित नजरिए आपस में टकराएंगे।
  • यह मामला दोनों पक्षों को राजनीतिक सामग्री देता है — कांग्रेस के लिए बलिदान का आख्यान, और विरोधियों के लिए सख्त माओवाद-विरोधी रुख का समर्थन।

किस पर नज़र रखें — हाई कोर्ट में अपील, फरार आरोपियों की गिरफ्तारी में प्रगति, और यह कि कांग्रेस अपनी पुरानी "व्यापक साजिश" जांच की मांग को फिर उठाती है या नहीं — इन पर नजर रखें।

यह खबर केवल अदालती आदेश में दर्ज बातों को बताती है; यह हमले के पीछे किसी राजनीतिक आयाम, सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी, या दलों की प्रतिक्रिया को स्थापित नहीं करती।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के सुकमा-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर झीरम घाटी में कांग्रेस की 'परिवर्तन यात्रा' से लौट रहे नेताओं के काफिले पर सीपीआई (माओवादी) ने घात लगाकर हमला किया, जिसमें 27 लोग मारे गए। मारे गए लोगों में सलवा जुडूम अभियान के प्रमुख नेता महेंद्र कर्मा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल तथा उनके पुत्र दिनेश पटेल शामिल थे। मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने की और जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने 16 सितंबर के फैसले में 10 जीवित दोषियों को मौत की सजा सुनाई। शुक्रवार को वेबसाइट पर अपलोड किए गए इस विस्तृत आदेश में बताया गया है कि हमला महीनों की साजिश, रूट सर्वे, कैडर जुटाव और रिहर्सल के बाद अंजाम दिया गया।

मुख्य तथ्य

  • 25 मई 2013 के झीरम घाटी हमले में 27 लोग मारे गए; काफिला दोपहर 3.30 से 4.20 बजे के बीच घाटी में पहुंचा।
  • आदेश के अनुसार साजिश हमले से लगभग तीन महीने पहले, 16 से 25 फरवरी के बीच हुई सीपीआई (माओवादी) की दक्षिण क्षेत्रीय संयुक्त कमान की बैठक में रची गई।
  • माओवादियों ने सड़क पर पेड़ काटकर डाले और लगभग 8-9 किलो पीईटीएन तथा टीएनटी विस्फोटक लगाए थे।
  • गवाहों के अनुसार करीब 150-200 माओवादी शामिल थे; 22 और 23 मई की रातों में लगभग 100 हथियारबंद माओवादियों ने सड़क के दोनों ओर अस्थायी कमांड सेंटर बनाए।
  • वाहनों पर लगभग 206 गोलियों के निशान गिने गए; हमले में 9 एके-47, 7 इंसास राइफलें, 4 नौ एमएम पिस्तौल और 2 एसएलआर लूटे गए।
  • कोलेंग गांव से लगभग 50 किलो वजन की करीब 25 बोरी चावल जुटाकर कंदानार में महादेव नाग के घर रखा गया; 22 मई को चंदामेटा बैठक में करीब 50 जन मिलिशिया सदस्यों को सामग्री पहुंचाने का निर्देश दिया गया।
  • एनआईए ने 2014 में आरोपपत्र और 2015 में 32 फरार आरोपियों के खिलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किया; जोगा मड़कामी जून 2016 में और सुमित्रा नवंबर 2019 में गिरफ्तार हुईं।
  • 16 सितंबर के फैसले में 10 जीवित दोषियों को मौत की सजा; 27 आरोपी अब भी फरार हैं, जिनमें तिप्पीरी तिरुपति उर्फ देवजी और बारसे सुक्का उर्फ देवा शामिल हैं।

समयरेखा

  1. 16-25 फरवरी 2013सीपीआई (माओवादी) की दक्षिण क्षेत्रीय संयुक्त कमान की बैठक में हमले की साजिश रची गई।
  2. हमले से 6-7 दिन पहलेएक्कम-चकपाल के पास जंगल में सुरेंदर, जयलाल, देवा, विनोद, हेमला मासा और सोनाधर के निर्देशन में रिहर्सल हुई।
  3. 22 मई 2013चंदामेटा गांव की बैठक में करीब 50 जन मिलिशिया सदस्यों को चावल व रसद निर्धारित स्थान तक पहुंचाने का निर्देश; सामग्री झीरम नाला के अस्थायी कैंप ले जाई गई।
  4. 22-23 मई 2013 की रातेंलगभग 100 हथियारबंद माओवादियों ने जन मिलिशिया के साथ सड़क के दोनों ओर अस्थायी कमांड सेंटर बनाए।
  5. 23 मई 2013सामग्री ढोने में मदद करने वाले ग्रामीणों को माओवादियों के साथ रुककर भोजन बनाने, लकड़ी जुटाने जैसे काम करने पड़े।
  6. 25 मई 2013, दोपहर 2.30 बजेसुकमा में परिवर्तन यात्रा का कार्यक्रम समाप्त; अजीत जोगी हेलीकॉप्टर से रवाना हुए।
  7. 25 मई 2013, लगभग 3 बजेअन्य नेता सर्किट हाउस में भोजन के बाद केशलूर के लिए सुकमा से निकले।
  8. 25 मई 2013, 3.30-4.20 बजेकाफिला झीरम घाटी पहुंचा; विस्फोट व अंधाधुंध फायरिंग, जो शाम 6 से 6.30 बजे के बीच थमी।
  9. 2014 व 2015एनआईए ने आरोपपत्र और 32 फरार आरोपियों के खिलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किया।
  10. जून 2016 / नवंबर 2019जोगा मड़कामी और सुमित्रा पुनेम उर्फ आयती मोदियम की गिरफ्तारी।

किसका दाँव

  • विशेष एनआईए अदालत, जगदलपुर — साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर हमले का पुनर्निर्माण कर 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई।
  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) — जांच, 2014 का आरोपपत्र व 2015 का पूरक आरोपपत्र; निष्कर्ष कि हमला टीसीओसी का हिस्सा था।
  • सीपीआई (माओवादी) – दक्षिण क्षेत्रीय संयुक्त कमान, दरभा डिवीजनल कमेटी, डीकेएसजेडसी — प्रतिबंधित संगठन जिसकी संरचना पर साजिश का आरोप; डीकेएसजेडसी प्रवक्ता ने जिम्मेदारी ली।
  • 10 दोषी (प्रमिला मोदियम, चैतू लेकम, सुमित्रा पुनेम, मुक्का मंडावी, कवासी कोसा, आयता मड़कम, मड़कामी देवा, जोगा मड़कामी, बंजामी सन्ना, महादेव नाग) — मौत की सजा; बचाव पक्ष ने डर में सहयोग, आपराधिक रिकॉर्ड का अभाव और करीब 12 साल की हिरासत का तर्क दिया।
  • कांग्रेस नेता व पीड़ित परिवार — महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और दिनेश पटेल की हत्या; फूलो देवी नेताम, कवासी लखमा जैसे बचे लोग गवाह बने।
  • स्थानीय ग्रामीण व जन मिलिशिया — रसद ढुलाई व भोजन व्यवस्था में शामिल; अदालत ने 'डर के कारण मदद' के बचाव को अस्वीकार किया।

क्यों अहम है

यह फैसला भारत के सबसे बड़े राजनीतिक नेतृत्व-लक्षित वामपंथी उग्रवादी हमले का न्यायिक ब्योरा सामने रखता है और दिखाता है कि हमला आकस्मिक नहीं, बल्कि संगठित कमान-संरचना द्वारा महीनों में तैयार की गई रणनीति (टीसीओसी) का हिस्सा था। इसमें ग्रामीण आबादी, जन मिलिशिया और सशस्त्र दस्तों के बीच के संबंध उजागर होते हैं, जो सुरक्षा नीति और पुनर्वास दोनों के लिए अहम हैं। साथ ही 27 आरोपियों का फरार रहना और 12 साल बाद आया फैसला आतंकवाद/उग्रवाद मामलों में जांच व मुकदमे की गति पर सवाल उठाता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • झीरम घाटी हमला: 25 मई 2013, सुकमा-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग, छत्तीसगढ़; 27 मृत।
  • मामला दर्ज: भारतीय दंड संहिता, आर्म्स एक्ट, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधानों के तहत, दरभा थाना।
  • माओवादी ढांचा: झीरम घाटी क्षेत्र दरभा डिवीजनल कमेटी → दक्षिण क्षेत्रीय संयुक्त कमान → दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) के अधीन।
  • टीसीओसी (टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन) के तहत हमले की योजना बनाई गई – एनआईए।
  • इस्तेमाल विस्फोटक: पीईटीएन और टीएनटी, लगभग 8-9 किलो; वाहनों पर 206 गोलियों के निशान।
  • महेंद्र कर्मा सलवा जुडूम (माओवादी विरोधी अभियान) के प्रमुख नेता थे और लंबे समय से माओवादियों के निशाने पर थे।

मेन्स दृष्टिकोण

झीरम घाटी फैसला वामपंथी उग्रवाद को केवल कानून-व्यवस्था की घटना नहीं, बल्कि एक संगठित, कमान-आधारित राजनीतिक हिंसा के रूप में सामने रखता है: अदालत के अनुसार फरवरी 2013 में दक्षिण क्षेत्रीय संयुक्त कमान की बैठक में साजिश बनी, रूट सर्वे, रिहर्सल, रसद (25 बोरी चावल), जन मिलिशिया की गतिशीलता और एके-सीरीज़ राइफलों-एलएमजी से लैस करीब 100 कैडरों की तैनाती हुई, और डीकेएसजेडसी प्रवक्ता ने महेंद्र कर्मा को 'दंडित' करने का दावा करते हुए जिम्मेदारी ली। कारणों में सलवा जुडूम जैसे नागरिक-आधारित प्रति-उग्रवाद अभियानों से उपजा प्रतिशोध-चक्र, और स्थानीय ग्रामीणों का भय या सहमति से संगठन के सहायक ढांचे में खिंच जाना दोनों दिखते हैं—यही बचाव पक्ष का तर्क था, जिसे अदालत ने 'दुर्लभतम में दुर्लभ' मानते हुए अस्वीकार किया। निहितार्थ हैं: राजनीतिक नेतृत्व की सुरक्षा और काफिला-प्रोटोकॉल में खामियां, लूटे गए सरकारी हथियारों (9 एके-47, 7 इंसास) का खतरा, तथा 27 आरोपियों के फरार रहने व करीब 12 वर्ष की न्यायिक हिरासत के बाद फैसले से उभरता त्वरित अभियोजन का प्रश्न। आगे का रास्ता स्रोत-आधारित सीमाओं में: खुफिया-आधारित रूट सुरक्षा, फरार कैडरों की गिरफ्तारी, सहायक ढांचे में शामिल ग्रामीणों के लिए भय-मुक्ति व पुनर्वास के प्रश्न पर विचार, और यूएपीए मामलों में समयबद्ध सुनवाई।

मुख्य शब्द

एनआईए विशेष अदालत
राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा जांचे गए मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष अदालत; यहां जगदलपुर की अदालत ने फैसला दिया।
टीसीओसी (टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन)
माओवादियों का सामरिक जवाबी आक्रमण अभियान; एनआईए के अनुसार झीरम हमला इसी के तहत नियोजित था।
डीकेएसजेडसी
दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी – सीपीआई (माओवादी) की क्षेत्रीय इकाई, जिसके अधीन दक्षिण क्षेत्रीय संयुक्त कमान काम करती थी।
जन मिलिशिया / संघम सदस्य
माओवादियों के स्थानीय सहायक ढांचे; रसद ढुलाई, भोजन और सूचना जैसे कार्यों में लगाए जाते हैं।
सलवा जुडूम
छत्तीसगढ़ में माओवाद विरोधी अभियान, जिसके प्रमुख नेता महेंद्र कर्मा लंबे समय से माओवादियों के निशाने पर थे।
'दुर्लभतम में दुर्लभ'
मृत्युदंड देने की न्यायिक कसौटी; अभियोजन ने इसी आधार पर अधिकतम सजा की मांग की।

अभ्यास प्रश्न

  1. झीरम घाटी फैसले के आलोक में परखें कि वामपंथी उग्रवादी संगठनों का 'सहायक ढांचा' (जन मिलिशिया, संघम) सुरक्षा और कानूनी जवाबदेही के लिए क्या चुनौतियां पैदा करता है।
  2. सलवा जुडूम जैसे नागरिक-आधारित माओवाद विरोधी अभियानों के दीर्घकालिक परिणामों का मूल्यांकन कीजिए। क्या वे हिंसा-प्रतिहिंसा का चक्र मजबूत करते हैं?
  3. उग्रवाद/आतंकवाद के मामलों में जांच से फैसले तक लगने वाला समय (झीरम में करीब 12 वर्ष की न्यायिक हिरासत) न्याय की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करता है? सुधार सुझाइए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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