केंद्र ने 1.86 लाख करोड़ रुपये की ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर-3 योजना मंजूर की

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 30 सितंबर को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-3 योजना को मंजूरी दी, जिसका कुल परिव्यय 1,86,405 करोड़ रुपये है। इसमें अंतर-राज्यीय पारेषण प्रणालियों के लिए 1,36,378 करोड़ रुपये और 50 गीगावाट घंटा बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिए 50,000 करोड़ रुपये शामिल हैं। केंद्रीय वित्तीय सहायता 54,082 करोड़ रुपये है। वित्त वर्ष 2027 से 2033 तक चलने वाली योजना करीब 135 गीगावाट नवीकरणीय बिजली निकासी करेगी। सरकार के अनुसार यह 2035 तक 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता लक्ष्य में सहायक होगी।

स्रोत

Swarajya · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#renewable energy#transmission#battery storage#union cabinet#power sector

डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Union Cabinet approved Green Energy Corridor Phase-III on 30 September with an outlay of Rs 1,86,405 crore. — Attributed to the Cabinet decision and a linked PIB press release; figure appears in source.
  • Outlay splits into Rs 1,36,378 crore for Intra-State Transmission Systems and Rs 50,000 crore for 50 GWh of BESS. — Figures appear in source; internally consistent with the stated total.
  • Central Financial Support totals Rs 54,082 crore to offset intra-state transmission charges. — Figure appears in source, attributed to the scheme details; no independent verification possible.
  • Scheme spans FY2027 to FY2033 and will evacuate about 135 GW of renewable energy. — Timeline and capacity stated in source, with the 135 GW figure linked to an external transmission roadmap report.
  • Scheme will help achieve 900 GW installed non-fossil capacity by 2035. — Explicitly attributed to a government statement.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-3 तकनीकी रूप से पारेषण योजना है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह केंद्र-राज्य वित्तीय व्यवस्था भी है। कुल 1.86 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय में केंद्रीय सहायता 54,082 करोड़ रुपये है, जबकि क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य पारेषण कंपनियों पर है — इससे यह तर्क उठ सकता है कि श्रेय दिल्ली को मिलेगा और वित्तीय बोझ का बड़ा हिस्सा राज्यों पर रहेगा। 2027 से 2033 की अवधि होने के कारण इसके लाभ और आलोचना, दोनों अगले चुनावी चक्रों तक फैलेंगे।

  • नवीकरणीय संसाधनों से समृद्ध राज्यों को परियोजनाओं, निवेश और रोजगार के रूप में दिखने वाला लाभ मिल सकता है, हालांकि खबर में राज्यवार ब्योरा नहीं है।
  • सरकार का यह दावा कि केंद्रीय सहायता अंतरराज्यीय पारेषण शुल्क घटाकर बिजली दरें काबू में रखेगी, उपभोक्ताओं के सामने रखने योग्य मजबूत राजनीतिक संदेश है।
  • टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली और BOOM मॉडल से निजी भागीदारी बढ़ने पर पारदर्शिता बनाम निजीकरण की परिचित बहस फिर खड़ी हो सकती है।
  • क्रियान्वयन 2027 में शुरू होकर 2033 तक चलेगा, इसलिए घोषणा परिणाम से बहुत पहले आई है — विपक्ष को "घोषणा अधिक, अमल कम" वाला हमला करने का मौका मिलेगा।
  • योजना को 2035 तक 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य से जोड़ना केंद्र को वैश्विक जलवायु मंचों पर प्रचार की बढ़त देता है।

किस पर नज़र रखें — देखना यह होगा कि राज्य — विशेष रूप से केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर की पार्टियों वाले राज्य — अपने हिस्से के वित्तपोषण और आवंटन के बंटवारे पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, और BESS निविदा नियम किस रूप में बनते हैं।

खबर में राज्यवार आवंटन, राज्यों के लिए लागत-साझेदारी का सूत्र या किस राज्य को सर्वाधिक लाभ होगा, यह स्पष्ट नहीं है, और अभी कोई राजनीतिक प्रतिक्रिया दर्ज नहीं हुई है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 30 सितंबर को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III (GEC-III) योजना को मंजूरी दी, जो 1.86 लाख करोड़ रुपये का कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य राज्यों के भीतर की पारेषण (इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन) अधोसंरचना को मजबूत करना और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को ग्रिड में जोड़ना है। भारत में सौर और पवन क्षमता की तेज वृद्धि ग्रिड की बिजली निकासी क्षमता से आगे निकल गई है, जिससे पारेषण अवरोध और नवीकरणीय बिजली की कटौती (curtailment) एक गंभीर चुनौती बन गई है। यह योजना वित्त वर्ष 2027 से 2033 तक चलेगी।

मुख्य तथ्य

  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 30 सितंबर को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III योजना मंजूर की; कुल परियोजना परिव्यय 1,86,405 करोड़ रुपये।
  • परिव्यय में GEC-III के तहत इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) के लिए 1,36,378 करोड़ रुपये शामिल हैं।
  • 50 गीगावाट घंटा (GWh) बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) के लिए 50,000 करोड़ रुपये का प्रावधान।
  • कुल केंद्रीय वित्तीय सहायता 54,082 करोड़ रुपये, जो इंट्रा-स्टेट पारेषण शुल्क की भरपाई कर बिजली लागत कम रखेगी।
  • योजना वित्त वर्ष 2027 से 2033 तक चलेगी और लगभग 135 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा की निकासी करेगी।
  • सरकारी वक्तव्य के अनुसार यह 2035 तक 900 गीगावाट स्थापित गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य पाने में मदद करेगी।
  • सभी ग्रीनफील्ड InSTS परियोजनाएं टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) से; ब्राउनफील्ड उन्नयन व नेटवर्क सुदृढ़ीकरण कॉस्ट प्लस बेसिस (CPB) पर।
  • राज्य पारेषण उपक्रम समग्र क्रियान्वयन एजेंसी होंगे; पारेषण सेवा प्रदाता (TSP) BOOM मॉडल पर TBCB के तहत भाग लेंगे।

समयरेखा

  1. 30 सितंबरकेंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1,86,405 करोड़ रुपये की ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III योजना को मंजूरी दी।
  2. वित्त वर्ष 2027 से 2033योजना की क्रियान्वयन अवधि, जिसमें लगभग 135 GW नवीकरणीय बिजली निकासी और 50 GWh BESS की तैनाती होगी।
  3. 2035900 गीगावाट स्थापित गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य, जिसमें यह योजना सहायक होगी।

किसका दाँव

  • केंद्र सरकार / केंद्रीय मंत्रिमंडल — 54,082 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता देकर जलवायु प्रतिबद्धताओं और ऊर्जा सुरक्षा को पूरा करना।
  • राज्य पारेषण उपक्रम (STUs) — योजना की समग्र क्रियान्वयन एजेंसी; राज्यों के भीतर ग्रिड एकीकरण और बिजली निकासी की जिम्मेदारी।
  • पारेषण सेवा प्रदाता (TSPs) — TBCB के तहत BOOM मॉडल पर ग्रीनफील्ड पारेषण परियोजनाओं में भागीदारी का अवसर।
  • नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर/जनरेटर — BESS उनके छोर पर लगने से रुक-रुक कर उत्पादन, भीड़ और पीक-आवर कटौती की समस्या घटेगी।
  • राज्य व केंद्रशासित प्रदेश तथा बिजली उपभोक्ता — पारेषण शुल्क की भरपाई से बिजली लागत नियंत्रित रहेगी; गैर-सौर घंटों की मांग पूरी होगी।
  • बिजली, विनिर्माण, निर्माण व भंडारण उद्योग के कामगार — प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार तथा संचालन, अनुरक्षण व ग्रिड प्रबंधन में दीर्घकालिक कुशल रोजगार।

क्यों अहम है

भारत की सौर व पवन क्षमता ग्रिड की निकासी क्षमता से तेज बढ़ी है, जिससे पारेषण अवरोध और नवीकरणीय बिजली की कटौती हो रही है। GEC-III राज्यों के भीतर नेटवर्क, बैटरी भंडारण और उन्नत ग्रिड प्रबंधन के जरिये इन अड़चनों को दूर करने का प्रयास है। इससे 2035 तक 900 GW गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और कार्बन फुटप्रिंट में कमी जुड़ी है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III: कुल परिव्यय 1,86,405 करोड़ रुपये, केंद्रीय वित्तीय सहायता 54,082 करोड़ रुपये।
  • विभाजन: InSTS के लिए 1,36,378 करोड़ रुपये; 50 GWh BESS के लिए 50,000 करोड़ रुपये।
  • अवधि वित्त वर्ष 2027-2033; लक्ष्य लगभग 135 GW नवीकरणीय ऊर्जा निकासी।
  • लक्ष्य: 2035 तक 900 GW स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता।
  • ग्रीनफील्ड परियोजनाएं TBCB मोड में, ब्राउनफील्ड उन्नयन Cost Plus Basis पर।
  • क्रियान्वयन: राज्य पारेषण उपक्रम; TSPs BOOM (बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मेंटेन) मॉडल पर।

मेन्स दृष्टिकोण

भारत के नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार की सबसे बड़ी अड़चन उत्पादन नहीं, बल्कि निकासी है—सौर और पवन क्षमता की वृद्धि ग्रिड की क्षमता से आगे निकल गई है, जिससे भीड़ (congestion), पीक-आवर कटौती और नवीकरणीय बिजली की curtailment हो रही है; साथ ही सौर उत्पादन की रुक-रुक कर प्रकृति गैर-सौर घंटों की मांग पूरी नहीं कर पाती। GEC-III इसका दोहरा उत्तर देता है: 1,36,378 करोड़ रुपये से राज्यों के भीतर पारेषण नेटवर्क का विस्तार-सुदृढ़ीकरण और 50,000 करोड़ रुपये से 50 GWh बैटरी भंडारण, जो डेवलपर छोर या ग्रिड लचीलेपन के लिए महत्वपूर्ण स्थानों पर लगेगा। संस्थागत डिज़ाइन में भी संतुलन है—ग्रीनफील्ड कार्य TBCB से प्रतिस्पर्धी लागत सुनिश्चित करेगा, ब्राउनफील्ड कार्य कॉस्ट प्लस आधार पर होगा, और 54,082 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता इंट्रा-स्टेट पारेषण शुल्क की भरपाई कर उपभोक्ता पर बोझ कम रखेगी। आगे की राह राज्य पारेषण उपक्रमों की क्रियान्वयन क्षमता, TSPs की समयबद्ध परियोजना पूर्णता, घरेलू भंडारण विनिर्माण के विकास तथा 135 GW निकासी और 2035 तक 900 GW गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्यों के बीच तालमेल पर निर्भर करेगी।

मुख्य शब्द

ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC)
नवीकरणीय ऊर्जा को संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों से मांग केंद्रों तक पहुंचाने के लिए समर्पित पारेषण अधोसंरचना कार्यक्रम; चरण-III 30 सितंबर को मंजूर।
InSTS (इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम)
किसी राज्य के भीतर की पारेषण प्रणाली; GEC-III में इसके लिए 1,36,378 करोड़ रुपये आवंटित।
BESS (बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली)
बैटरी में बिजली संग्रह कर ग्रिड लचीलापन देने वाली प्रणाली; योजना में 50 GWh के लिए 50,000 करोड़ रुपये।
TBCB (टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली)
पारेषण परियोजनाएं प्रतिस्पर्धी बोली से आवंटित करने की पद्धति; सभी ग्रीनफील्ड InSTS परियोजनाओं पर लागू।
BOOM मॉडल
बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मेंटेन; जिसमें पारेषण सेवा प्रदाता परियोजना बनाते, रखते, चलाते और उसका अनुरक्षण करते हैं।
कर्टेलमेंट (Curtailment)
ग्रिड बाधा या मांग कम होने पर उपलब्ध नवीकरणीय बिजली का उत्पादन/निकासी जबरन घटाना।

अभ्यास प्रश्न

  1. भारत में नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में पारेषण अवरोध किस प्रकार बाधा हैं? ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III के प्रावधानों के संदर्भ में परीक्षण कीजिए।
  2. बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियां (BESS) ग्रिड लचीलापन और गैर-सौर घंटों की मांग पूर्ति में क्या भूमिका निभा सकती हैं? GEC-III के 50 GWh प्रावधान के आलोक में चर्चा कीजिए।
  3. 2035 तक 900 GW गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य को पाने में केंद्र-राज्य संस्थागत तालमेल (STUs, TSPs, TBCB) कितना निर्णायक है? मूल्यांकन कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बरशिनजियांग में 247 मीटर ऊंचे दाशिश्या बांध से बिजली उत्पादन शुरू →
← सभी ख़बरें