बाल शोषण सामग्री रिपोर्टिंग पर केंद्र से सुप्रीम कोर्ट का जवाब तलब

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र से कहा कि वह बताए कि बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) की रिपोर्टिंग और हटाने के लिए सोशल मीडिया मध्यवर्तियों की जवाबदेही तय करने को क्या कदम उठाए गए हैं। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले को 'अत्यंत गंभीर' बताते हुए 15 अक्टूबर तक हलफनामा दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस ने 23 सितंबर 2024 के फैसले के पालन की मांग की। एएसजी केएम नटराज ने कहा कि गूगल और मेटा ने ही I4C को सीधे रिपोर्ट करने पर सहमति दी है।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#supreme court#child protection#social media#pocso#cseam

डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • A bench of justices JB Pardiwala and K Vinod Chandran called the issue 'extremely serious' and gave the Centre a last chance to file an affidavit by October 15. — Attributed to the bench with direct quote appearing in the source; dates as given.
  • Google and Meta are the only two companies that have agreed to report CSEAM directly to the Indian Cybercrime Coordination Centre (I4C). — Attributed to ASG KM Nataraj in the source; not independently verifiable here.
  • The Supreme Court's September 23, 2024 judgment holds intermediaries duty-bound to report child abuse content under POCSO. — Date and quoted text from the judgment appear in the source.
  • JRCA's application cited a news report alleging Instagram carried paid advertisements promoting CSEAM. — Presented in the source as an allegation in a news report referred to by the petitioner; remains unverified.
  • Advocate Bhuwan Ribhu said there is hardly any enforcement of the court's directions. — Attributed to the petitioner's counsel; an opinion, not an established fact.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ऊपर से यह अदालत और सरकार के बीच जवाबदेही की खींचतान है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह केंद्र के लिए देरी से जुड़ी असहज कहानी है। सितंबर 2024 के फैसले के दो साल बाद भी, 14 अगस्त के निर्देश पर जवाब न आना और पीठ का "अंतिम अवसर" कहना प्रशासनिक अमल पर सवाल खड़े करता है। दूसरी ओर, बाल सुरक्षा ऐसा मुद्दा है जिस पर कोई दल विरोध नहीं करेगा — यानी सरकार के पास इसे सख्त नियामक कदम के रूप में पेश करने की गुंजाइश भी है।

  • "अंतिम अवसर" की भाषा और 15 अक्टूबर की समयसीमा दबाव सीधे आईटी और विधि मंत्रालयों के राजनीतिक नेतृत्व पर डाल देती है।
  • एएसजी का यह बताना कि केवल गूगल और मेटा ने I4C को सीधे रिपोर्ट करने पर सहमति दी है, सरकार को अन्य प्लेटफॉर्मों पर कड़े कदम का नैतिक और राजनीतिक आधार देता है।
  • बाल सुरक्षा पर कोई दल प्लेटफॉर्मों के पक्ष में खड़ा नहीं दिखेगा, इसलिए विपक्ष की आलोचना नीति की दिशा पर नहीं, अमल की विफलता पर केंद्रित रहने की संभावना है।
  • याचिकाकर्ता की मांगें — एकरूप एसओपी, केंद्रीकृत रिपोर्टिंग पोर्टल, एनडीएसओ में दर्ज करना — बड़ी विदेशी टेक कंपनियों पर नकेल कसने की व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति से मेल खाती हैं।
  • भविष्य की सावधानियों पर जवाब मांगकर पीठ ने संकेत दिया है कि मामला एक हलफनामे से नहीं निपटेगा, निगरानी जारी रहेगी।

किस पर नज़र रखें — देखना यह है कि 15 अक्टूबर तक केंद्र का हलफनामा ठोस एसओपी और नियम न मानने वाले प्लेटफॉर्मों पर कार्रवाई बताता है, या फिर और समय मांगता है।

यह खबर यह स्पष्ट नहीं करती कि किस प्लेटफॉर्म को नोटिस गया, जवाब में देरी क्यों हुई, या इंस्टाग्राम से जुड़ा आरोप सत्यापित है या नहीं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर 2024 के अपने फैसले में कहा था कि सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (इंटरमीडियरीज़) का यह कर्तव्य है कि वे बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) को हटाएँ और पॉक्सो अधिनियम के तहत स्थानीय पुलिस को तुरंत रिपोर्ट करें। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस (JRCA) ने इस फैसले के पालन और एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया। गुरुवार को न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र से पूछा कि मध्यवर्तियों की जवाबदेही तय करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और चूक होने पर क्या एहतियात बरते जाएँगे। पीठ ने मामले को "अत्यंत गंभीर" बताते हुए केंद्र को हलफनामा दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया।

मुख्य तथ्य

  • सुप्रीम कोर्ट की पीठ (न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन) ने केंद्र को 15 अक्टूबर तक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया।
  • 14 अगस्त को अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा विधि एवं न्याय मंत्रालय को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था, जो नहीं आया।
  • अदालत का फैसला 23 सितंबर 2024 को आया था, जिसमें मध्यवर्तियों पर पॉक्सो के तहत रिपोर्टिंग का दायित्व डाला गया।
  • एएसजी के एम नटराज के अनुसार गूगल और मेटा ही दो कंपनियाँ हैं जो CSEAM की सीधे भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) को रिपोर्ट करने पर सहमत हुई हैं।
  • एएसजी ने बताया कि एक अन्य मध्यवर्ती को नोटिस जारी कर कार्यवाही शुरू की गई है और एक सप्ताह में जवाब दाखिल होगा।
  • 2024 के फैसले में कहा गया कि पॉक्सो की धारा 19 व 20 और पॉक्सो नियम 11 के पालन व ड्यू डिलिजेंस के बिना मध्यवर्ती आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत छूट का दावा नहीं कर सकता।
  • JRCA के आवेदन में एक समाचार रिपोर्ट का हवाला दिया गया जिसमें आरोप था कि इंस्टाग्राम पर CSEAM को बढ़ावा देने वाले सशुल्क विज्ञापन चल रहे थे।
  • याचिकाकर्ता ने अपराधियों का विवरण राष्ट्रीय यौन अपराधी डेटाबेस (NDSO) पर तुरंत अपलोड करने और केंद्रीकृत ऑनलाइन रिपोर्टिंग पोर्टल बनाने की मांग की।

समयरेखा

  1. 23 सितंबर 2024सुप्रीम कोर्ट का फैसला — सोशल मीडिया मध्यवर्तियों का पॉक्सो के तहत बाल शोषण सामग्री की रिपोर्टिंग व हटाने का कर्तव्य स्पष्ट किया गया।
  2. 14 अगस्तअदालत ने MeitY और विधि एवं न्याय मंत्रालय को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
  3. गुरुवार (सुनवाई का दिन)पीठ ने मामले को 'अत्यंत गंभीर' बताया, केंद्र से उठाए गए कदम बताने को कहा और 15 अक्टूबर तक हलफनामे का अंतिम अवसर दिया।
  4. 15 अक्टूबरकेंद्र द्वारा जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अंतिम तिथि।

किसका दाँव

  • सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला व के विनोद चंद्रन की पीठ) — अपने 23 सितंबर 2024 के फैसले के प्रभावी अनुपालन को सुनिश्चित करना।
  • केंद्र सरकार — MeitY और विधि एवं न्याय मंत्रालय — फैसले को अर्थपूर्ण रूप देने के लिए उठाए कदम और भविष्य की एहतियात हलफनामे में बताना।
  • जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस (JRCA), अधिवक्ता भुवन रिभु — याचिकाकर्ता; फैसले के पालन, समान SOP और मध्यवर्तियों पर आपराधिक कार्यवाही की मांग।
  • सोशल मीडिया मध्यवर्ती (गूगल, मेटा, इंस्टाग्राम सहित) — पॉक्सो अनुपालन न करने पर आईटी अधिनियम की धारा 79 की सुरक्षा छूट खोने का जोखिम।
  • भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), गृह मंत्रालय — साइबर अपराध रिपोर्टिंग की नोडल एजेंसी; मध्यवर्तियों से सीधी CSEAM रिपोर्ट प्राप्त करना।
  • बच्चे — ऑनलाइन शोषण सामग्री के प्रसार से सुरक्षा और समय पर कार्रवाई।

क्यों अहम है

यह मामला तय करेगा कि बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म बाल यौन शोषण सामग्री पर कानूनी रूप से कितने जवाबदेह हैं और 'सेफ हार्बर' छूट की सीमा क्या है। अदालत के अनुसार दो साल पुराने फैसले के बावजूद प्रवर्तन लगभग नहीं हुआ, जिससे न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन में अंतर उजागर होता है। गूगल और मेटा के अलावा किसी मध्यवर्ती का I4C को सीधे रिपोर्ट न करना संस्थागत रिपोर्टिंग ढाँचे की कमजोरी दर्शाता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • सुप्रीम कोर्ट का CSEAM संबंधी फैसला: 23 सितंबर 2024; पीठ — न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला व के विनोद चंद्रन (वर्तमान सुनवाई)।
  • पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 व 20 तथा पॉक्सो नियम 11 — बाल शोषण सामग्री की अनिवार्य रिपोर्टिंग से जुड़े प्रावधान।
  • आईटी अधिनियम की धारा 79 — तृतीय-पक्ष सामग्री पर मध्यवर्ती की छूट; ड्यू डिलिजेंस व पॉक्सो अनुपालन के बिना उपलब्ध नहीं।
  • I4C (भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र) — गृह मंत्रालय के अधीन साइबर अपराध रिपोर्टिंग की नोडल एजेंसी।
  • NDSO — राष्ट्रीय यौन अपराधी डेटाबेस; याचिका में अपराधियों का विवरण तुरंत अपलोड करने की मांग।
  • याचिकाकर्ता: जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस (JRCA); केंद्र की ओर से एएसजी के एम नटराज।

मेन्स दृष्टिकोण

बाल यौन शोषण सामग्री का ऑनलाइन प्रसार तकनीकी पहुँच और कमजोर प्रवर्तन का संयुक्त परिणाम है। सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर 2024 के फैसले ने स्पष्ट किया कि पॉक्सो की धारा 19-20 और नियम 11 के अनिवार्य स्वरूप को देखते हुए मध्यवर्ती केवल सामग्री हटाकर नहीं, बल्कि संबंधित पुलिस इकाइयों को तत्काल रिपोर्ट करके ही आईटी अधिनियम की धारा 79 की छूट का दावा कर सकते हैं। फिर भी, याचिकाकर्ता के अनुसार दो वर्षों में प्रवर्तन नगण्य रहा; गूगल और मेटा को छोड़कर कोई मध्यवर्ती I4C को सीधे रिपोर्ट नहीं करता, और इंस्टाग्राम पर CSEAM को बढ़ावा देने वाले सशुल्क विज्ञापनों का आरोप अनुपालन पर प्रश्न उठाता है। आगे का रास्ता याचिका में सुझाए उपायों की दिशा में दिखता है — पहचान व अनिवार्य रिपोर्टिंग, साक्ष्य संरक्षण और अंतर-एजेंसी समन्वय को समाहित करने वाली एक समान SOP, केंद्रीकृत ऑनलाइन रिपोर्टिंग पोर्टल, NDSO पर अपराधियों का त्वरित अद्यतन, प्रत्येक रिपोर्ट पर एजेंसियों की समयबद्ध कार्रवाई तथा चूक करने वाले मध्यवर्तियों पर विधि अनुसार आपराधिक कार्यवाही। अदालत ने केंद्र से यह भी कहा है कि वह भविष्य की चूक रोकने के लिए एहतियाती कदम स्पष्ट शब्दों में बताए।

मुख्य शब्द

CSEAM
बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री — जिसे हटाना और पुलिस/एजेंसियों को रिपोर्ट करना मध्यवर्तियों का कर्तव्य बताया गया है।
सोशल मीडिया मध्यवर्ती (इंटरमीडियरी)
तृतीय-पक्ष सामग्री होस्ट या उपलब्ध कराने वाला प्लेटफॉर्म, जिसकी छूट आईटी अधिनियम की धारा 79 से जुड़ी है।
आईटी अधिनियम की धारा 79
तृतीय-पक्ष सूचना के लिए मध्यवर्ती को दायित्व से छूट, जो ड्यू डिलिजेंस व पॉक्सो अनुपालन पर सशर्त है।
पॉक्सो धारा 19 व 20, नियम 11
बाल यौन अपराध/सामग्री की जानकारी होने पर अनिवार्य रिपोर्टिंग से संबंधित प्रावधान।
I4C
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र — गृह मंत्रालय की नोडल एजेंसी, जहाँ साइबर अपराध रिपोर्ट किए जाते हैं।
NDSO
राष्ट्रीय यौन अपराधी डेटाबेस, जिसमें अपराधियों का विवरण अपलोड करने की मांग की गई है।

अभ्यास प्रश्न

  1. सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर 2024 के फैसले के आलोक में परीक्षण करें कि पॉक्सो अधिनियम की अनिवार्य रिपोर्टिंग बाध्यताएँ आईटी अधिनियम की धारा 79 के 'सेफ हार्बर' संरक्षण को किस प्रकार सीमित करती हैं।
  2. ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री पर अंकुश लगाने में भारत में प्रवर्तन की कमियाँ क्या हैं? एक समान SOP और केंद्रीकृत रिपोर्टिंग पोर्टल किस तरह मदद कर सकते हैं?
  3. I4C और NDSO जैसे संस्थागत तंत्रों की भूमिका बताते हुए चर्चा करें कि न्यायिक निर्देशों के क्रियान्वयन में जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बरराहुल गांधी ने सीईसी ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग की →
← सभी ख़बरें