नल्लामला से चेंचू विस्थापन: पुराने पुनर्वास में मदद नहीं मिली
नागरकुरनूल जिला प्रशासन और वन विभाग नल्लामला जंगलों के चेंचू आदिवासियों को अमराबाद जैसे बफर क्षेत्रों में बसाने की प्रक्रिया में हैं। 1990 के दशक के अंत में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान कोल्लमपेंटा से करीब 35 परिवार यहां आए, लेकिन कोई पुनर्वास पैकेज नहीं मिला और अब वे 100 से अधिक परिवार हैं, निवासी अंजैया ने बताया। अब 15 लाख रुपये मुआवजा या पांच एकड़ जमीन का विकल्प दिया जा रहा है। कंदलकुंटा की 163 विवादित एकड़ पर हाईकोर्ट का फैसला 18 जुलाई को आ सकता है।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Around 35 families from Kollampenta were relocated to Amrabad mandal headquarters with no rehabilitation package, and have since grown to over 100 families — Attributed to Anjaiah, a relocated Chenchu, speaking to Siasat.com; figures appear in source, not independently verifiable
- Chenchus are being offered Rs 15 lakh one-time compensation or five acres in Bacharam village, Peddakothapally mandal — Figure appears in source but no official named as the source of the offer
- Forest officials demolished pukka houses in Rayaletipenta last year after residents refused to relocate — Stated by the reporter without named attribution; requires official confirmation
- 163 of 500 acres of forest land at Kandlakunta are under litigation, with a High Court judgement reserved and expected on July 18 — Figures appear in source; date given without a case reference or court citation
- Around 500 families from core and buffer zone villages have agreed to relocate, mostly from other communities including Lambadas — Attributed only to unnamed 'sources'
विश्लेषकों की राय राय
यह केवल वन-प्रशासन का मामला नहीं है; राजनीतिक रूप से यह भरोसे की कमी की कहानी है। रिपोर्ट के अनुसार 90 के दशक के अंत में नक्सल-विरोधी अभियानों के दौरान कोल्लमपेंटा से आई करीब 35 परिवारों को कोई पुनर्वास पैकेज नहीं मिला — यही स्मृति आज 15 लाख रुपये या पाँच एकड़ ज़मीन के प्रस्ताव पर संदेह पैदा करती है। इसलिए सरकार के मौजूदा 'नरम' रुख की सफलता पैकेज की राशि से ज़्यादा उसके अमल की विश्वसनीयता पर टिकी है।
- बीता अनुभव राजनीतिक बोझ बन गया है — जहाँ पहले पुनर्वास के बिना विस्थापन हुआ, वहाँ हर नया प्रस्ताव शक की नज़र से देखा जाएगा।
- 15 लाख रुपये या पाँच एकड़ का विकल्प प्रशासन के लिए सुविधाजनक है, पर लाभार्थियों का तर्क है कि औज़ार, बैल और बीज के बिना ज़मीन बेमानी है।
- कंदलकुंटा की विवादित 163 एकड़ पर हाईकोर्ट का फ़ैसला, जो कहानी के मुताबिक 18 जुलाई को आ सकता है, सरकार की गुंजाइश बढ़ा या घटा सकता है।
- वन विभाग में नौकरियों का सुझाव — एनटीआर काल की परंपरा की याद दिलाता हुआ — चेंचुओं को वन संरक्षण में हिस्सेदार बनाकर कम विवादित राजनीतिक रास्ता देता है।
- आईटीडीए के निष्क्रिय होने की शिकायत आदिवासी कल्याण तंत्र पर सवाल उठाती है, और कोर क्षेत्र के परिवारों का इनकार जारी रहे तो जबरन विस्थापन के आरोप राजनीतिक रंग ले सकते हैं।
किस पर नज़र रखें — 18 जुलाई के हाईकोर्ट फ़ैसले और स्थानांतरण पर सहमत लगभग 500 परिवारों को वास्तव में क्या मिलता है, इस पर नज़र रखें — इससे तय होगा कि यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से टिकती है या उलटी पड़ती है।
यह रिपोर्ट स्थानांतरण के पीछे सरकार के घोषित कारणों, किसी दल के रुख, चुनावी गणित या मुआवज़े के अमल का ब्यौरा स्थापित नहीं करती।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
नल्लामला के जंगल तेलंगाना के नागरकुरनूल जिले में अमराबाद टाइगर रिजर्व का हिस्सा हैं, जहाँ चेंचू आदिवासी सदियों से रह रहे हैं। 1990 के दशक के अंत में पुलिस-नक्सल संघर्ष के दौरान कई चेंचू परिवार अपने "पेंटा" (बस्तियों) से भागकर अमराबाद जैसे बफर क्षेत्रों में आ गए, लेकिन उन्हें कोई पुनर्वास पैकेज नहीं मिला। अब जिला प्रशासन और वन विभाग कोर क्षेत्र के चेंचुओं को फिर से बाहर बसाने की प्रक्रिया में हैं और 15 लाख रुपये मुआवजा या पाँच एकड़ जमीन का विकल्प दे रहे हैं। पुराने विस्थापितों की दुर्दशा इस नई कवायद पर सवाल खड़े करती है।
मुख्य तथ्य
- 1990 के दशक के अंत में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान कोल्लमपेंटा से लगभग 35 चेंचू परिवार अमराबाद मंडल मुख्यालय पहुँचे; कोई पुनर्वास या पुनर्स्थापन पैकेज नहीं मिला।
- वही 35 परिवार अब बढ़कर 100 से अधिक परिवार हो गए हैं, निवासी अंजैया के अनुसार।
- चेंचुओं ने पहले "इंदिरम्मा इल्लू" योजना के तहत घर बनाए थे, जो अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं।
- अब दो विकल्प दिए जा रहे हैं: 15 लाख रुपये एकमुश्त मुआवजा, या कोल्लापुर के पेड्डाकोठापल्ली मंडल के बचरम गाँव या अन्यत्र पाँच एकड़ जमीन।
- अमराबाद मंडल के कंदलकुंटा में 500 एकड़ वन भूमि है, जिसमें से लगभग 163 एकड़ वन विभाग और चेंचू, लंबाडा सहित स्थानीय लोगों के बीच मुकदमेबाजी में फँसी है।
- हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा है, जो 18 जुलाई को आ सकता है।
- सूत्रों के अनुसार कोर और बफर क्षेत्र के कई गाँवों से करीब 500 परिवार स्थानांतरण पर सहमत हुए हैं, जिनमें अधिकांश लंबाडा सहित अन्य समुदायों के हैं।
- पिछले साल वन अधिकारियों ने रायलेटिपेंटा में दशकों पुराने पक्के मकान गिरा दिए क्योंकि वहाँ के चेंचुओं ने हटने से इनकार किया था।
समयरेखा
- 1980 का दशक (एनटी रामाराव सरकार)कुछ चेंचुओं को फॉरेस्ट बीट ऑफिसर और फॉरेस्ट सेक्शन ऑफिसर की नौकरियाँ दी गईं; वे सभी अब सेवानिवृत्ति के करीब हैं।
- 1990 के दशक का अंतपुलिस-नक्सल संघर्ष के चलते कोल्लमपेंटा से ~35 परिवार अमराबाद, तथा कोम्मनिपेंटा, रायलेटिपेंटा व थतिगुंडाला से चेंचू मचारम, वटवर्लापल्ली, सर्लापल्ली आदि गाँवों में भागे।
- वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के मुख्यमंत्रित्व काल मेंनल्लामला से नक्सलियों का सफाया; इसके बाद चेंचू जंगल और अमराबाद की गैर-अधिसूचित बस्ती दोनों में रहने लगे।
- 2006वन अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद चेंचुओं को अपने मूल पेंटा की जमीनों के पट्टे मिले।
- पिछले सालवन अधिकारियों ने रायलेटिपेंटा के पक्के मकान ध्वस्त किए।
- 18 जुलाई (संभावित)कंदलकुंटा की 163 विवादित एकड़ पर हाईकोर्ट का फैसला आ सकता है।
किसका दाँव
- चेंचू आदिवासी (कोल्लमपेंटा, कोम्मनिपेंटा, रायलेटिपेंटा, अप्पापुर आदि) — जंगल से जुड़ी आजीविका, वन अधिकार अधिनियम के तहत मिले पट्टे और भविष्य में आवास व खेती की सुरक्षा दाँव पर।
- नागरकुरनूल जिला प्रशासन और वन विभाग — कोर क्षेत्र से परिवारों को हटाकर बफर क्षेत्रों में बसाना और अमराबाद टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र को मानव बस्ती से मुक्त करना।
- आईटीडीए मन्ननूर — आदिवासी विकास की जिम्मेदार एजेंसी; स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूह अध्यक्ष के अनुसार यह "पूरी तरह निष्क्रिय" है।
- रोहित गोपिडी, जिला वन अधिकारी एवं आईटीडीए मन्ननूर परियोजना अधिकारी — सुझाव देते हैं कि हर चेंचू पेंटा के योग्य व्यक्तियों को वन विभाग में नौकरी देकर उन्हें वन संरक्षण का हिस्सेदार बनाया जाए।
- लंबाडा और अन्य स्थानीय समुदाय — कंदलकुंटा की 163 एकड़ जमीन पर मुकदमेबाजी में पक्षकार; स्थानांतरण पर सहमत 500 परिवारों में अधिकांश इन्हीं समुदायों से।
- तेलंगाना उच्च न्यायालय — कंदलकुंटा भूमि विवाद का फैसला तय करेगा कि भूमिहीन किसानों और चेंचुओं को पुनर्वास के लिए जमीन मिल सकेगी या नहीं।
- "बाहरी" काश्तकार और भूस्वामी — चेंचुओं की पट्टा जमीनें पट्टे पर लेकर जोतते हैं; चेंचू उनके खेतों में मजदूरी करते हैं।
क्यों अहम है
यह मामला दिखाता है कि संरक्षित क्षेत्रों से आदिवासी विस्थापन बिना ठोस पुनर्वास पैकेज के कैसे वन-निर्भर समुदायों को भूमिहीन मजदूर बना देता है — 1990 के दशक के विस्थापित चेंचू आज भी अस्थायी झोपड़ियों और खुले में शौच की स्थिति में हैं। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पट्टे मिलने के बावजूद उपकरण, बैल और बीज के अभाव में चेंचू अपनी जमीनें "बाहरी" लोगों को पट्टे पर देने को मजबूर हैं, जो अधिकारों के कागजी और वास्तविक अमल के अंतर को उजागर करता है। बाघ संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन की यह कसौटी देशभर के टाइगर रिजर्व पुनर्वास मामलों के लिए प्रासंगिक है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- चेंचू — नल्लामला जंगलों (अमराबाद टाइगर रिजर्व, नागरकुरनूल जिला, तेलंगाना) के मूल आदिवासी समुदाय; उनकी बस्तियाँ "पेंटा" कहलाती हैं।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने के बाद चेंचुओं को उनके मूल पेंटा की जमीनों के पट्टे मिले।
- पुनर्वास विकल्प: 15 लाख रुपये एकमुश्त मुआवजा या कोल्लापुर के पेड्डाकोठापल्ली मंडल के बचरम गाँव में पाँच एकड़ जमीन।
- कंदलकुंटा (अमराबाद मंडल) में 500 एकड़ वन भूमि, जिसमें 163 एकड़ पर हाईकोर्ट का फैसला 18 जुलाई को संभावित।
- आईटीडीए मन्ननूर के परियोजना अधिकारी ही जिला वन अधिकारी (रोहित गोपिडी) हैं; अप्पापुर ग्राम पंचायत (लिंगल मंडल) कोर क्षेत्र में स्थित है।
- "इंदिरम्मा इल्लू" — वह आवास योजना जिसके तहत अमराबाद के विस्थापित चेंचुओं ने घर बनाए थे, जो अब जीर्ण-शीर्ण हैं।
मेन्स दृष्टिकोण
नल्लामला के चेंचुओं का मामला संरक्षण-आधारित विस्थापन और आदिवासी अधिकारों के टकराव का प्रतिनिधि उदाहरण है। पहला विस्थापन स्वैच्छिक नहीं, बल्कि 1990 के दशक के नक्सल विरोधी अभियानों की हिंसा से भागने की मजबूरी थी और उसमें कोई पुनर्वास पैकेज शामिल नहीं था — नतीजा यह कि दो दशक बाद भी 35 से बढ़कर 100 से अधिक हो चुके परिवार अस्थायी झोपड़ियों, खुले में शौच और जीर्ण इंदिरम्मा इल्लू मकानों में रह रहे हैं। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पट्टे मिलने के बाद भी बैल, कृषि उपकरण और बीज के अभाव में वे जमीनें "बाहरियों" को पट्टे पर देकर खुद खेत मजदूर बन गए हैं, और स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूह अध्यक्ष के शब्दों में आईटीडीए "पूरी तरह निष्क्रिय" है। अब 15 लाख रुपये या पाँच एकड़ जमीन के विकल्प के साथ दूसरा विस्थापन प्रस्तावित है, जबकि रायलेटिपेंटा में मकान ध्वस्त किए जाने जैसी घटनाएँ सहमति की स्वैच्छिकता पर सवाल उठाती हैं। आगे का रास्ता स्रोत में सुझाए तीन बिंदुओं में दिखता है — कंदलकुंटा की वन भूमि पर अनुकूल न्यायिक निर्णय के बाद भूमि आवंटन, केवल नकद नहीं बल्कि मकान, बैल, उपकरण और बीज जैसे उत्पादक निवेश, और एनटी रामाराव काल की तरह हर पेंटा के योग्य व्यक्ति को वन विभाग में नौकरी देकर चेंचुओं को वन संरक्षण का हिस्सेदार बनाना।
मुख्य शब्द
- चेंचू
- नल्लामला जंगलों के मूल निवासी आदिवासी समुदाय, जो सदियों से जंगल के भीतर रहते आए हैं।
- पेंटा
- चेंचुओं की पारंपरिक वन बस्ती; जैसे कोल्लमपेंटा, कोम्मनिपेंटा, रायलेटिपेंटा, पुल्लईपल्ली, अप्पापुर।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006
- कानून जिसके लागू होने के बाद चेंचुओं को अपने मूल पेंटा की भूमि पर पट्टे प्रदान किए गए।
- आईटीडीए (एकीकृत आदिवासी विकास अभिकरण), मन्ननूर
- आदिवासी विकास के लिए जिम्मेदार संस्था, जिसके परियोजना अधिकारी जिला वन अधिकारी हैं; स्थानीय लोग इसे निष्क्रिय बताते हैं।
- कोर और बफर क्षेत्र
- अमराबाद टाइगर रिजर्व के भीतरी (कोर) और बाहरी (बफर) हिस्से; प्रशासन कोर से हटाकर अमराबाद जैसे बफर क्षेत्रों में बसाना चाहता है।
- इंदिरम्मा इल्लू
- आवास योजना जिसके तहत अमराबाद में बसे चेंचुओं ने पहले मकान बनाए थे, जो अब खंडहर हो चुके हैं।
अभ्यास प्रश्न
- संरक्षित क्षेत्रों से आदिवासी समुदायों के पुनर्वास में "स्वैच्छिक सहमति" का व्यावहारिक अर्थ क्या है? नल्लामला के चेंचुओं के अनुभव के आधार पर परीक्षण करें।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पट्टे मिलने के बाद भी चेंचू अपनी जमीनें "बाहरियों" को पट्टे पर देने को मजबूर क्यों हैं? अधिकारों के कागजी और वास्तविक अमल के अंतर पर चर्चा करें।
- क्या आदिवासियों को वन विभाग में नौकरी देकर उन्हें वन संरक्षण का हिस्सेदार बनाना विस्थापन का व्यावहारिक विकल्प हो सकता है? पक्ष-विपक्ष में तर्क दें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
