सीईसी कानून फैसले को वापस लेने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका
मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की वैधता पर 23 सितंबर के विभाजित फैसले को वापस लेने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता डॉ जया ठाकुर का कहना है कि पीठ में शामिल जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा 10 जुलाई 2024 से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में निर्वाचन आयोग के स्टैंडिंग काउंसल हैं। पूर्वाग्रह की आशंका और औचित्य के आधार पर दाखिल याचिका को वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने प्रमाणित किया है।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- A curative petition seeks recall of the September 23 split verdict on the CEC and Other Election Commissioners Act, 2023. — Attributed in source to a petition filed by Dr Jaya Thakur through AoR Varun Thakur; contents of petition quoted.
- Justice Satish Chandra Sharma's son Siddharth Sharma is the Election Commission's standing counsel before the Madhya Pradesh High Court, empanelled since July 10, 2024. — Presented as the petitioner's claim, said to be verified from the MP High Court website and sourced to a LiveLaw article; not independently verified here.
- The petition invokes 'reasonable apprehension of bias and propriety' and seeks exemption from first filing a review. — Figure/ground appears in source as the petition's own submission.
- A bench of Justice Dipankar Datta and Justice SC Sharma referred the challenge to the 2023 law for a Constitution Bench via the CJI. — Stated in source as a recap of the court's order; consistent internally.
- The petition was certified by Senior Advocate Vijay Hansaria. — Attributed in source; no supporting document cited.
विश्लेषकों की राय राय
यह दिखने में कानूनी याचिका है, लेकिन इसका असली वजन राजनीतिक है। मूल लड़ाई इस पर है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर नियंत्रण किसका हो — कार्यपालिका के दबदबे वाली प्रक्रिया का या अधिक स्वतंत्र व्यवस्था का — और अब उसमें प्रक्रियागत औचित्य का नया मोड़ जुड़ गया है। बंटे फैसले को वापस लेने की मांग करके याचिकाकर्ता केवल मामला फिर नहीं खोल रहीं, बल्कि उस नतीजे को भी राजनीतिक रूप से सवालों में घेर रही हैं जो बड़े बेंच के मुद्दे पर केंद्र के पक्ष में गया।
- फैसले की विषयवस्तु की जगह बेंच की संरचना पर हमला करके चुनौती देने वाले उस देरी के लाभ को कम करने की कोशिश कर रहे हैं जो बड़ी बेंच को भेजने से केंद्र को मिला।
- न्यायमूर्ति दत्ता की नियुक्तियों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप पर जताई चिंता 2023 के कानून के विरोधियों को पहले से राजनीतिक तर्क दे चुकी है।
- चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर चल रही तीखी बहस में यह याचिका 'न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए' वाले तर्क को नई धार देती है।
- पुनर्विचार चरण को छोड़ने की मांग सोची-समझी रणनीति है — याचिकाकर्ता खुलकर कह रही हैं कि उसी बेंच के सामने जाने से कोई लाभ नहीं होगा।
- दूसरी ओर यह तर्क भी संभव है कि दोनों न्यायाधीशों ने मिलकर मामला संविधान पीठ को भेजा, जिससे पूरे फैसले के दूषित होने का दावा कमजोर पड़ता है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट क्यूरेटिव याचिका सुनवाई योग्य मानता है या नहीं, और इस बीच बड़ी बेंच के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है या नहीं — इनका क्रम राजनीतिक विमर्श तय करेगा।
यह खबर पक्षपात सिद्ध नहीं करती, केवल आरोप दर्ज करती है; अदालत की प्रतिक्रिया और संबंधित न्यायाधीश का पक्ष अभी सामने नहीं आया है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की दो-सदस्यीय पीठ ने 23 सितंबर को विभाजित फैसला दिया और मामला बड़ी पीठ के गठन के लिए सीजेआई के पास भेज दिया। इसके बाद यह तथ्य सामने आया कि उस पीठ में शामिल जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में निर्वाचन आयोग के स्टैंडिंग काउंसल हैं। इसी आधार पर याचिकाकर्ता डॉ जया ठाकुर ने "पूर्वाग्रह की उचित आशंका और औचित्य" का हवाला देते हुए फैसले को वापस लेने (recall) के लिए सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दाखिल की है।
मुख्य तथ्य
- 23 सितंबर के विभाजित फैसले को वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दाखिल की गई है।
- चुनौती मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की वैधता से जुड़ी है।
- याचिका के अनुसार जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा 10 जुलाई 2024 से ECI के पैनल में हैं और एमपी हाईकोर्ट में निर्वाचन आयोग के स्टैंडिंग काउंसल हैं।
- याचिका डॉ जया ठाकुर ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड वरुण ठाकुर के जरिये दाखिल की; इसे वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने प्रमाणित किया।
- याचिका अनुच्छेद 32 के साथ अनुच्छेद 142 तथा सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के आदेश 48 नियम 1 के तहत, रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा के दिशानिर्देशों के अनुरूप दाखिल हुई है।
- याचिकाकर्ता ने पहले पुनर्विचार (रिव्यू) याचिका दाखिल करने से छूट मांगी है, यह कहते हुए कि वह उसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होगी और कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
- याचिका में 'पूर्वाग्रह की उचित संभावना' और 'रियल डेंजर टेस्ट' का हवाला देते हुए कहा गया कि जस्टिस शर्मा की पीठ में उपस्थिति ने 23 सितंबर के निर्णय को दूषित किया।
- 23 सितंबर के फैसले में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा ने रेफरेंस पर असहमति के बावजूद मामला उचित संख्या वाली संविधान पीठ के गठन हेतु सीजेआई के पास भेजा।
समयरेखा
- 2023मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम पारित; इसकी वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
- 10 जुलाई 2024स्रोत के अनुसार जस्टिस एससी शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा निर्वाचन आयोग के पैनल में शामिल (एमपी हाईकोर्ट में स्टैंडिंग काउंसल)।
- 23 सितंबरजस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ का विभाजित फैसला; मामला संविधान पीठ के गठन के लिए सीजेआई को भेजा गया।
- फैसले के बादलाइवलॉ के लेख से याचिकाकर्ता को जस्टिस शर्मा के बेटे के ECI से संबंध की जानकारी मिली; एमपी हाईकोर्ट वेबसाइट से सत्यापन।
- इसके बादडॉ जया ठाकुर द्वारा फैसले को वापस लेने के लिए क्यूरेटिव याचिका दाखिल।
किसका दाँव
- डॉ जया ठाकुर (याचिकाकर्ता) — 2023 अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ता; विभाजित फैसले को वापस कराकर निष्पक्ष सुनवाई चाहती हैं।
- जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा — याचिका में कहा गया कि उन्हें बेटे के ECI स्टैंडिंग काउंसल होने का खुलासा सुनवाई शुरू होने से पहले करना चाहिए था।
- जस्टिस दीपांकर दत्ता — पीठ के दूसरे सदस्य; उन्होंने बड़ी पीठ को भेजने की केंद्र की मांग को अनुचित बताया और न्यायाधीश नियुक्ति में कार्यपालिका के हस्तक्षेप पर चिंता जताई।
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) — मामले में पक्षकार; इसके स्टैंडिंग काउंसल से जुड़े हितों के टकराव का आरोप याचिका का केंद्र है।
- केंद्र सरकार (यूनियन) — 2023 कानून का बचाव; बड़ी पीठ को संदर्भित करने की मांग की और तर्क दिया कि कार्यपालिका-प्रधान निकाय ईसी चुन सकता है।
- सुप्रीम कोर्ट/सीजेआई — संविधान पीठ का गठन और क्यूरेटिव याचिका पर निर्णय; न्यायिक औचित्य व साख का प्रश्न।
- वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया — क्यूरेटिव याचिका को प्रमाणित करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता, जो प्रक्रियात्मक आवश्यकता है।
क्यों अहम है
मामला निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया की वैधता से जुड़ा है, जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए केंद्रीय प्रश्न है। साथ ही यह याचिका न्यायिक औचित्य, हितों के टकराव के खुलासे और "न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए" के सिद्धांत पर बहस खड़ी करती है। क्यूरेटिव याचिका का परिणाम तय करेगा कि 23 सितंबर का विभाजित फैसला कायम रहेगा या नए सिरे से सुनवाई होगी।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- क्यूरेटिव याचिका की रूपरेखा रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा मामले के दिशानिर्देशों से तय होती है।
- याचिका अनुच्छेद 32 के साथ अनुच्छेद 142 और सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के आदेश 48 नियम 1 के तहत दाखिल; वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा प्रमाणन आवश्यक।
- विवादित कानून: मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023।
- 23 सितंबर का विभाजित फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की 2-सदस्यीय पीठ ने दिया।
- याचिका में 'पूर्वाग्रह की उचित संभावना' (reasonable likelihood of bias) और 'रियल डेंजर टेस्ट' का उल्लेख।
- पीठ ने मामला उचित संख्या वाली संविधान पीठ के गठन के लिए सीजेआई के पास भेजा।
मेन्स दृष्टिकोण
निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी 2023 अधिनियम की संवैधानिक वैधता का प्रश्न दो स्तरों पर महत्वपूर्ण बन गया है — पहला, चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका की भूमिका; दूसरा, न्यायिक औचित्य और हितों के टकराव का खुलासा। स्रोत के अनुसार 23 सितंबर की विभाजित राय में जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को भेजने की केंद्र की मांग को अनुचित माना और न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के हस्तक्षेप पर चिंता जताई, वहीं जस्टिस शर्मा ने भिन्न मत रखा; अंततः विलंब से बचने के लिए मामला संविधान पीठ हेतु सीजेआई को भेजा गया। क्यूरेटिव याचिका का तर्क है कि पीठ के एक न्यायाधीश के पुत्र के ECI का स्टैंडिंग काउंसल होने से "पूर्वाग्रह की उचित आशंका" उत्पन्न होती है और सुनवाई से पूर्व इसका खुलासा औचित्य की मांग थी, क्योंकि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए। आगे का रास्ता स्रोत के अनुसार यही है कि न्यायालय क्यूरेटिव याचिका पर रूपा अशोक हुर्रा के दिशानिर्देशों के ढांचे में विचार करे और 2023 अधिनियम की वैधता का निर्णय उचित संख्या की संविधान पीठ द्वारा हो; इससे अधिक नीतिगत उपाय स्रोत में उल्लिखित नहीं हैं।
मुख्य शब्द
- क्यूरेटिव याचिका
- सुप्रीम कोर्ट में अंतिम उपाय, जो रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा के दिशानिर्देशों के तहत फैसले पर पुनर्विचार/वापसी के लिए दाखिल होती है।
- सीईसी एवं अन्य ईसी अधिनियम, 2023
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि तय करने वाला कानून, जिसकी वैधता चुनौती में है।
- स्टैंडिंग काउंसल
- किसी संस्था/पक्ष के लिए किसी अदालत में नियमित रूप से पैरवी करने हेतु पैनल में नियुक्त वकील; यहाँ एमपी हाईकोर्ट में ECI के लिए।
- रियल डेंजर टेस्ट
- पूर्वाग्रह की जाँच का मानक, जिसका हवाला याचिका में दिया गया है कि पीठ की संरचना से पक्षपात का वास्तविक खतरा था।
- अनुच्छेद 142
- सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय करने के लिए आदेश पारित करने की शक्ति; याचिका इसी के साथ अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल है।
- विभाजित फैसला
- जब पीठ के न्यायाधीश किसी मुद्दे पर सहमत न हों; यहाँ बड़ी पीठ को संदर्भित करने पर मतभेद रहा।
अभ्यास प्रश्न
- निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी 2023 अधिनियम से जुड़े विवाद के आलोक में चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता के प्रश्नों का परीक्षण कीजिए।
- क्यूरेटिव याचिका क्या है और सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक उपायों की श्रेणी में यह कहाँ स्थित है? रूपा अशोक हुर्रा मामले के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
- "न्याय केवल होना नहीं चाहिए, होते हुए दिखना भी चाहिए" — न्यायाधीशों द्वारा हितों के टकराव के खुलासे के संदर्भ में इस सिद्धांत की विवेचना कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
