पीड़ित पक्ष कोर्ट क्लिप हटाने की मांग कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही के वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर अपलोड होने पर पीड़ित व्यक्ति आईटी कानून के तहत अधिकारियों से टेकडाउन आदेश मांग सकता है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची व वी मोहना की बेंच ने एक अधिवक्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए धारा 69ए के तहत अधिकारियों के पास जाने या प्लेटफॉर्मों को कानूनी नोटिस भेजने की सलाह दी। सीजेआई ने कहा, क्लिप में टिप्पणी जोड़ना अवमानना हो सकती है।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- An aggrieved person can seek a takedown order under the IT Act for court proceeding clips uploaded on social media — Attributed to a Supreme Court bench of CJI Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana.
- The Supreme Court banned uploading and circulation of audiovisual excerpts of court hearings on July 24 — Date and order appear in the source, attributed to the Supreme Court.
- Adding narrative or selectively showing livestream clips may amount to contempt of court — Direct statement attributed to CJI Surya Kant with quoted remarks.
- The petitioner is an advocate whose July 1 arguments for his father, accused of jumping bail, went viral — Stated in source; petitioner unnamed, claim of rights violation attributed to his counsel.
- Remedy lies under Section 69A of the IT Act or a legal notice to platforms, with the SC as a later option — Attributed to the bench's advice as reported in the source.
विश्लेषकों की राय राय
ऊपर से यह एक प्रक्रियागत स्पष्टीकरण लगता है, लेकिन इसका राजनीतिक वजन कम नहीं है। जब अदालती सुनवाई के क्लिप आम तौर पर प्रचार सामग्री बन जाते हैं, तब सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच की यह चेतावनी — कि फुटेज में अपना नैरेटिव जोड़ना या चुनिंदा हिस्से दिखाना अवमानना हो सकती है — सीधे पार्टियों के आईटी सेल और बड़े राजनीतिक सोशल मीडिया खातों के लिए संकेत है। साथ ही, राहत के लिए आईटी कानून की धारा 69A का रास्ता सुझाने से कंटेंट हटाने की शक्ति कार्यपालिका के हाथ में जाने पर बहस भी खुलती है।
- लाइवस्ट्रीम हुई अदालती बहसों को राजनीतिक कहानियों में बदलने की प्रवृत्ति पर न्यायपालिका की असहजता अब खुलकर सामने है।
- 'नैरेटिव जोड़ा तो अवमानना' वाली चेतावनी पार्टियों की डिजिटल टीमों और राजनीतिक कंटेंट क्रिएटर्स के लिए नई लक्ष्मण रेखा खींचती है।
- धारा 69A का रास्ता सुझाने से टेकडाउन में कार्यपालिका की भूमिका बढ़ेगी, जिस पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल उठ सकते हैं।
- याचिकाकर्ता की यह शिकायत कि 24 जुलाई की रोक के बाद भी क्लिप उपलब्ध रहे, अदालती आदेश और प्लेटफॉर्म अनुपालन के बीच की खाई दिखाती है।
- एक तरफ व्यक्ति की गरिमा और निजता, दूसरी तरफ अदालती कार्यवाही की सार्वजनिक पारदर्शिता — यह संतुलन खुद राजनीतिक बहस का विषय बनेगा।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि प्लेटफॉर्म और आईटी अधिकारी ऐसे अनुरोधों पर कितनी तेजी से कार्रवाई करते हैं, और शिकायत अनसुनी रहने पर मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है या नहीं।
यह खबर यह स्थापित नहीं करती कि किसी प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई हुई है या किसी के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू हुई है; यह उपाय बताने वाला स्पष्टीकरण है, अंतिम फैसला नहीं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग से लिए गए वीडियो क्लिप, अक्सर पक्षपाती टिप्पणी के साथ, सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर फैलने लगे थे। इस पर 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अदालती सुनवाई के ऑडियो-वीडियो अंश सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड, साझा करने और प्रसारित करने पर प्रतिबंध लगाया था। एक अधिवक्ता, जिसकी 1 जुलाई की बहस का वीडियो वायरल हो गया, ने इस प्रतिबंध के बावजूद वीडियो हटाए न जाने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बुधवार को कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़ित व्यक्ति आईटी कानून के तहत टेकडाउन आदेश मांग सकता है।
मुख्य तथ्य
- सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही का फुटेज सोशल मीडिया पर अपलोड होने पर पीड़ित व्यक्ति सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत अधिकारियों से 'टेकडाउन' आदेश मांग सकता है।
- बेंच में सीजेआई सूर्य कांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल थे।
- याचिका उस अधिवक्ता ने दाखिल की थी जिसकी 1 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के समक्ष अपने पिता (जमानत शर्त तोड़ने के आरोपी) की ओर से की गई बहस सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
- सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई को अदालती सुनवाई के ऑडियो-विजुअल अंश सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड, शेयर व प्रसारित करने पर प्रतिबंध लगाया था।
- 24 जुलाई के आदेश के अनुसार ऐसे क्लिप ऑनलाइन डालने के लिए सुप्रीम कोर्ट या संबंधित हाईकोर्ट की अनिवार्य पूर्व अनुमति आवश्यक है।
- बेंच ने अधिवक्ता को आईटी कानून की धारा 69ए के तहत अधिकारियों के पास जाने या सीधे प्लेटफॉर्मों को कानूनी नोटिस भेजने की सलाह दी।
- सीजेआई ने कहा कि लाइवस्ट्रीमिंग के फुटेज में कोई नैरेटिव जोड़ना या क्लिप को चुनिंदा ढंग से दिखाकर अलग अर्थ देना अदालत की अवमानना हो सकती है।
- याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कार्यवाही का अनधिकृत प्रसार उनके जीवन, स्वतंत्रता, गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन है।
समयरेखा
- 1 जुलाईअधिवक्ता ने जमानत शर्त तोड़ने के आरोपी अपने पिता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच में बहस की; इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।
- 24 जुलाईसुप्रीम कोर्ट ने अदालती सुनवाई के ऑडियो-विजुअल अंशों के सोशल मीडिया पर अपलोड, शेयरिंग व प्रसार पर प्रतिबंध लगाया और पूर्व अनुमति अनिवार्य की।
- बुधवार (सुनवाई का दिन)सीजेआई सूर्य कांत की बेंच ने स्पष्ट किया कि पीड़ित व्यक्ति आईटी कानून की धारा 69ए के तहत टेकडाउन आदेश मांग सकता है।
किसका दाँव
- याचिकाकर्ता अधिवक्ता — उसकी अदालती बहस का वीडियो वायरल होने से जीवन, स्वतंत्रता, गरिमा और निजता के अधिकार के उल्लंघन का दावा; वीडियो हटवाना चाहता है।
- सुप्रीम कोर्ट / सीजेआई सूर्य कांत की बेंच — लाइवस्ट्रीमिंग की पारदर्शिता बनाए रखते हुए अदालती कार्यवाही के दुरुपयोग और अवमानना को रोकना।
- सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म (इंटरमीडियरी) — प्रतिबंधित क्लिप हटाने की जिम्मेदारी; न हटाने पर टेकडाउन आदेश व अवमानना कार्रवाई का जोखिम।
- आईटी कानून के तहत सक्षम अधिकारी — धारा 69ए के तहत सामग्री हटाने के अनुरोध पर निर्णय लेना।
- वादकारी और वकील समुदाय — अदालत में की गई दलीलों के चुनिंदा या संपादित प्रसार से प्रतिष्ठा और निजता पर असर।
क्यों अहम है
अदालती कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग न्यायिक पारदर्शिता का बड़ा कदम है, पर संपादित क्लिप और पक्षपाती टिप्पणी वादकारियों व वकीलों की गरिमा और निजता को नुकसान पहुंचा सकती है। कोर्ट ने बताया कि इसके लिए आईटी कानून की धारा 69ए में असरदार उपाय मौजूद है, और सामग्री को तोड़-मरोड़कर पेश करना अवमानना बन सकता है। इससे खुली अदालत के सिद्धांत और डिजिटल युग में व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन का सवाल केंद्र में आता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए — सरकार द्वारा ऑनलाइन सामग्री तक सार्वजनिक पहुंच अवरुद्ध (ब्लॉक) कराने का प्रावधान; इसी के तहत टेकडाउन की सलाह दी गई।
- 24 जुलाई: सुप्रीम कोर्ट ने अदालती सुनवाई के ऑडियो-विजुअल अंशों के सोशल मीडिया प्रसार पर प्रतिबंध लगाया।
- प्रतिबंध के बाद ऐसे क्लिप ऑनलाइन डालने के लिए सुप्रीम कोर्ट या संबंधित हाईकोर्ट की अनिवार्य पूर्व अनुमति जरूरी।
- बेंच: सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना।
- कोर्ट का कहना: लाइवस्ट्रीम फुटेज में नैरेटिव जोड़ना या चुनिंदा क्लिप दिखाना अदालत की अवमानना हो सकता है।
- उपाय का क्रम: अधिकारियों/प्लेटफॉर्म को कानूनी नोटिस → समाधान न होने पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका।
मेन्स दृष्टिकोण
अदालती कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग खुली अदालत और जवाबदेह न्याय के सिद्धांत को मजबूत करती है, लेकिन इस फुटेज के संपादित अंश, पक्षपाती कमेंट्री के साथ सोशल मीडिया पर वायरल होने से वादकारियों और वकीलों की गरिमा, निजता तथा निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होती है — इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई को ऐसे अंशों के प्रसार पर प्रतिबंध लगाकर पूर्व अनुमति अनिवार्य की। ताजा मामले में कोर्ट ने रेखांकित किया कि प्रतिबंध के बावजूद सामग्री उपलब्ध रहने पर सीधे रिट का रास्ता नहीं, बल्कि आईटी कानून की धारा 69ए के तहत अधिकारियों से टेकडाउन आदेश मांगना या इंटरमीडियरी को कानूनी नोटिस देना 'प्रभावी उपाय' है; समाधान न मिलने पर ही शीर्ष अदालत आई जा सकती है। साथ ही सीजेआई की चेतावनी कि फुटेज में कुछ जोड़ना या विवाद पैदा करने के लिए कार्यवाही को तोड़-मरोड़कर पेश करना अवमानना माना जाएगा, प्लेटफॉर्मों और कंटेंट निर्माताओं पर जिम्मेदारी डालती है। आगे का रास्ता संस्थागत स्पष्टता में है — लाइवस्ट्रीम अभिलेख के उपयोग के लिए स्पष्ट अनुमति प्रणाली, इंटरमीडियरी द्वारा शिकायतों पर तेज कार्रवाई, और अवमानना शक्ति का संयमित प्रयोग, ताकि पारदर्शिता और व्यक्तिगत अधिकारों में संतुलन बना रहे।
मुख्य शब्द
- टेकडाउन आदेश
- सक्षम अधिकारी या अदालत का वह निर्देश जिसके तहत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से आपत्तिजनक सामग्री हटाई/अवरुद्ध की जाती है।
- आईटी अधिनियम की धारा 69ए
- सूचना प्रौद्योगिकी कानून का प्रावधान जिसके तहत अधिकारियों से ऑनलाइन सामग्री तक पहुंच अवरुद्ध कराने की मांग की जा सकती है।
- अदालत की अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट)
- अदालत की गरिमा या कार्यवाही को क्षति पहुंचाने वाला आचरण; कोर्ट के अनुसार फुटेज में नैरेटिव जोड़ना इसमें आ सकता है।
- लाइवस्ट्रीमिंग ऑफ कोर्ट प्रोसीडिंग्स
- अदालती सुनवाई का सीधा ऑडियो-वीडियो प्रसारण, जिससे कार्यवाही सार्वजनिक रूप से देखी जा सकती है।
- इंटरमीडियरी
- सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म जो उपयोगकर्ताओं की सामग्री होस्ट करते हैं और जिन्हें हटाने का नोटिस दिया जा सकता है।
- प्रभावी उपाय (efficacious remedy)
- कानून में उपलब्ध वैकल्पिक कारगर रास्ता, जिसे अपनाए बिना सीधे शीर्ष अदालत जाने को उचित नहीं माना जाता।
अभ्यास प्रश्न
- अदालती कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग से जुड़ी पारदर्शिता और वादकारियों की निजता के बीच संतुलन कैसे साधा जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट के 24 जुलाई के प्रतिबंध के आलोक में चर्चा करें।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत टेकडाउन तंत्र कैसे काम करता है, और अदालती क्लिप के अनधिकृत प्रसार के मामलों में यह कितना प्रभावी है?
- संपादित अदालती क्लिप के साथ पक्षपाती टिप्पणी जोड़ना क्या अदालत की अवमानना है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक गरिमा के परिप्रेक्ष्य में परीक्षण करें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।