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कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की समीक्षा की मांग, कर्नाटक विधानसभा में प्रस्ताव

कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर पश्चिमी घाट के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की समीक्षा और आवश्यक संशोधन की मांग की। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देश पर जुलाई 2026 में जारी सातवीं मसौदा अधिसूचना में राज्य के 10 जिलों के 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने का प्रस्ताव है। मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने कहा कि विधायकों ने रिपोर्ट को उपग्रह आंकड़ों पर आधारित और अवैज्ञानिक बताया। राज्य भौतिक सर्वेक्षण के लिए एक वर्ष मांगेगा, जिसकी निगरानी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति करेगी।

स्रोत

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Karnataka Assembly unanimously adopted a resolution seeking review and modification of the Kasturirangan report. — Stated in source as a proceeding of the Assembly on Tuesday; no dissent reported.
  • The union environment ministry's seventh draft notification proposed designating 20,668 sq km in 10 Karnataka districts as ecologically sensitive areas. — Figure and district count appear in the source; attributed to the ministry notification.
  • The notification was issued in July 2026 following National Green Tribunal directions. — Date appears in source as written; a future-looking date an editor should confirm against the original notification.
  • Legislators called the report 'unscientific' as it was based merely on satellite data. — Attributed by CM Shivakumar to several legislators; paraphrased quote in source.
  • A retired Supreme Court judge will head a high-level committee, with gram panchayat-level committees also to be formed. — Attributed directly to Chief Minister D K Shivakumar; no name given.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

इस खबर का सबसे स्पष्ट राजनीतिक संकेत है सर्वसम्मत प्रस्ताव: पश्चिमी घाट के सवाल पर कर्नाटक के सभी दलों ने तय कर लिया है कि पहाड़ी जिलों के किसानों के विरुद्ध खड़े होने में कोई चुनावी लाभ नहीं है। उपग्रह आधारित मानचित्रण को "अवैज्ञानिक" बताकर और उसके बदले ग्राम पंचायत स्तर तक क्षेत्रीय सर्वे की मांग रखकर मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने बहस को पर्यावरण-बनाम-विकास से हटाकर एक अधिक बचाव-योग्य प्रक्रियात्मक मुद्दे पर ले आए हैं — और एक साल का समय भी मांग लिया। प्रधानमंत्री तथा पर्यावरण मंत्री से मिलने जा रहा सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल 'ना' कहने का भार केंद्र पर डाल देता है, जो केंद्रीय मंत्रालय की मसौदा अधिसूचना का सामना कर रही राज्य सरकार के लिए राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है।

  • दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर सर्वसम्मति यह दर्शाती है कि प्रभावित 10 जिलों के विधायक किसानों, आदिवासियों और पीढ़ियों से बसे परिवारों की भावना को स्थानीय राजनीति का निर्णायक कारक मान रहे हैं।
  • शिवकुमार का "हम पर्यावरण-विरोधी नहीं, प्रकृति प्रेमी हैं, लेकिन किसान प्रभावित न हों" वाला ढाँचा हरित और कृषक — दोनों वर्गों को साथ रखने की जानी-पहचानी कोशिश है।
  • एक साल के क्षेत्रीय सर्वे की मांग और सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति, आँकड़ों जितनी ही राजनीतिक मोहलत और कानूनी कवच हासिल करने की कोशिश है, क्योंकि अधिसूचना राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों से निकली है।
  • सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने से जिम्मेदारी केंद्र पर चली जाती है — अधिसूचना बनी रही तो राज्य कह सकेगा कि उसने प्रयास किया, और संशोधन हुआ तो श्रेय ले लेगा।
  • केरल से संकेत लेने की खुली स्वीकारोक्ति बताती है कि राज्य इस अधिसूचना के विरोध की एक साझा रणनीति पर आ रहे हैं, जिससे केंद्रीय मंत्रालय के लिए अड़े रहने की राजनीतिक कीमत बढ़ती है।

किस पर नज़र रखें — देखना यह है कि केंद्र अतिरिक्त एक साल और राज्य-नेतृत्व वाले क्षेत्रीय सर्वे को स्वीकारता है या नहीं, राष्ट्रीय हरित अधिकरण की समय-सीमाएँ इस देरी से कैसे टकराती हैं, और समिति की अध्यक्षता किसे मिलती है।

यह खबर न केंद्र की प्रतिक्रिया बताती है, न यह कि अधिकरण के निर्देशों के सामने सर्वे की मांग कानूनी रूप से टिकेगी, और न ही कोई स्वतंत्र आकलन कि रिपोर्ट का उपग्रह-आधारित मानचित्रण वाकई त्रुटिपूर्ण है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

पश्चिमी घाट के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) की पहचान के लिए इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले उच्चस्तरीय कार्यसमूह की रिपोर्ट को लागू करने के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सातवीं मसौदा अधिसूचना जारी की है। यह अधिसूचना राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों के बाद जुलाई 2026 में जारी की गई और इसमें कर्नाटक के 10 जिलों के 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ESA घोषित करने का प्रस्ताव है। कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करते हुए रिपोर्ट की समीक्षा और आवश्यक संशोधन की मांग की। विधायकों का कहना है कि अधिसूचना को उसके वर्तमान स्वरूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मुख्य तथ्य

  • कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की समीक्षा और आवश्यक संशोधन की मांग की।
  • केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की सातवीं मसौदा अधिसूचना जुलाई 2026 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के बाद जारी हुई।
  • अधिसूचना में कर्नाटक के 10 जिलों के 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव है।
  • कस्तूरीरंगन रिपोर्ट इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले उच्चस्तरीय कार्यसमूह ने तैयार की थी।
  • मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने कहा कि वनों की वास्तविक सीमा आंकने के लिए भौतिक सर्वेक्षण आवश्यक है; कई विधायकों ने रिपोर्ट को केवल उपग्रह आंकड़ों पर आधारित और 'अवैज्ञानिक' बताया।
  • कर्नाटक भौतिक सर्वेक्षण करने के लिए एक वर्ष का समय मांगेगा।
  • सर्वेक्षण की निगरानी के लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति बनेगी; ग्राम पंचायत स्तर पर भी समितियां बनेंगी।
  • राज्य से एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री और पर्यावरण मंत्री से मिलेगा।

समयरेखा

  1. जुलाई 2026राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के बाद केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सातवीं मसौदा अधिसूचना जारी की, जिसमें कर्नाटक के 20,668 वर्ग किमी को ESA प्रस्तावित किया गया।
  2. विधानमंडल के विशेष सत्र का पहला दिनरिपोर्ट और राज्य की सूखा स्थिति पर चर्चा के लिए बुलाए गए विशेष सत्र की शुरुआत।
  3. मंगलवार (विशेष सत्र का दूसरा दिन)विस्तृत चर्चा के बाद विधानसभा ने सर्वसम्मति से समीक्षा और संशोधन की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया।

किसका दाँव

  • कर्नाटक विधानसभा और सभी दलों के विधायक — दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर कहा कि अधिसूचना वर्तमान स्वरूप में स्वीकार्य नहीं; प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया।
  • मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार — भौतिक सर्वेक्षण के लिए एक वर्ष मांगने, उच्चस्तरीय समिति गठित करने और केंद्र से बात करने की पहल के नेतृत्वकर्ता।
  • केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय — सातवीं मसौदा अधिसूचना जारी करने वाला प्राधिकरण; राज्य की आपत्तियों और संशोधन मांगों पर निर्णय लेना है।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) — इसके निर्देशों के पालन में ही अधिसूचना जारी की गई।
  • किसान, आदिवासी और पीढ़ियों से क्षेत्र में रह रहे परिवार — मुख्यमंत्री के अनुसार इन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए; भूमि व आजीविका का प्रश्न।
  • ग्राम पंचायतें — सर्वेक्षण प्रक्रिया में पंचायत स्तर पर समितियां बनाई जाएंगी।

क्यों अहम है

पश्चिमी घाट के संरक्षण और वहां रह रहे किसानों, आदिवासियों व स्थानीय समुदायों की आजीविका के बीच संतुलन का प्रश्न फिर केंद्र में आ गया है। 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने का प्रस्ताव कर्नाटक के 10 जिलों में भूमि उपयोग और विकास गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है, इसलिए राज्य विधानसभा ने सर्वसम्मति से समीक्षा मांगी है। यह मामला केंद्र-राज्य संबंधों, उपग्रह आंकड़ों बनाम भौतिक सर्वेक्षण की वैज्ञानिक विश्वसनीयता और न्यायिक निर्देशों के अनुपालन के प्रश्न भी उठाता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • कस्तूरीरंगन रिपोर्ट: इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले उच्चस्तरीय कार्यसमूह ने पश्चिमी घाट के ESA पर तैयार की।
  • सातवीं मसौदा अधिसूचना जुलाई 2026 में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एनजीटी के निर्देश पर जारी की।
  • प्रस्तावित ESA क्षेत्र: कर्नाटक के 10 जिलों में 20,668 वर्ग किलोमीटर।
  • कर्नाटक विधानसभा ने विशेष सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया।
  • निगरानी समिति की अध्यक्षता सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश करेंगे; ग्राम पंचायत स्तर पर भी समितियां।
  • विशेष सत्र दो विषयों पर बुलाया गया था: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट और राज्य की सूखा स्थिति।

मेन्स दृष्टिकोण

पश्चिमी घाट जैसे जैव-विविधता संपन्न क्षेत्र में पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों का सीमांकन संरक्षण के लिए आवश्यक है, परंतु सीमांकन की पद्धति पर विवाद इसे राजनीतिक टकराव में बदल देता है। कर्नाटक विधानसभा का सर्वसम्मत प्रस्ताव तीन आधार प्रस्तुत करता है: रिपोर्ट मुख्यतः उपग्रह आंकड़ों पर आधारित होने से 'अवैज्ञानिक' है, वनों की वास्तविक सीमा के लिए भौतिक सर्वेक्षण जरूरी है, और किसानों, आदिवासियों तथा पीढ़ियों से बसे परिवारों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार के अनुसार राज्य सर्वेक्षण के लिए एक वर्ष मांगेगा, सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति और ग्राम पंचायत स्तर की समितियां गठित करेगा, तथा केरल के उदाहरण से संकेत लेते हुए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री एवं पर्यावरण मंत्री से मिलेगा। आगे का रास्ता इसमें निहित दिखता है कि वन, कृषि-बागवानी भूमि और आबादी वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक व जमीनी पहचान हो, स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो, और एनजीटी के निर्देशों के अनुपालन तथा राज्य की आपत्तियों के बीच केंद्र-राज्य संवाद से संतुलन बने — यह सब स्रोत में उल्लिखित कदमों तक सीमित है।

मुख्य शब्द

पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA)
पश्चिमी घाट में वे क्षेत्र जिन्हें कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर संवेदनशील घोषित करने का प्रस्ताव अधिसूचना में है।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट
इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाले उच्चस्तरीय कार्यसमूह द्वारा तैयार रिपोर्ट, जिसे लागू करने हेतु मसौदा अधिसूचना जारी हुई।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी)
अधिकरण जिसके निर्देशों के पालन में केंद्र ने जुलाई 2026 में सातवीं मसौदा अधिसूचना जारी की।
सातवीं मसौदा अधिसूचना
केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना, जिसमें कर्नाटक के 10 जिलों के 20,668 वर्ग किमी को ESA प्रस्तावित किया गया।
उच्चस्तरीय निगरानी समिति
सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली प्रस्तावित समिति, जो भौतिक सर्वेक्षण की निगरानी करेगी।
भौतिक सर्वेक्षण
उपग्रह आंकड़ों के बजाय जमीन पर जाकर वन, कृषि-बागवानी भूमि और आबादी वाले क्षेत्रों की पहचान करने की प्रक्रिया।

अभ्यास प्रश्न

  1. पश्चिमी घाट में पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के सीमांकन में उपग्रह आंकड़ों और भौतिक सर्वेक्षण के उपयोग से जुड़े मुद्दों की चर्चा कीजिए। कर्नाटक विधानसभा के प्रस्ताव के संदर्भ में उत्तर दीजिए।
  2. पर्यावरण संरक्षण संबंधी केंद्रीय अधिसूचनाओं के कार्यान्वयन में राज्यों की आपत्तियों का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर कर्नाटक के रुख के उदाहरण से समझाइए।
  3. क्या संरक्षण और स्थानीय समुदायों (किसान, आदिवासी, पीढ़ियों से बसे परिवार) की आजीविका के बीच संतुलन के लिए ग्राम पंचायत स्तर की समितियां प्रभावी तंत्र हो सकती हैं? समीक्षा कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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