अरावली खनन धूल: सिलिकोसिस से 50 से अधिक मौतों का दावा
राजस्थान के सीकर जिले के स्यालोदड़ा गांव के निवासियों का कहना है कि खनन और पत्थर तोड़ने से निकलने वाली सिलिका धूल से होने वाली सिलिकोसिस बीमारी ने वर्षों में 50 से अधिक लोगों की जान ली है। 2023 के एक अध्ययन के अनुसार राज्य पोर्टल पर 23,436 मामले और 6,876 मौतें प्रमाणित थीं। प्रमाणित मरीजों को मुफ्त दवाएं और हर माह ₹5,000 मिलते हैं। कार्यकर्ताओं के अनुसार सुप्रीम कोर्ट नियुक्त अरावली समिति ऐसे गांवों में नहीं पहुंची; अंतिम रिपोर्ट 30 नवंबर तक देनी है।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Silicosis has killed more than 50 people over the years in Syalodra village. — Attributed only to residents; no official data cited in source.
- 23,436 silicosis cases including 6,876 deaths were certified on Rajasthan's portal at the time of a 2023 study. — Figures appear in source, attributed to a study in the Journal of Occupational and Environmental Medicine.
- Certified silicosis patients get free medicines and ₹5,000 monthly; oxygen cylinders cost about ₹1,000 each. — Attributed to environmentalist Kailash Meena and Syalodra residents respectively.
- NGT last November ordered rehabilitation of Jodhpura-Mohanpura, banned blasts within 500 m and directed UltraTech Cement to pay ₹20,000. — Attributed to the NGT Central Zone Bench order, quoted in source; UltraTech and environment ministry responses awaited.
- The SC-appointed Aravalli panel skipped mining-affected villages and must submit its final report by November 30. — Panel skipping villages is claimed by activists and residents; the deadline is attributed to the Supreme Court.
विश्लेषकों की राय राय
यह कहानी नीति-निर्माण की एक जानी-पहचानी खामी उजागर करती है: राजस्थान के पास सिलिकोसिस पर देश के तुलनात्मक रूप से महत्वाकांक्षी ढांचों में से एक है — 2019 की न्यूमोकोनियोसिस नीति, ऑनलाइन पंजीकरण पोर्टल, मुफ्त दवाएं और ₹5,000 मासिक सहायता — लेकिन इन सबका प्रवेश-द्वार, यानी प्रमाणीकरण, ही वह जगह है जहां सबसे गरीब आवेदक छूट जाते हैं। जब राहत बार-बार अस्पताल के चक्कर और किसी अज्ञात, दूरस्थ डॉक्टर द्वारा एक्स-रे की जांच पर निर्भर हो, तो योजना व्यवहार में उन्हीं तक सीमित रह जाती है जो यात्रा और लगातार कोशिश का खर्च उठा सकें — जैसा तीन बार पंजीकरण रद्द होने वाली एक विधवा के विवरण से झलकता है। दूसरी विफलता स्थानिक शासन की है: सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त अरावली समिति का काम पारिस्थितिक सीमाएं तय करना है, पर निवासियों और कार्यकर्ताओं के अनुसार सबसे प्रभावित खनन गांव उसके दौरे की सूची में ही नहीं थे, जिससे रिपोर्ट नक्शों से भरपूर और लोगों के अनुभव से खाली रह जाने का जोखिम है।
- कागज़ पर 2023 की तुलना में 2019 की राजस्थान नीति प्रगतिशील है — पोर्टल आधारित पंजीकरण, प्रमाणीकरण, मुफ्त इलाज और नकद सहायता — पर कहानी बताती है कि अड़चन अब हक देने में नहीं, सत्यापन में है।
- प्रमाणीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता या अपील का कोई दिखता तंत्र नहीं है: स्रोत के अनुसार मरीजों को कभी पता नहीं चलता कि उनका एक्स-रे किस डॉक्टर ने देखा, जिससे बार-बार रद्द होने पर जवाबदेही कमजोर पड़ती है।
- 2023 के अध्ययन में उद्धृत पोर्टल के आंकड़े — 23,436 प्रमाणित मामले और 6,876 मौतें — प्रशासनिक गिनती हैं, यानी वही दर्ज हैं जिन्होंने प्रक्रिया पूरी की; एक पर्यावरणविद् का कहना है कि वास्तविक बोझ इससे अधिक है।
- ₹5,000 मासिक सहायता को स्थानीय खर्च की हकीकत के साथ पढ़ना होगा, जहां बताया गया है कि एक ऑक्सीजन सिलेंडर लगभग ₹1,000 का पड़ता है और एक मरीज दिन में कई सिलेंडर इस्तेमाल कर रहा था — यानी राशि गंभीर अवस्था के इलाज से नहीं जुड़ी।
- बार-बार दिखती कमजोरी नए आदेशों की नहीं, अमल की है: पिछले नवंबर के एनजीटी निर्देश — पुनर्वास समिति, गांव के 500 मीटर के दायरे में ब्लास्टिंग पर रोक और मुआवजा — निवासियों के अनुसार अब तक लागू नहीं हुए।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा छह महीने का विस्तार ठुकराने के बाद 30 नवंबर को आने वाली समिति की रिपोर्ट में सीमा-निर्धारण के साथ-साथ व्यावसायिक स्वास्थ्य और खनन-प्रभावित गांवों के पुनर्वास को जगह मिलती है या नहीं, और सिलिकोसिस प्रमाणीकरण की प्रक्रिया में कोई सुधार होता है या नहीं।
यह रिपोर्ट स्यालोद्रा में 50 से अधिक मौतों के निवासियों के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करती, जोधपुरा-मोहनपुरा की बीमारियों का किसी विशेष खनन गतिविधि से चिकित्सकीय संबंध स्थापित नहीं करती, और इसमें पर्यावरण मंत्रालय तथा नामित कंपनी का पक्ष अभी नहीं आया है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 8 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
राजस्थान के अरावली क्षेत्र में दशकों से चल रहे खनन, ड्रिलिंग, ब्लास्टिंग और पत्थर तोड़ने के कामों से निकलने वाली सिलिका धूल स्थानीय मजदूरों और निवासियों में सिलिकोसिस नामक असाध्य फेफड़ों की बीमारी फैला रही है। सीकर के स्यालोदड़ा गांव के निवासियों का कहना है कि इस बीमारी ने वर्षों में 50 से अधिक जानें ली हैं, जबकि कोटपुतली-बहरोड़ के जोधपुरा-मोहनपुरा जैसे गांवों में भी सांस, त्वचा और आंखों की बीमारियां व्यापक हैं। इसी बीच अरावली की परिभाषा और सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा कर रही सुप्रीम कोर्ट नियुक्त समिति को 30 नवंबर तक अंतिम रिपोर्ट देनी है, लेकिन कार्यकर्ताओं का आरोप है कि समिति सबसे प्रभावित गांवों में ही नहीं पहुंची।
मुख्य तथ्य
- स्यालोदड़ा (सीकर) के निवासियों के अनुसार सिलिकोसिस से वर्षों में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई है।
- 32 वर्षीय मंजीत, पत्थर तोड़ने वाली इकाई का मजदूर, तीन साल से अधिक समय तक सिलिकोसिस से पीड़ित रहा; मृत्यु से पहले के दिनों में वह रोज 12 ऑक्सीजन सिलेंडर इस्तेमाल करता था, प्रत्येक की कीमत लगभग ₹1,000।
- 2023 के अध्ययन 'Prevalence of Silicosis in Stone Carving and Sandstone Mining Industry in Rajasthan' के समय राज्य पोर्टल पर 23,436 सिलिकोसिस मामले और 6,876 मौतें प्रमाणित थीं।
- पोर्टल के 4,977 मामलों (741 मौतों) के विश्लेषण में पत्थर तराशी उद्योग वाले जिलों में अधिक पहचान मिली; सर्वाधिक प्रसार 36-40 वर्ष आयु वर्ग में।
- प्रमाणित मरीजों को मुफ्त दवाएं, हर माह ₹5,000 और अन्य सुविधाएं मिलती हैं (कार्यकर्ता कैलाश मीणा के अनुसार)।
- अप्रैल 2023 में NAPM और PUCL के सर्वे में जोधपुरा-मोहनपुरा के करीब 928 लोगों में से 478 ने त्वचा रोग, सांस की दिक्कत, टीबी और आंखों में खुजली जैसी कई समस्याएं बताईं।
- NGT की केंद्रीय क्षेत्र पीठ ने पिछले नवंबर में पूरे जोधपुरा-मोहनपुरा गांव के पुनर्वास हेतु समिति गठित करने, गांव के 500 मीटर के भीतर ब्लास्ट पर रोक और अल्ट्राटेक सीमेंट को स्वास्थ्य क्षति के लिए ₹20,000 भुगतान का आदेश दिया।
- 2025 की भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट ने गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के 63 जिलों को अरावली श्रेणी का हिस्सा बताया।
समयरेखा
- 2019राजस्थान न्यूमोकोनियोसिस (सिलिकोसिस सहित) पहचान, रोकथाम, नियंत्रण व पुनर्वास नीति के तहत पंजीकरण, प्रमाणन और राहत वितरण का ऑनलाइन पोर्टल शुरू।
- अप्रैल 2023NAPM और PUCL ने जोधपुरा-मोहनपुरा में स्वास्थ्य सर्वे किया; 928 में से 478 लोगों ने बीमारियां बताईं।
- 2023Journal of Occupational and Environmental Medicine में राजस्थान में सिलिकोसिस प्रसार पर अध्ययन प्रकाशित।
- नवंबर 2024 (पिछला नवंबर)NGT केंद्रीय क्षेत्र पीठ ने गांव के पुनर्वास, 500 मीटर के भीतर ब्लास्टिंग पर रोक और ₹20,000 मुआवजे का आदेश दिया; 298 लोगों के इलाज की सूची दाखिल।
- 6-11 अगस्त 2025सुप्रीम कोर्ट नियुक्त अरावली समिति ने दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के नौ जिलों में क्षेत्रीय दौरे किए; गुरुग्राम, अलवर, अजमेर और उदयपुर में जन सुनवाई।
- 8 अगस्तसमिति को जोधपुरा-मोहनपुरा आना था, लेकिन नहीं आई; निवासी पांच घंटे से अधिक इंतजार करते रहे।
- जुलाई (इस वर्ष)स्यालोदड़ा के संजय के भाई मनोज की सिलिकोसिस से मृत्यु; परिवार के छह सदस्य इस बीमारी से मारे गए।
- 31 अगस्तरिपोर्ट की मूल समय-सीमा; समिति ने अनुपालन रिपोर्ट में छह माह का अतिरिक्त समय मांगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराकर 30 नवंबर की समय-सीमा तय की।
किसका दाँव
- खनन व पत्थर तोड़ने वाली इकाइयों के मजदूर और परिवार — सिलिका धूल से असाध्य सिलिकोसिस, आय का नुकसान, इलाज पर बचत खर्च; प्रमाणन मिलने पर ही मुफ्त दवा व ₹5,000 मासिक सहायता।
- स्यालोदड़ा और जोधपुरा-मोहनपुरा के निवासी (बच्चे सहित) — दमा, त्वचा रोग, आंखों में जलन; पलायन के साधन नहीं; NGT आदेश के बाद भी पुनर्वास नहीं।
- सुप्रीम कोर्ट नियुक्त अरावली समिति — अरावली की परिभाषा व सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा; 30 नवंबर तक अंतिम रिपोर्ट और पारिस्थितिक सीमाएं तय करने का दायित्व।
- राजस्थान सरकार — 2019 नीति व पोर्टल के तहत पंजीकरण, प्रमाणन, राहत; NGT आदेशानुसार पुनर्वास समिति गठित करना।
- अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड — जोधपुरा-मोहनपुरा में खनन संचालन; NGT द्वारा ₹20,000 स्वास्थ्य क्षति भुगतान का निर्देश; आरोपों पर प्रतिक्रिया प्रतीक्षित।
- कार्यकर्ता व संगठन (NAPM, PUCL, जोधपुरा संघर्ष समिति, अरावली विरासत जन अभियान) — स्वास्थ्य सर्वे, कानूनी हस्तक्षेप और प्रभावित गांवों की आवाज समिति तक पहुंचाना।
- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय — अरावली की परिभाषा-सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट; आरोपों पर प्रतिक्रिया प्रतीक्षित।
क्यों अहम है
यह कहानी दिखाती है कि खनन से जुड़ी वायु प्रदूषण और व्यावसायिक बीमारी का बोझ आंकड़ों में दर्ज संख्या से कहीं अधिक हो सकता है — पोर्टल पर 23,436 मामले और 6,876 मौतें प्रमाणित होने के बावजूद कार्यकर्ता इसे वास्तविक बोझ से कम बताते हैं। प्रमाणन की जटिल प्रक्रिया राहत को सबसे कमजोर वर्ग—विधवाओं, अनुसूचित जाति परिवारों, बिस्तर पर पड़े मरीजों—तक पहुंचने से रोक देती है। साथ ही अरावली की पारिस्थितिक सीमा तय करने की न्यायिक प्रक्रिया में प्रभावित समुदायों की भागीदारी का सवाल खड़ा होता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- सिलिकोसिस: सिलिका धूल के कण सांस के जरिये फेफड़ों में जाने से होने वाला असाध्य न्यूमोकोनियोसिस; ड्रिलिंग, ब्लास्टिंग, पत्थर तोड़ने से जुड़ा।
- राजस्थान न्यूमोकोनियोसिस (सिलिकोसिस सहित) नीति, 2019 के तहत पंजीकरण-प्रमाणन-राहत का ऑनलाइन पोर्टल; प्रमाणित मरीज को मुफ्त दवा व ₹5,000 मासिक।
- प्रमाणन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल द्वारा चिकित्सकीय परीक्षण और छाती के एक्स-रे के आधार पर।
- 2023 अध्ययन: पोर्टल पर 23,436 मामले, 6,876 मौतें; सर्वाधिक प्रसार 36-40 वर्ष आयु वर्ग में।
- 2025 भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट: गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के 63 जिले अरावली श्रेणी में।
- सुप्रीम कोर्ट नियुक्त अरावली समिति की अंतिम रिपोर्ट की समय-सीमा 30 नवंबर; CJI सूर्य कांत ने छह माह का विस्तार देने से इनकार किया।
मेन्स दृष्टिकोण
अरावली में दशकों के खनन ने वायु प्रदूषण को बढ़ाकर एक व्यावसायिक-सह-सामुदायिक स्वास्थ्य संकट पैदा किया है: सिलिका धूल से होने वाला सिलिकोसिस असाध्य है, और स्यालोदड़ा जैसे गांव में निवासी 50 से अधिक मौतों का दावा करते हैं, जबकि एक ही परिवार के छह सदस्य मारे गए। राजस्थान ने 2019 की न्यूमोकोनियोसिस नीति और ऑनलाइन पोर्टल के जरिये मुफ्त दवा व ₹5,000 मासिक सहायता की व्यवस्था बनाई, फिर भी पोर्टल पर दर्ज 23,436 मामले और 6,876 मौतें वास्तविक बोझ को नहीं दर्शाते, क्योंकि प्रमाणन के लिए बार-बार अस्पताल के चक्कर, एक्स-रे की अपारदर्शी जांच प्रक्रिया और बार-बार पंजीकरण रद्द होना गरीब, बिस्तरग्रस्त मरीजों को बाहर कर देता है। दूसरी ओर, जोधपुरा-मोहनपुरा में NGT के पुनर्वास, 500 मीटर के भीतर ब्लास्टिंग पर रोक और मुआवजे के आदेश के बावजूद अमल नहीं हुआ, और अरावली समिति प्रभावित गांवों तक नहीं पहुंची—यह नियामक क्रियान्वयन और भागीदारीपूर्ण सुनवाई की कमी दर्शाता है। आगे का रास्ता स्रोत के अनुसार यही संकेत करता है: प्रमाणन प्रक्रिया की पहुंच आसान बनाना, NGT आदेशों का पालन, और अंतिम रिपोर्ट में पारिस्थितिक सीमाएं तय करते समय प्रभावित लोगों की गवाही शामिल करना।
मुख्य शब्द
- सिलिकोसिस
- सिलिका धूल के सूक्ष्म कण सांस के जरिये लेने से होने वाली गंभीर, असाध्य फेफड़ों की बीमारी, जिसमें अक्सर ऑक्सीजन सहारे की जरूरत पड़ती है।
- राजस्थान न्यूमोकोनियोसिस नीति, 2019
- सिलिकोसिस सहित न्यूमोकोनियोसिस की पहचान, रोकथाम, नियंत्रण व पुनर्वास की राज्य नीति, जिसके तहत ऑनलाइन पंजीकरण-राहत पोर्टल शुरू हुआ।
- सुप्रीम कोर्ट नियुक्त अरावली समिति
- अरावली की परिभाषा व सीमांकन पर केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा करने वाली समिति; अंतिम रिपोर्ट 30 नवंबर तक।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), केंद्रीय क्षेत्र पीठ
- पर्यावरणीय मामलों का अधिकरण, जिसने जोधपुरा-मोहनपुरा के पुनर्वास और ब्लास्टिंग पर रोक के आदेश दिए।
- NAPM व PUCL
- नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट और पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़, जिन्होंने अप्रैल 2023 में गांव का स्वास्थ्य सर्वे किया।
- अरावली विरासत जन अभियान
- पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि का समूह, जिसने समिति के 6-11 अगस्त के दौरों का ब्यौरा दिया।
अभ्यास प्रश्न
- अरावली में खनन-जनित सिलिका धूल से होने वाले स्वास्थ्य संकट के कारणों और परिणामों की चर्चा करें। सिलिकोसिस के प्रमाणन में आने वाली बाधाएं राहत तंत्र को कैसे कमजोर करती हैं?
- पर्यावरणीय न्यायनिर्णयन (NGT व सुप्रीम कोर्ट नियुक्त समितियों) की सीमाओं पर विचार कीजिए—आदेशों के अनुपालन और प्रभावित समुदायों की भागीदारी के संदर्भ में।
- सिलिकोसिस जैसी व्यावसायिक बीमारियों के आंकड़ों में कम गिनती (undercounting) के कारण क्या हैं, और इसे दूर करने के लिए कौन-से प्रशासनिक सुधार आवश्यक हैं?
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
