पेश होने वाले सत्र में ही पारित हो रहे अधिक विधेयक: पीआरएस

18वीं लोकसभा में अब तक पेश 64 विधेयकों में से 34 यानी 53 प्रतिशत उसी सत्र में दोनों सदनों से पारित हो गए, जिसमें वे पेश किए गए थे। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार यह अनुपात 16वीं लोकसभा में 33 प्रतिशत और 17वीं लोकसभा में करीब 62 प्रतिशत था। 13 अगस्त को समाप्त मानसून सत्र में पेश 12 विधेयकों में से 11 पारित हुए। पीआरएस के मुताबिक नौ विधेयकों पर संबंधित मंत्री के अलावा किसी सांसद ने नहीं बोला और 11 में सात पांच मिनट या उससे कम समय में पारित हुए।

स्रोत

PRS Legislative Research · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • 34 of 64 bills (53%) introduced in the 18th Lok Sabha were passed by both Houses in their session of introduction. — Attributed to an analysis of PRS Legislative Research session-wise data; figures consistent within source.
  • The proportion was 33% in the 16th Lok Sabha (63 of 189) and about 62% in the 17th (117 of 190). — Attributed to PRS data analysis; arithmetic consistent with stated totals.
  • In the Monsoon Session ending August 13, 11 of 12 bills introduced were passed; only the Indian Statistical Institute Bill, 2026 remained pending. — Figure appears in source, attributed to PRS records.
  • Nine bills were cleared without any MP other than the piloting minister speaking; seven of 11 passed in five minutes or less. — Attributed to PRS; no independent verification possible.
  • Lok Sabha functioned for 15% of scheduled time and Rajya Sabha 33%, with Question Hour at 1% and 12% respectively. — Attributed to PRS; source lists causes of disruption but gives no further sourcing.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह केवल विधायी रफ़्तार का आँकड़ा नहीं है — यह संकेत है कि संसद के भीतर प्रभाव का संतुलन किस दिशा में खिसक रहा है। 18वीं लोकसभा में शुरुआत धीमी रही, लेकिन 2025 से रफ़्तार बढ़ी और मानसून सत्र में 12 में से 11 विधेयक पारित हो गए — जबकि लोकसभा अपने निर्धारित समय के मात्र 15 प्रतिशत ही चली। यानी सदन ठप होने पर सबसे बड़ा नुकसान सरकार के विधायी एजेंडे का नहीं, बल्कि विपक्ष के बहस के अवसर का होता है — और यही अब मुख्य राजनीतिक बहस है।

  • सदन के केवल 15 प्रतिशत समय चलने के बावजूद 11 विधेयक पारित होना बताता है कि व्यवधान की रणनीति विपक्ष को राजनीतिक संदेश देती है, पर विधायी नतीजा नहीं रोक पाती।
  • पीआरएस का यह आँकड़ा कि नौ विधेयकों पर संबंधित मंत्री के अलावा कोई सांसद नहीं बोला और 11 में से सात पाँच मिनट या उससे कम में पारित हुए — विपक्ष को "बहस रहित विधायिका" का मज़बूत आरोप देता है।
  • पारित 11 विधेयकों में छह सरकार के मूल एजेंडे में नहीं थे, जबकि एजेंडे में सूचीबद्ध दो लंबित विधेयक पारित नहीं हुए — यह सत्र के बीच प्राथमिकताएँ बदलने की सत्ता पक्ष की सहूलियत दिखाता है।
  • सरकार के पक्ष में भी तर्क है: एफसीआरए संशोधन विधेयक संयुक्त समिति को भेजा गया और पिछले सत्रों में कई विधेयक संसदीय समितियों को गए, यानी परीक्षण के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हैं।
  • 17वीं लोकसभा में यह अनुपात 62 प्रतिशत और 16वीं में 33 प्रतिशत रहा — इससे लगता है कि यह किसी एक सरकार का तात्कालिक फ़ैसला नहीं, बल्कि एक दशक में जमी संसदीय कार्यशैली है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि विपक्ष व्यवधान को ही मुख्य हथियार बनाए रखता है या समिति को भेजने और बहस का समय सुनिश्चित कराने की माँग पर आता है, और वीबीएसए तथा एफसीआरए विधेयकों की समिति प्रक्रिया कहाँ पहुँचती है।

यह ख़बर केवल आँकड़ों की प्रवृत्ति बताती है; इससे यह सिद्ध नहीं होता कि क़ानूनों की गुणवत्ता प्रभावित हुई, न ही इसमें किसी दल की रणनीति या सरकार-विपक्ष नेताओं की प्रतिक्रिया दर्ज है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 9 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के सत्र-वार आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 18वीं लोकसभा में पेश किए गए आधे से अधिक विधेयक उसी सत्र में दोनों सदनों से पारित हो गए, और यह प्रवृत्ति पिछले एक वर्ष में तेजी से बढ़ी है। पीआरएस एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी संस्था है जो संसद तथा राज्य विधानसभाओं के कामकाज पर शोध और निगरानी करती है। पीआरएस पहले भी कह चुका है कि पेश होने और पारित होने के बीच कम अंतराल सांसदों को विधेयक की जांच के लिए कम समय देता है और हितधारकों से परामर्श के अवसर सीमित करता है। इस वर्ष का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला, जिसमें बार-बार व्यवधान के बीच लोकसभा अपने निर्धारित समय के केवल 15 प्रतिशत ही चल सकी।

मुख्य तथ्य

  • 18वीं लोकसभा के गठन के बाद पेश 64 विधेयकों में से 34 यानी 53 प्रतिशत उसी सत्र में दोनों सदनों से पारित हुए।
  • 16वीं लोकसभा में पेश 189 विधेयकों में से 63 (33 प्रतिशत) उसी सत्र में पारित हुए; 17वीं लोकसभा में 190 में से 117 (लगभग 62 प्रतिशत)।
  • 13 अगस्त को समाप्त मानसून सत्र में पेश 12 विधेयकों में से 11 सत्र समाप्त होने से पहले पारित हो गए; केवल भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026 लंबित रहा।
  • पीआरएस के अनुसार नौ विधेयक बिना किसी सांसद के बोलने पर पारित हुए, सिर्फ संबंधित मंत्री ने बात रखी; 11 में से सात विधेयक पांच मिनट या कम समय में पारित हुए।
  • सरकार के मूल विधायी एजेंडे में पांच नए विधेयक पेश व पारित करने और दो लंबित विधेयकों पर विचार के लिए सूचीबद्ध थे, लेकिन पारित 11 में से छह मूल एजेंडे में पेश करने के लिए सूचीबद्ध नहीं थे।
  • विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (वीबीएसए) विधेयक, 2025 और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन (एफसीआरए) विधेयक, 2026 दोनों पारित नहीं हुए; एफसीआरए संशोधन विधेयक संयुक्त समिति को भेजा गया।
  • मानसून सत्र (20 जुलाई-13 अगस्त) में 19 बैठकें हुईं; लोकसभा निर्धारित समय के 15 प्रतिशत और राज्यसभा 33 प्रतिशत चली।
  • प्रश्नकाल लोकसभा में निर्धारित समय के केवल एक प्रतिशत और राज्यसभा में 12 प्रतिशत चला; लोकसभा में पूरे सत्र में प्रश्नकाल मात्र नौ मिनट चला और 380 सूचीबद्ध प्रश्नों में से दो के मौखिक उत्तर मिले।

समयरेखा

  1. 16वीं लोकसभापेश 189 विधेयकों में से 63 (33 प्रतिशत) पेश किए जाने वाले सत्र में ही पारित हुए।
  2. 17वीं लोकसभापेश 190 विधेयकों में से 117 (लगभग 62 प्रतिशत) उसी सत्र में पारित हुए।
  3. बजट सत्र 2024पेश 11 विधेयकों में से कोई भी उसी सत्र में दोनों सदनों से पारित नहीं हुआ।
  4. शीतकालीन सत्र 2024पेश चार विधेयक सत्र के अंत तक लंबित रहे; केवल भारतीय वायुयान विधेयक, 2024 (पिछले बजट सत्र में पेश) पारित हुआ।
  5. बजट सत्र 2025पेश पांच विधेयकों में से तीन उसी सत्र में पारित।
  6. मानसून सत्र 2025पेश 13 विधेयकों में से आठ उसी सत्र में पारित; पांच संसदीय समितियों को भेजे गए।
  7. शीतकालीन सत्र 2025पेश नौ विधेयकों में से सात उसी सत्र में पारित; दो समितियों को भेजे गए।
  8. बजट सत्र 2026पेश 10 विधेयकों में से पांच ने उसी सत्र में दोनों सदनों से पारित होने की प्रक्रिया पूरी की।
  9. 20 जुलाई से 13 अगस्त (मानसून सत्र)19 बैठकें; पेश 12 विधेयकों में से 11 पारित; लोकसभा 15 प्रतिशत, राज्यसभा 33 प्रतिशत समय चली।

किसका दाँव

  • संसद (लोकसभा व राज्यसभा) — विधायी जांच-परख की गुणवत्ता; व्यवधानों के कारण कामकाज का समय और प्रश्नकाल बुरी तरह प्रभावित।
  • सांसद — पेश होने और पारित होने के बीच कम अंतराल से विधेयकों की जांच का समय घटता है; नौ विधेयकों पर मंत्री के अलावा कोई नहीं बोला।
  • सरकार/संबंधित मंत्री — विधायी एजेंडा पूरा करना; पारित 11 में से छह विधेयक मूल एजेंडे में सूचीबद्ध नहीं थे।
  • विपक्ष — एफसीआरए संशोधन विधेयक वापस लेने की मांग; नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर पर छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और अयोध्या राम मंदिर चंदा चोरी के आरोप पर व्यवधान।
  • संसदीय समितियां/संयुक्त समिति — वीबीएसए विधेयक की जांच कर रही समिति ने रिपोर्ट नहीं दी; एफसीआरए संशोधन विधेयक संयुक्त समिति के पास।
  • पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च — स्वतंत्र, गैर-लाभकारी संस्था जो संसद व राज्य विधानसभाओं के कामकाज पर आंकड़े जुटाती और चिंता जताती है।
  • हितधारक/नागरिक — जल्दबाजी में पारित कानूनों पर परामर्श के अवसर सीमित हो जाते हैं।

क्यों अहम है

विधेयकों का उसी सत्र में जल्दी पारित होना यह दिखाता है कि कानून बनाने से पहले सांसदों को जांच और हितधारकों से परामर्श का समय कम मिल रहा है, जो विधायी गुणवत्ता पर सीधा असर डालता है। साथ ही मानसून सत्र में लोकसभा का केवल 15 प्रतिशत समय चलना और प्रश्नकाल मात्र नौ मिनट होना कार्यपालिका की जवाबदेही के मुख्य औजार के कमजोर पड़ने का संकेत है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • 18वीं लोकसभा: पेश 64 विधेयकों में 34 (53%) उसी सत्र में पारित; 16वीं लोकसभा 33%, 17वीं लोकसभा ~62%।
  • पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च — स्वतंत्र, गैर-लाभकारी संस्था; संसद व राज्य विधानसभाओं के कामकाज पर शोध।
  • मानसून सत्र: 20 जुलाई से 13 अगस्त, 19 बैठकें; लोकसभा 15% व राज्यसभा 33% निर्धारित समय चली।
  • प्रश्नकाल: लोकसभा में केवल 1% समय (कुल नौ मिनट), 380 सूचीबद्ध प्रश्नों में से दो के मौखिक उत्तर; राज्यसभा में 12%।
  • एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 संसद की संयुक्त समिति को भेजा गया; वीबीएसए विधेयक, 2025 पर समिति की रिपोर्ट लंबित।
  • भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026 मानसून सत्र के अंत में लंबित रहा; भारतीय वायुयान विधेयक, 2024 शीतकालीन सत्र 2024 में पारित।

मेन्स दृष्टिकोण

पीआरएस के आंकड़े भारत में विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता पर दो साथ चलती प्रवृत्तियों को उजागर करते हैं — विधेयकों के पेश होने और पारित होने के बीच घटता अंतराल, और सदनों के कामकाजी समय में गिरावट। 18वीं लोकसभा में पेश 64 विधेयकों में से 53 प्रतिशत उसी सत्र में पारित हुए; बजट सत्र 2024 में यह शून्य था, लेकिन 2025 से रफ्तार बढ़ी और इस मानसून सत्र में 12 में से 11 विधेयक पारित हो गए, जिनमें सात पांच मिनट या कम समय में और नौ पर संबंधित मंत्री के अलावा किसी सांसद ने चर्चा नहीं की। कारणों में बार-बार व्यवधान (नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई, अयोध्या राम मंदिर चंदा चोरी के आरोप), और मूल एजेंडे से बाहर के विधेयकों को शामिल करना दिखता है — पारित 11 में से छह मूल सूची में नहीं थे। इसका निहितार्थ है कि विधायिका की जांच-परख भूमिका और हितधारक परामर्श सिमट रहे हैं, जबकि प्रश्नकाल जैसे जवाबदेही औजार लगभग निष्क्रिय हो गए (लोकसभा में नौ मिनट, 380 में से दो प्रश्नों के मौखिक उत्तर)। आगे का रास्ता स्रोत के अनुसार वही संकेत देता है जो संस्थागत व्यवहार में दिखता है — विधेयकों को संसदीय/संयुक्त समितियों को भेजना, जैसा एफसीआरए संशोधन विधेयक और 2025 के सत्रों के कई विधेयकों के साथ हुआ, तथा व्यवधानों को घटाकर चर्चा का समय बहाल करना।

मुख्य शब्द

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च
स्वतंत्र, गैर-लाभकारी संस्था जो संसद और राज्य विधानसभाओं के कामकाज पर शोध व निगरानी करती है।
प्रश्नकाल
सदन की बैठक का वह समय जिसमें सांसद मंत्रियों से प्रश्न पूछते हैं; इस मानसून सत्र में लोकसभा में यह केवल नौ मिनट चला।
संयुक्त समिति
दोनों सदनों के सदस्यों वाली समिति; एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 इसे भेजा गया।
एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक; विपक्ष ने वापसी की मांग की, विधेयक पारित नहीं हुआ।
वीबीएसए विधेयक, 2025
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक; इसकी जांच करने वाली संसदीय समिति ने अभी रिपोर्ट पेश नहीं की।
विधायी एजेंडा
सरकार द्वारा सत्र के लिए सूचीबद्ध विधेयकों की सूची; इस बार पारित 11 में से छह विधेयक मूल एजेंडे में नहीं थे।

अभ्यास प्रश्न

  1. 18वीं लोकसभा में विधेयकों के उसी सत्र में पारित होने की बढ़ती प्रवृत्ति भारत में विधायी जांच-परख की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करती है? पीआरएस के आंकड़ों के आधार पर परीक्षण करें।
  2. संसदीय समितियों और संयुक्त समितियों को विधेयक भेजने की व्यवस्था किस प्रकार जल्दबाजी में कानून बनाने की समस्या का उत्तर हो सकती है? हाल के उदाहरणों से समझाएं।
  3. बार-बार व्यवधान के कारण प्रश्नकाल का लगभग निष्क्रिय हो जाना कार्यपालिका की जवाबदेही के लिए क्या अर्थ रखता है? चर्चा करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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