नेट्टेंपाडु लिफ्ट योजना अधूरी, 58 हजार एकड़ को सिंचाई जल नहीं

जोगुलांबा गडवाल जिले के गडवाल और अलमपुर निर्वाचन क्षेत्रों में दो लाख एकड़ को सिंचाई जल देने के लिए बनी जवाहर नेट्टेंपाडु लिफ्ट सिंचाई योजना अब भी अधूरी है। 2005 में 1,428 करोड़ रुपये के अनुमान से शुरू परियोजना की लागत 2019 में 2,548 करोड़ और 2022 में 2,700 करोड़ रुपये कर दी गई, अब तक 2,368 करोड़ रुपये खर्च हुए। कोंडापल्ली एक्वाडक्ट अधूरा होने से दाहिनी नहर के 58 हजार एकड़ को पानी नहीं मिल रहा। ईई रहीमुद्दीन ने कहा कि 562 एकड़ भूमि अधिग्रहण लंबित है।

स्रोत

Jogulamba Gadwal — నీరు · సాగునీరు · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Jawahar Nettempadu lift irrigation scheme was launched in 2005 at an estimated Rs 1,428 crore, revised to Rs 2,548 crore in 2019 and proposed at Rs 2,700 crore in 2022, with Rs 2,368 crore spent so far. — Figures appear in source; no document or department cited for the cost revisions.
  • The scheme is meant to irrigate 2 lakh acres in Alampur and Gadwal constituencies, but 58,000 acres under the right canal still get no water. — Figure appears in source; attributed to the report, not to a named record.
  • An incomplete one-kilometre aqueduct at Kondapalli is the main reason water is not reaching the right canal ayacut. — Stated in source and broadly consistent with the official's account of pending packages.
  • Land acquisition of 562 acres is pending and work may resume only by March, says EE Rahimuddin of Jogulamba Gadwal. — Directly attributed to a named irrigation department engineer.
  • 1,176 families in Chinnonipalli and Aluru are yet to be shifted to rehabilitation centres. — Figure appears in source with no source given.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

यह पूंजी लगाने के बाद प्रतिफल का स्विच ऑन न होने का उदाहरण है: संशोधित 2,700 करोड़ रुपये की लागत में से लगभग 2,368 करोड़ रुपये पहले ही खर्च हो चुके हैं, फिर भी दाहिनी नहर के 58,000 एकड़ तक पानी नहीं पहुंच रहा, क्योंकि एक एक्वाडक्ट और कुछ पैकेज अधूरे हैं। आर्थिक दृष्टि से काम पूरा करने की सीमांत लागत पहले से लगी राशि के मुकाबले छोटी है, जिससे यह देरी अवसर-लागत के लिहाज से असामान्य रूप से महंगी हो जाती है। इसका बोझ खजाने पर नहीं, बल्कि उन किसानों पर है जो बारिश और बोरवेल पर निर्भर हैं या खेत परती छोड़ रहे हैं — यह कृषि आय, स्थानीय मांग और पलायन पर सीधी चोट है।

  • 2005 में 1,428 करोड़ रुपये से 2019 में 2,548 करोड़ और 2022 में 2,700 करोड़ रुपये तक लागत बढ़ना बुनियादी ढांचे में 'समय की कीमत' का क्लासिक उदाहरण है, जहां देरी खुद एक खर्च बन जाती है।
  • लगभग 2,368 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद बाईं नहर से केवल 6,000 एकड़ को पानी मिल रहा है, यानी शेष काम पूरा होने तक प्रति रुपये प्रतिफल डिजाइन लक्ष्य से बहुत कम है।
  • अड़चनें वित्तीय नहीं बल्कि भूमि और लॉजिस्टिक्स की बताई गई हैं — 562 एकड़ भूमि अधिग्रहण लंबित, 1,176 परिवारों का पुनर्वास शेष, बिजली लाइन हटाना और वागु में पानी के कारण सीमित निर्माण अवधि।
  • भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के लंबित बिल स्वयं एक आर्थिक बाधा हैं, क्योंकि बकाया भुगतान ठेकेदारों और भूमि मालिकों के सहयोग को धीमा करता है, और वही काम परिसंपत्ति को उपयोगी बनाते हैं।
  • आयकट के किसानों के लिए निश्चित सिंचाई का अभाव यानी ऊंचा इनपुट जोखिम, कम फसल तीव्रता और जमीन की कमजोर गिरवी-कीमत — ये लागतें किसी परियोजना बजट में दर्ज नहीं होतीं।

किस पर नज़र रखें — देखना यह है कि विभाग द्वारा बताए गए मार्च–अप्रैल के समय में कोंडापल्लि एक्वाडक्ट की शेष चार स्लैब वास्तव में डाली जाती हैं या नहीं, और उससे पहले 562 एकड़ तथा लंबित बिल निपटते हैं या नहीं — यही तय करेगा कि खर्च की गई पूंजी कब उत्पादन देने लगती है।

यह खबर यह नहीं बताती कि काम पूरा करने के लिए कितनी अतिरिक्त राशि चाहिए, लागत वृद्धि की जवाबदेही किसकी है, या 58,000 एकड़ में छूटी फसल उत्पादन की कुल आर्थिक कीमत कितनी रही है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

जवाहर नेट्टेंपाडु एत्तिपोतल (लिफ्ट सिंचाई) योजना तेलंगाना के जोगुलांबा गडवाल जिले के गडवाल और अलमपुर निर्वाचन क्षेत्रों में दो लाख एकड़ को सिंचाई जल देने के लिए बनाई गई थी। कृष्णा नदी में बाढ़ के समय 20 टीएमसी पानी उठाकर इन खेतों तक पहुँचाना इसका लक्ष्य है। 2005 में शुरू हुई परियोजना भूमि अधिग्रहण, निधियों और तकनीकी कारणों से आज भी अधूरी है और अंतिम आयकट तक पानी नहीं पहुँच रहा। ईटीवी भारत की यह रिपोर्ट 14 अक्टूबर 2023 को प्रकाशित हुई।

मुख्य तथ्य

  • परियोजना का लक्ष्य गडवाल और अलमपुर निर्वाचन क्षेत्रों की 2 लाख एकड़ भूमि को सिंचाई जल देना है, पर 58 हजार एकड़ को अब भी पानी नहीं मिल रहा।
  • 2005 में 1,428 करोड़ रुपये के अनुमानित व्यय से काम शुरू हुआ; 2019 में अनुमान 2,548 करोड़ रुपये किया गया।
  • 2022 में लागत 2,700 करोड़ रुपये करने के प्रस्ताव सरकार को भेजे गए; अब तक 2,368 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
  • कृष्णा नदी में बाढ़ के समय 20 टीएमसी पानी लिफ्ट करके 2 लाख एकड़ सींचने की योजना है।
  • पहले चरण में गुडेंदोड्डी और दूसरे चरण में र्यालंपाडु बैलेंसिंग जलाशय तथा र्यालंपाडु के नीचे 5 ऑफलाइन जलाशय बनाए गए।
  • गुडेंदोड्डी जलाशय से बाईं नहर द्वारा केवल 6,000 एकड़ को पानी मिल रहा है; दाहिनी नहर के 58,000 एकड़ वंचित हैं।
  • कोंडापल्ली में नाले पर एक किलोमीटर लंबा एक्वाडक्ट अधूरा; 30 किलोमीटर नहरें और उन पर 296 से अधिक संरचनाएँ बाकी हैं।
  • ईई रहीमुद्दीन के अनुसार 562 एकड़ भूमि अधिग्रहण लंबित; चिन्नोनिपल्ली और अलूरु में 1,176 परिवारों का पुनर्वास केंद्रों में स्थानांतरण शेष।

समयरेखा

  1. 2005जवाहर नेट्टेंपाडु लिफ्ट सिंचाई योजना 1,428 करोड़ रुपये के अनुमानित व्यय से शुरू।
  2. 2019 (राज्य गठन के बाद)परियोजना का अनुमानित व्यय 2,548 करोड़ रुपये में संशोधित।
  3. 2022लागत 2,700 करोड़ रुपये करने के प्रस्ताव सरकार को भेजे गए।
  4. 14 अक्टूबर 2023ईटीवी भारत की रिपोर्ट: अब तक 2,368 करोड़ खर्च, 58 हजार एकड़ को पानी नहीं।
  5. आगामी मार्च–अप्रैल (ईई के अनुसार)नाले का प्रवाह घटने पर चार स्लैब डालकर मुख्य नहर का काम पूरा करने की योजना।

किसका दाँव

  • गडवाल व अलमपुर के किसान — 58 हजार एकड़ के किसान सिंचाई जल से वंचित; कई खेत परती छोड़ रहे हैं या वर्षाधारित खेती और बोरवेल पर निर्भर हैं।
  • जल संसाधन (नीटि पारुदल) विभाग, जोगुलांबा गडवाल — भूमि अधिग्रहण, बिजली लाइन हटाने और नाले पर काम जैसी तकनीकी अड़चनें सुलझाकर पैकेज पूरे करने की जिम्मेदारी।
  • ईई रहीमुद्दीन — 99-ए और सी पूरे होने, 99-बी, डी व 100 पैकेज अधूरे रहने तथा 562 एकड़ अधिग्रहण लंबित होने की जानकारी देने वाले अधिकारी।
  • चिन्नोनिपल्ली व अलूरु के 1,176 विस्थापित परिवार — पुनर्वास केंद्रों में स्थानांतरण और मुआवजा/बिल भुगतान लंबित।
  • सरकार व जनप्रतिनिधि — चुनावों में पूरे आयकट को पानी देने के वादे; निधि आवंटन और परियोजना पूर्ति पर जवाबदेही।

क्यों अहम है

अधूरी लिफ्ट सिंचाई योजनाओं से लागत बढ़ती जाती है पर खेत सूखे रहते हैं — यहाँ 2,368 करोड़ रुपये खर्च के बाद भी 58 हजार एकड़ को पानी नहीं मिला और किसान वर्षा व बोरवेल पर निर्भर हैं। एक्वाडक्ट जैसी एक अटकी संरचना पूरी नहर प्रणाली का लाभ रोक देती है, जो परियोजना अनुक्रमण और भूमि अधिग्रहण-पुनर्वास की कमजोरी दिखाती है। सूखाग्रस्त पालमूरु क्षेत्र में यह पलायन और कृषि संकट से सीधे जुड़ा मुद्दा है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • जवाहर नेट्टेंपाडु लिफ्ट सिंचाई योजना — जोगुलांबा गडवाल जिला, तेलंगाना; स्रोत: कृष्णा नदी, 20 टीएमसी लिफ्ट।
  • लक्षित आयकट 2 लाख एकड़; वंचित 58,000 एकड़; बाईं नहर से केवल 6,000 एकड़ को पानी।
  • लागत: 2005 में 1,428 करोड़ → 2019 में 2,548 करोड़ → 2022 में प्रस्तावित 2,700 करोड़; खर्च 2,368 करोड़।
  • बैलेंसिंग रिजर्वायर: पहला चरण गुडेंदोड्डी, दूसरा चरण र्यालंपाडु; र्यालंपाडु के नीचे 5 ऑफलाइन जलाशय।
  • अड़चन: कोंडापल्ली में 1 किमी एक्वाडक्ट अधूरा; 30 किमी नहरें व 296+ संरचनाएँ शेष; 562 एकड़ अधिग्रहण लंबित।

मेन्स दृष्टिकोण

जवाहर नेट्टेंपाडु लिफ्ट सिंचाई योजना यह दिखाती है कि भारत में बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की असली समस्या केवल वित्त नहीं, बल्कि अनुक्रमण और अंतिम-छोर वितरण है। 2005 में 1,428 करोड़ रुपये से शुरू परियोजना की लागत 2022 में 2,700 करोड़ रुपये प्रस्तावित हुई और 2,368 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी 58 हजार एकड़ दाहिनी नहर के आयकट को पानी नहीं मिल रहा, क्योंकि कोंडापल्ली में नाले पर एक किलोमीटर का एक्वाडक्ट, 30 किमी नहरें और 296 से अधिक संरचनाएँ अधूरी हैं। कारण स्पष्ट हैं: 562 एकड़ भूमि अधिग्रहण लंबित, बिजली लाइन हटाने का काम बाकी, मानसून में नाले में प्रवाह के कारण काम संभव न होना, 1,176 परिवारों का पुनर्वास अपूर्ण और अधिग्रहण-पुनर्वास के बिल बकाया। परिणाम स्वरूप किसान खेत परती छोड़ रहे हैं, वर्षाधारित फसलों या सीमित बोरवेल जल पर निर्भर हैं; स्रोत के अनुसार पिल्ला (वितरण) नहरों के लिए तीन बार सर्वे हुए पर काम नहीं। आगे का रास्ता — लंबित भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास भुगतान को प्राथमिकता देना, मार्च-अप्रैल जैसे शुष्क महीनों में एक्वाडक्ट स्लैब कार्य पूरा करना, वितरण नहरों को मुख्य नहर के साथ जोड़कर पूरा करना, और चुनावी वादों के बजाय समयबद्ध निगरानी के साथ शेष पैकेज (99-बी, डी, 100) निपटाना।

मुख्य शब्द

लिफ्ट सिंचाई योजना (एत्तिपोतल)
पंपों से नदी का पानी ऊँचाई पर उठाकर नहरों व जलाशयों के जरिए खेतों तक पहुँचाने वाली प्रणाली।
एक्वाडक्ट
नहर के पानी को नाले या नदी के ऊपर से पार कराने वाली पुल जैसी संरचना; यहाँ कोंडापल्ली में 1 किमी की यह संरचना अधूरी है।
आयकट
किसी सिंचाई परियोजना से पानी पाने वाला निर्धारित कृषि क्षेत्र; यहाँ लक्ष्य 2 लाख एकड़।
बैलेंसिंग रिजर्वायर
लिफ्ट किए गए पानी को संग्रहित कर नहरों में नियंत्रित आपूर्ति देने वाला जलाशय — जैसे गुडेंदोड्डी और र्यालंपाडु।
टीएमसी
थाउजेंड मिलियन क्यूबिक फीट — जल आयतन की इकाई; परियोजना में 20 टीएमसी पानी उठाने का लक्ष्य।
ऑफलाइन जलाशय
मुख्य नदी-धारा से अलग बनाया गया जलाशय; र्यालंपाडु के नीचे ऐसे 5 जलाशय बनाए गए।

अभ्यास प्रश्न

  1. अधूरी सिंचाई परियोजनाओं में लागत वृद्धि और अंतिम-छोर तक पानी न पहुँचने के कारणों का विश्लेषण नेट्टेंपाडु लिफ्ट योजना के उदाहरण से कीजिए।
  2. भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की अड़चनें बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को कैसे विलंबित करती हैं? सुधार के उपाय सुझाइए।
  3. लिफ्ट सिंचाई योजनाएँ सूखाग्रस्त क्षेत्रों में कृषि संकट और पलायन कम करने में कितनी कारगर हैं? तर्कसहित चर्चा कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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