नकद हस्तांतरण राज्यों के सुधारों को पीछे धकेल रहे: अर्थशास्त्री
कर्नाटक में कांग्रेस, मध्य प्रदेश में भाजपा, तमिलनाडु में डीएमके और पंजाब में आम आदमी पार्टी नकद हस्तांतरण, मुफ्त बिजली और कर्ज माफी के एक ही मॉडल पर आ गए हैं, ऐसा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री किशन शास्त्री लिखते हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार 2025-26 में 12 राज्य महिलाओं को नकद हस्तांतरण पर 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं। आधार, जन धन और डीबीटी ने भुगतान सस्ता और तेज़ किया, जबकि आरबीआई ने चेताया है कि हस्तांतरण खर्च बुनियादी ढांचे के धन को घटा रहा है।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- 12 states are spending Rs 1.68 lakh crore on cash transfers to women in 2025-26 — Attributed in source to PRS Legislative Research; figure appears in source, not independently verified here.
- World Bank told the G20 that India reached 80% financial inclusion in six years, a journey that would otherwise have taken nearly five decades — Attributed to the World Bank in the source; no document or date cited.
- RBI has warned that transfer spending is crowding out state infrastructure spending — Attributed to the Reserve Bank of India; no specific report or quote cited in source.
- Tamil Nadu has elected an actor with no prior office on a transfers-based platform — Stated in the source without names or dates; unattributed and should be verified before publication.
- Karnataka moved to reinstate penalties for selling outside the mandi, halted by opposition numbers in the upper house — Unattributed claim in an opinion piece; no source or date given.
विश्लेषकों की राय राय
कैम्ब्रिज के अर्थशास्त्री किशन शास्त्री के विश्लेषण का राजनीतिक सार यह है कि विचारधाराएँ अलग होने के बावजूद कर्नाटक में कांग्रेस, मध्य प्रदेश में बीजेपी, तमिलनाडु में डीएमके और पंजाब में आप एक ही चुनावी मॉडल पर आ गए हैं। नकद हस्तांतरण का श्रेय भेजने वाले नेता को तुरंत, सटीक और पहचान के साथ मिलता है; सड़क या बिजली सुधार का लाभ देर से और सबको मिलता है, इसलिए किसी एक नेता का अहसान नहीं बनता। उनका तर्क है कि जब हस्तांतरण सबसे लाभकारी राजनीतिक औजार बन जाता है, तो कठिन सुधारों की प्रेरणा लगभग खत्म हो जाती है।
- मुकाबला अब विचारधारा का नहीं, बढ़-चढ़कर बोली लगाने का है — पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार 2025-26 में 12 राज्य महिलाओं को नकद हस्तांतरण पर 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं।
- आधार, जन धन और डीबीटी ने लाभार्थी की पहचान और भुगतान को सस्ता और तेज़ बना दिया, जिससे लेखक के मुताबिक मज़बूत कैडर और ज़मीनी संगठन वाली पार्टियों की पुरानी बढ़त कमज़ोर हुई है।
- जाति गणना पर बनी सर्वदलीय सहमति को वे सामाजिक न्याय की माँग के साथ-साथ सबसे सटीक 'टारगेटिंग मैप' के रूप में भी देखते हैं — कौन सा वर्ग, कौन सी योजना।
- आरबीआई की यह चेतावनी कि हस्तांतरण खर्च बुनियादी ढाँचे के पैसे को निगल रहा है, इसलिए ज़्यादा चुभती है क्योंकि बिजली वितरण कंपनियाँ, शहरी निर्माण नियम और मंडी कानून सब राज्यों के विषय हैं।
- तमिलनाडु में बिना किसी प्रशासनिक अनुभव वाले अभिनेता की हस्तांतरण-केंद्रित मंच पर जीत को वे इस बात का सबूत बताते हैं कि शासन का रिकॉर्ड अब भुगतान के भरोसेमंद वादे से कम मायने रखता है।
किस पर नज़र रखें — आगामी राज्य बजटों और घोषणापत्रों में हस्तांतरण की राशि पर नज़र रखें, और यह भी कि विधायी अंकगणित सुधारों को कैसे तय करता है — जैसे कर्नाटक में मंडी संबंधी वापसी ऊपरी सदन में विपक्ष के संख्याबल से रुकी।
यह एक अर्थशास्त्री की निजी राय है; यह खबर यह साबित नहीं करती कि हस्तांतरण ही सुधारों के रुकने का कारण हैं, और न ही इन योजनाओं से गरीबी या महिलाओं की आय पर संभावित लाभ का कोई आँकड़ा देती है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री किशन शास्त्री का तर्क है कि भारत के लगभग सभी बड़े राज्य—विचारधारा से परे—एक ही राजनीतिक मॉडल पर आ गए हैं: महिलाओं को नकद हस्तांतरण, मुफ्त बिजली और कर्ज माफी। आधार, जन धन और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) जैसी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) ने ऐसे भुगतान को सस्ता, तेज़ और लक्षित बना दिया, जिससे नेताओं के लिए 'श्रेय' पाना आसान हो गया। लेखक का कहना है कि इससे बिजली वितरण, शहरी नियोजन और कृषि विपणन जैसे कठिन राज्य-स्तरीय सुधारों की प्रेरणा खत्म हो रही है, और आरबीआई भी चेता चुका है कि हस्तांतरण खर्च बुनियादी ढांचे के धन को घटा रहा है।
मुख्य तथ्य
- पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार 2025-26 में 12 राज्य महिलाओं को नकद हस्तांतरण पर 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं।
- कर्नाटक में कांग्रेस, मध्य प्रदेश में भाजपा, तमिलनाडु में डीएमके और अब टीवीके, तथा पंजाब में आम आदमी पार्टी—सभी एक ही मॉडल पर आ गए हैं।
- विश्व बैंक ने जी20 को बताया कि भारत ने छह वर्षों में 80 प्रतिशत वित्तीय समावेशन हासिल किया, जिसमें अन्यथा लगभग पाँच दशक लगते।
- आरबीआई ने असामान्य रूप से स्पष्ट भाषा में चेताया है कि हस्तांतरण खर्च राज्यों के बुनियादी ढांचे के लिए आवश्यक धन को क्राउड आउट कर रहा है।
- लेख के अनुसार राज्य स्तर पर आखिरी वास्तविक आर्थिक कायाकल्प 2000 के दशक की शुरुआत में हुआ—गुजरात (नरेंद्र मोदी), बेंगलुरु (एसएम कृष्णा), हैदराबाद (चंद्रबाबू नायडू)।
- राज्यों की बिजली वितरण कंपनियाँ प्रभावी रूप से दिवालिया हैं और केंद्रीय बेलआउट के सहारे चल रही हैं।
- कर्नाटक ने मंडी के बाहर बिक्री पर हटाए गए दंड फिर लगाने की कोशिश की, जो विपक्ष के ऊपरी सदन में संख्याबल से रुकी।
- तमिलनाडु ने हाल ही में एक अभिनेता को चुना जिसने पहले कोई पद नहीं संभाला था, और जिसका मंच नकद हस्तांतरण पर आधारित था।
समयरेखा
- दशकों पहले (डीपीआई से पूर्व)तमिलनाडु स्कूली बच्चों को भोजन दे रहा था—हस्तांतरण राजनीति नई नहीं है, पर पुरानी मशीनरी धीमी और लीकेज वाली थी।
- 2000 के दशक की शुरुआतगुजरात का औद्योगीकरण, बेंगलुरु का तकनीकी राजधानी बनना, हैदराबाद का सेवा-आधारित पुनर्निर्माण—लेखक के अनुसार आखिरी बड़े राज्य सुधार।
- पिछले एक दशकआधार, जन धन और भुगतान रेल के साथ डीबीटी ढांचा खड़ा हुआ; विश्व बैंक ने जी20 को 80% वित्तीय समावेशन की जानकारी दी।
- 2025-2612 राज्य महिलाओं को नकद हस्तांतरण पर 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं (पीआरएस)।
- हाल ही मेंतमिलनाडु में हस्तांतरण-केंद्रित मंच पर एक अभिनेता का चुनाव; आरबीआई की क्राउडिंग-आउट चेतावनी।
किसका दाँव
- राज्य सरकारें और मुख्यमंत्री — नकद हस्तांतरण से तत्काल राजनीतिक श्रेय मिलता है, जबकि सड़क या बिजली सुधार धीमे और श्रेय-रहित हैं।
- राजनीतिक दल (कांग्रेस, भाजपा, डीएमके, टीवीके, आप) — विचारधारा भिन्न, योजनाएँ समान; प्रतिस्पर्धा अब लाभार्थी की पहचान करने की क्षमता पर।
- आरबीआई — राज्यों के राजकोषीय ढाँचे और पूंजीगत व्यय में गिरावट पर चिंता।
- राज्य बिजली वितरण कंपनियाँ (डिस्कॉम) — दिवालिया स्थिति, केंद्रीय बेलआउट पर निर्भर, उद्योग को भरोसेमंद बिजली नहीं दे पातीं।
- शहर और शहरी नागरिक — राज्य कानून के तहत कड़े फ्लोर-स्पेस नियमों से मुंबई-बेंगलुरु में फैलाव, ट्रैफिक और महँगे आवास।
- किसान — कृषि विपणन राज्य-नियंत्रित मंडी में सीमित; कर्नाटक में ढील का रोलबैक।
- आईटी क्षेत्र और निवेशक — एआई से श्रम-मध्यस्थता मॉडल कमजोर; निवेशक इसे मूल्य दबाव और धीमी भर्ती के रूप में देख रहे हैं।
क्यों अहम है
लेखक का तर्क है कि भारत की अगली विकास कहानी बिजली, ज़मीन, शहरों और खेती में लिखी जाएगी—ये सभी राज्य के विषय हैं, इसलिए भारत अपने राज्यों से तेज़ नहीं बढ़ सकता। दो दशक तक सॉफ्टवेयर निर्यात जैसे क्षेत्रों ने कमजोर राज्य क्षमता की भरपाई की, पर एआई से वह कुशन पतला हो रहा है। यदि हस्तांतरण खर्च बुनियादी ढांचे और सुधारों को पीछे धकेलता रहा, तो राज्यों के खजाने पर दबाव बढ़ेगा और विकास की गति सीमित रहेगी।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: 2025-26 में 12 राज्यों का महिलाओं को नकद हस्तांतरण पर खर्च 1.68 लाख करोड़ रुपये।
- डीबीटी ढांचे के तीन स्तंभ: आधार (डिजिटल पहचान), जन धन (बैंक खाते), भुगतान रेल।
- विश्व बैंक ने जी20 को बताया—भारत में 6 वर्षों में 80% वित्तीय समावेशन।
- आरबीआई की चेतावनी: हस्तांतरण खर्च राज्यों के बुनियादी ढांचा व्यय को क्राउड आउट कर रहा है।
- बिजली वितरण, शहरी फ्लोर-स्पेस नियम और कृषि मंडी—सभी राज्य सूची के विषय।
- आर्थिक सर्वेक्षण सरकारों से 'रास्ते से हट जाने' का आग्रह करता है (सोर्स के अनुसार)।
मेन्स दृष्टिकोण
मुद्दा यह है कि भारत की सराही गई डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर—आधार, जन धन और डीबीटी—ने कल्याण वितरण को लीकेज-मुक्त, तेज़ और लक्षित बनाया, लेकिन साथ ही राजनीतिक प्रोत्साहनों को बदल दिया। लेखक के अनुसार एक अतिरिक्त हस्तांतरण की सीमांत लागत लगभग शून्य हो गई है जबकि राजनीतिक प्रतिफल ऊँचा बना हुआ है, क्योंकि हर रुपया पहचाने जा सकने वाले मतदाता के खाते में पहुँचता है और उसका श्रेय सीधे नेता को मिलता है; इसके विपरीत सड़क या बिजली सुधार वर्षों लेते हैं, सबकी सेवा करते हैं और किसी को कृतज्ञ नहीं बनाते। परिणाम—बिजली की कीमत तय करने, शहरी ऊँचाई नियम ढीले करने और मंडी से बाहर बिक्री की छूट जैसे राज्य-विषय सुधार ठहर गए हैं, और आरबीआई हस्तांतरण खर्च से पूंजीगत व्यय के क्राउडिंग आउट की चेतावनी दे रहा है। लेखक का प्रस्तावित रास्ता 'मशीन तोड़ना' नहीं बल्कि उसके साथ क्षमता खड़ी करना है: राज्य सरकारें एक अत्यंत पतली स्थायी नौकरशाही पर चलती हैं और अर्थशास्त्री, शहरी योजनाकार या पावर इंजीनियर के लिए कोई लेटरल दरवाज़ा नहीं है—तुलना में अमेरिकी राष्ट्रपति करीब चार हज़ार अधिकारी नियुक्त करता है। जब तक राज्य इसका उत्तर नहीं देते, चेक आते रहेंगे और सुधार नहीं आएँगे।
मुख्य शब्द
- डीपीआई (डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर)
- आधार, जन धन खाते और भुगतान रेल का संयुक्त ढांचा जो राज्य को नागरिकों तक सीधे पहुँचने देता है।
- डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर)
- वह वास्तुकला जिससे सरकार किसी भी नागरिक को सीधे, तत्काल और पुरानी व्यवस्था से बहुत कम लीकेज के साथ भुगतान कर सकती है।
- क्राउडिंग आउट
- आरबीआई की चिंता—हस्तांतरण पर बढ़ता खर्च राज्यों के बुनियादी ढांचे के लिए उपलब्ध धन को घटा देता है।
- जाति जनगणना
- सामाजिक न्याय की मांग, पर लेखक के अनुसार यह अब तक का सबसे शक्तिशाली 'पहचान' उपकरण भी बन सकती है, जिससे दल समूह-विशेष योजनाएँ बना सकें।
- मंडी
- राज्य-नियंत्रित कृषि विपणन व्यवस्था; कर्नाटक ने बाहर बिक्री पर हटाए गए दंड फिर लगाने की कोशिश की।
- फ्लोर-स्पेस नियम
- राज्य कानून के तहत भवन ऊँचाई/घनत्व सीमित करने वाले नियम, जिनसे मुंबई-बेंगलुरु ऊपर उठने की बजाय फैलते हैं।
अभ्यास प्रश्न
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ने भारत में कल्याण वितरण की दक्षता बढ़ाई है, लेकिन क्या इसने राजनीतिक प्रोत्साहनों को सुधार-विरोधी बना दिया है? परीक्षण कीजिए।
- 'भारत अब अपने राज्यों से तेज़ नहीं बढ़ सकता।' बिजली वितरण, शहरी नियोजन और कृषि विपणन के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
- राज्यों में नीति-निर्माण क्षमता की कमी सुधारों में बाधा कैसे बनती है, और लेटरल प्रवेश जैसे उपाय इसमें क्या भूमिका निभा सकते हैं? चर्चा कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
