ओआरएफ विश्लेषण: भारत के आईबीजी के लिए गुणवत्तापूर्ण जनशक्ति अहम

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर फेलो कार्तिक बोम्मकंटी के विश्लेषण के अनुसार, ड्रोन हमलों से टैंकों की रक्षा के लिए भारतीय सेना के इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (आईबीजी) को पर्सिस्टेंट रोबोटिक ओवरवॉच (पीआरओ) की जरूरत है। रूस का रूबिकॉन केंद्र 2024-25 में बना; मार्च 2025 में इसमें करीब 1,450 कर्मी थे, जो 2026 की पहली तिमाही तक लगभग 9,000 हो गए। तेज विस्तार से भर्ती मानक गिरे और गुणवत्ता प्रभावित हुई, जो चीन व पाकिस्तान का सामना करते भारत के लिए सबक है।

स्रोत

Observer Research Foundation (ORF) · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Russia's Rubicon Center was established in 2024-25 for research, procurement, training and operational deployment of unmanned systems. — Figure and description appear in the source, attributed to the ORF author's analysis; no primary document cited.
  • Rubicon had about 1,450 personnel in March 2025 against a sanctioned 2,500, and roughly 9,000 by the first quarter of 2026. — Numbers appear in the source and are internally consistent; no external source given.
  • Russia's Unmanned Systems Forces had about 87,000 personnel, with plans for 165,000 by end-2026, while the 50th Unmanned Systems Brigade expands from 1,300 to 7,000. — Figures appear in the source without attribution to any document; treat as the author's assessment.
  • Russia is unable to meet monthly recruitment targets and has lowered standards, undermining quality. — Unattributed analytical claim by the author; not independently verifiable here.
  • India's IBGs need a Persistent Robotic Overwatch bubble for offensive and defensive missions against China and Pakistan. — Opinion/recommendation by the named author, published as ORF expert commentary.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ऊपर से यह तकनीकी रक्षा बहस लगती है, लेकिन इसका राजनीतिक पहलू साफ है — ओआरएफ विश्लेषण आधुनिकीकरण को हथियार खरीद का नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन का सवाल बनाता है। रूस का रूबिकॉन केंद्र मार्च 2025 में करीब 1,450 कर्मियों से 2026 की पहली तिमाही तक लगभग 9,000 तक पहुंचा और भर्ती मानक घटाने पड़े — यही अनुभव भारत के लिए "संख्या से पहले कौशल" का राजनीतिक संदेश बनता है। आईबीजी का पुनर्गठन, ड्रोन निर्माण और प्रशिक्षण, आत्मनिर्भरता और रक्षा रोजगार की मौजूदा राजनीतिक बहस में सहज रूप से फिट बैठते हैं।

  • थिंक-टैंक विश्लेषण अक्सर नीतिगत बहस की जमीन तैयार करते हैं; यह बजट प्राथमिकता को प्लेटफॉर्म से हटाकर मानव संसाधन, प्रशिक्षण और घरेलू ड्रोन उद्योग की ओर मोड़ने के तर्क को मजबूत करता है।
  • चीन और पाकिस्तान के दोहरे खतरे का उल्लेख उन लोगों के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी है जो रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग करते हैं।
  • युद्ध की अवधि पूरी तरह भारत के नियंत्रण में नहीं रहेगी — यह बात सैन्य कार्रवाई को राजनीतिक रूप से नियंत्रित मानने वालों के लिए एक चेतावनी है।
  • कुशल ड्रोन ऑपरेटरों और तकनीकी कर्मियों की जरूरत भर्ती मॉडल और प्रशिक्षण ढांचे पर बहस को जन्म दे सकती है।
  • इसमें कोई सरकारी आधिकारिक रुख नहीं है; यह एक स्वतंत्र विशेषज्ञ की राय है, जिससे इसका तत्काल राजनीतिक वजन सीमित रहता है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आईबीजी संरचना, ड्रोन यूनिटों और ऑपरेटर प्रशिक्षण पर सरकार या सेना से कोई औपचारिक बयान आता है या नहीं, और यह विषय संसद की रक्षा चर्चाओं में उठता है या नहीं।

यह खबर एक विशेषज्ञ का विश्लेषण है और यह स्थापित नहीं करती कि सरकार या सेना ने इन सिफारिशों को स्वीकार किया है या आईबीजी पर कोई निर्णय लिया है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) के स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम के सीनियर फेलो कार्तिक बोम्मकंटी का विश्लेषण इस बहस को आगे बढ़ाता है कि ड्रोन युग में युद्धक टैंक की प्रासंगिकता कैसे बचे। तर्क है कि कवच (आर्मर) और एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस) एक सीमा तक ही काम करते हैं और सैचुरेटेड ड्रोन हमले नहीं रोक सकते, इसलिए "पर्सिस्टेंट रोबोटिक ओवरवॉच" (पीआरओ) यानी मानवरहित प्रणालियों का स्तरित सुरक्षा बुलबुला जरूरी है। विश्लेषण रूस के रूबिकॉन सेंटर को भारतीय सेना के इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (आईबीजी) के लिए एक टेम्पलेट मानता है, पर जोर देता है कि असली अड़चन गुणवत्तापूर्ण जनशक्ति है। चीन की पीएलए ग्राउंड फोर्स और पाकिस्तान सेना के दो-मोर्चा खतरे के संदर्भ में यह सबक अहम बताया गया है।

मुख्य तथ्य

  • रूस का रूबिकॉन सेंटर 2024-25 में स्थापित हुआ, जिसका घोषित उद्देश्य "शोध, खरीद, प्रशिक्षण और परिचालन तैनाती" की समग्र संस्था बनना था।
  • मार्च 2025 में रूबिकॉन सेंटर में लगभग 1,450 कर्मी थे, जबकि स्वीकृत सीमा 2,500 कर्मियों की थी।
  • 2026 की पहली तिमाही तक रूबिकॉन के कर्मियों की संख्या लगभग 9,000 हो गई।
  • रूबिकॉन की प्रतिस्पर्धा 50वीं अनमैन्ड सिस्टम्स ब्रिगेड (यूएसबी) से है, जो स्वयं 1,300 से 7,000 कर्मियों तक विस्तार कर रही है।
  • रूस की अनमैन्ड सिस्टम्स फोर्सेस में करीब 87,000 कर्मी हैं, जिन्हें 2026 के अंत तक 1,65,000 करने की योजना है।
  • रूस अपने मासिक भर्ती लक्ष्य पूरे नहीं कर पा रहा, इसलिए कोटा पूरा करने के लिए भर्ती मानक घटाने पड़े और गुणवत्ता प्रभावित हुई।
  • रूबिकॉन ने परंपरागत फॉर्मेशनों से अनुभवी यूएएस टीमें भर्ती कीं, जिससे उन इकाइयों की आईएसआर और फायर सपोर्ट क्षमता घटी।
  • रूबिकॉन की विशेषीकृत इकाइयों में एफपीवी क्वाडकॉप्टर, ओरलान-10 व सुपरकैम जैसे रिकॉनेसेंस सिस्टम, तथा सी-यूएवी व इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर स्क्वॉड शामिल हैं।

समयरेखा

  1. 1965भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना ने क्षेत्रीय "क्विड प्रो क्वो" हासिल किया — आक्रामक कवच-केंद्रित अभियानों का उदाहरण।
  2. 2024-25रूस का रूबिकॉन सेंटर स्थापित; उद्देश्य शोध, खरीद, प्रशिक्षण, परिचालन तैनाती और सिद्धांत/टीटीपी विकास।
  3. मार्च 2025रूबिकॉन सेंटर में लगभग 1,450 कर्मी; स्वीकृत सीमा 2,500।
  4. 2026 की पहली तिमाहीरूबिकॉन की कर्मी संख्या लगभग 9,000 तक पहुंची; तेज विस्तार से गुणवत्ता पर दबाव।
  5. 2026 के अंत तक (लक्ष्य)रूस की अनमैन्ड सिस्टम्स फोर्सेस को 87,000 से 1,65,000 कर्मियों तक बढ़ाने की योजना।

किसका दाँव

  • भारतीय सेना (आईए) और उसके आईबीजी — आक्रामक व रक्षात्मक दोनों अभियानों के लिए पीआरओ बुलबुला बनाना; इसके लिए गुणवत्ता और मात्रा दोनों में जनशक्ति जुटाना।
  • रूस का रूबिकॉन सेंटर व अनमैन्ड सिस्टम्स फोर्सेस — तेज विस्तार बनाम भर्ती मानकों में गिरावट; परंपरागत इकाइयों से टीमें खींचने से उनकी आईएसआर क्षमता घटना।
  • चीन की पीएलए ग्राउंड फोर्स (पीएलएजीएफ) और पाकिस्तान सेना (पीए) — वे भी संघर्ष क्षेत्र का विस्तार कर आक्रामक कार्रवाई कर सकते हैं; युद्ध की अवधि भारत के पूर्ण नियंत्रण में नहीं।
  • यूक्रेन — ड्रोन रेजिमेंट/ब्रिगेड का बहुत तेज विस्तार करने पर क्षमताएं अस्थायी रूप से कमजोर हुईं — तुलनीय सबक।
  • भारत का सैन्य-औद्योगिक क्षेत्र — मैगजीन डेप्थ, एआई-संवर्धित ड्रोन निर्माण और तकनीकी जनशक्ति की आपूर्ति।
  • ओआरएफ / कार्तिक बोम्मकंटी — नीति-बहस में यह तर्क रखना कि जनशक्ति की गुणवत्ता पीआरओ नुस्खे की पूर्वशर्त है।

क्यों अहम है

ड्रोन सस्ते और बड़ी संख्या में तैनात हो सकने वाले हैं, जिससे चालक-दल वाले कवचित वाहन बेहद असुरक्षित हो गए हैं; इसलिए टैंक की प्रासंगिकता अब मानवरहित ओवरवॉच पर टिकी है। रूस का अनुभव दिखाता है कि मात्रा के लक्ष्य जल्दी पाने की कोशिश गुणवत्ता को कमजोर कर देती है और घाटा (अट्रिशन) आसानी से नहीं भरता। दो-मोर्चा खतरे का सामना करते भारत के लिए संकेत साफ है — ड्रोन खरीद जितनी ही अहम है कुशल ऑपरेटरों और तकनीकी जनशक्ति की योजना।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • पर्सिस्टेंट रोबोटिक ओवरवॉच (पीआरओ): टैंक की रक्षा हेतु मानवरहित प्रणालियों से बना स्तरित सुरक्षा बुलबुला, जो आक्रमण में भी सहायक।
  • रूस का रूबिकॉन सेंटर 2024-25 में स्थापित; मार्च 2025 में ~1,450 कर्मी, 2026 की पहली तिमाही तक ~9,000।
  • रूस की 50वीं अनमैन्ड सिस्टम्स ब्रिगेड 1,300 से 7,000 कर्मियों तक विस्तार कर रही है।
  • रूस की अनमैन्ड सिस्टम्स फोर्सेस: ~87,000 कर्मी, 2026 के अंत तक 1,65,000 का लक्ष्य।
  • रूसी रिकॉनेसेंस ड्रोन: ओरलान-10 और सुपरकैम; साथ में एफपीवी क्वाडकॉप्टर तथा सी-यूएवी/इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर स्क्वॉड।
  • लेखक: कार्तिक बोम्मकंटी, सीनियर फेलो, स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन।

मेन्स दृष्टिकोण

ड्रोन-प्रधान युद्धक्षेत्र ने कवचित युद्ध का गणित बदल दिया है: कवच बढ़ाने और एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम की सीमाएं हैं, और सैचुरेटेड यूएवी हमलों के सामने टैंक की स्वयं-रक्षा क्षमता चुक गई है — इसीलिए पर्सिस्टेंट रोबोटिक ओवरवॉच (पीआरओ) का तर्क उठा है, जो रक्षा में स्तरित बुलबुला बनाए और आक्रमण में सफलता (ब्रेकथ्रू) में भी मदद करे। भारतीय सेना के आईबीजी में रूस के रूबिकॉन जैसी कुछ विशेषताएं पहले से हैं, पर विश्लेषण का मुख्य बिंदु यह है कि बहस अक्सर उपकरण पर केंद्रित रहती है और जनशक्ति की गुणात्मक-मात्रात्मक मांग को नजरअंदाज करती है। रूस का अनुभव चेतावनी है: रूबिकॉन का मार्च 2025 के ~1,450 से 2026 की पहली तिमाही तक ~9,000 कर्मियों तक विस्तार, परंपरागत फॉर्मेशनों से अनुभवी यूएएस टीमें खींचना (जिससे आईएसआर व फायर सपोर्ट कमजोर हुआ), 50वीं यूएसबी से आंतरिक प्रतिस्पर्धा, मासिक भर्ती लक्ष्य पूरे न होना और भर्ती मानकों में गिरावट — सब मिलकर गुणवत्ता घटाते हैं; यूक्रेन में भी तेज विस्तार से क्षमता अस्थायी रूप से कमजोर हुई। भारत के लिए निहितार्थ यह है कि चीन (पीएलएजीएफ) और पाकिस्तान सेना भी युद्ध-क्षेत्र व अवधि बढ़ा सकते हैं, इसलिए युद्ध की लंबाई भारत के नियंत्रण में नहीं; आक्रामक कवच-केंद्रित अभियान (1965 जैसी क्षेत्रीय क्विड प्रो क्वो की तर्ज पर) अधिक साधन और अधिक अट्रिशन मांगेंगे, जबकि रक्षात्मक अभियानों में पीआरओ की मांग तुलनात्मक रूप से सीमित रहेगी। आगे का रास्ता: सेना के सैन्य उद्देश्यों के अनुरूप ढला पीआरओ ढांचा, मैगजीन डेप्थ और एआई-संवर्धित ड्रोन निर्माण के साथ तकनीकी जनशक्ति, कुशल ड्रोन ऑपरेटर और भारत की सैन्य-औद्योगिक शक्ति का सहारा।

मुख्य शब्द

पर्सिस्टेंट रोबोटिक ओवरवॉच (पीआरओ)
मानवरहित प्रणालियों की लगातार निगरानी-रक्षा परत, जो टैंक के लिए स्तरित सुरक्षा बुलबुला बनाती और आक्रमण में भी सहायता करती है।
इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (आईबीजी)
भारतीय सेना की तेज प्रतिक्रिया वाली, उच्च-गति अभियानों हेतु गठित एकीकृत युद्धक संरचना।
एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस)
टैंक पर लगी सक्रिय रक्षा प्रणाली, जो आती एंटी-टैंक मुनिशन रोकती है पर सीमा तक ही प्रभावी।
रूबिकॉन सेंटर
2024-25 में बना रूसी संगठन — ड्रोन शोध, खरीद, प्रशिक्षण, तैनाती और टीटीपी/सिद्धांत विकास के लिए।
आईएसआर
इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनेसेंस — खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही क्षमता।
सी-यूएवी
काउंटर-अनमैन्ड एरियल वीइकल — शत्रु ड्रोन को निष्क्रिय या नष्ट करने वाली क्षमता/दस्ते।

अभ्यास प्रश्न

  1. ड्रोन-प्रधान युद्धक्षेत्र में युद्धक टैंक की प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए। 'पर्सिस्टेंट रोबोटिक ओवरवॉच' की अवधारणा भारतीय सेना के आईबीजी के लिए क्यों प्रस्तावित की जा रही है?
  2. रूस के रूबिकॉन सेंटर के तेज विस्तार से जुड़ी जनशक्ति संबंधी चुनौतियां क्या हैं, और भारत इससे कौन-से सबक ले सकता है?
  3. दो-मोर्चा खतरे (चीन और पाकिस्तान) के संदर्भ में आक्रामक और रक्षात्मक कवच-केंद्रित अभियानों की पीआरओ संबंधी मांगें किस प्रकार भिन्न होती हैं? परीक्षण कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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