एफसीआरए संशोधन किसी समुदाय के खिलाफ नहीं: केंद्र

केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने शुक्रवार को संसद की संयुक्त समिति को बताया कि विदेशी चंदा कानून में प्रस्तावित संशोधन किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय हित की चिंताओं के कारण लाए गए हैं। भाजपा के संजय जायसवाल की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय समिति विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 की समीक्षा कर रही है। उन्होंने कहा कि 2024-25 में एनजीओ को 22,974 करोड़ रुपये विदेशी अंशदान मिला, जिसमें 5,150 करोड़ रुपये धार्मिक संगठनों को गए।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • FCRA amendments are not targeted at any community and are driven by internal security and national interest concerns. — Attributed in source to Union home secretary Govind Mohan before the Joint Committee of Parliament.
  • FCRA-registered NGOs received Rs 22,974 crore in foreign contributions in 2024-25, with Rs 5,150 crore going to religious associations. — Figures appear in source, attributed to data shared by the home secretary with the panel.
  • Christian associations received Rs 1,345 crore, Hindu organisations Rs 328 crore and Muslim groups Rs 19 crore. — Figures appear in source as part of the MHA presentation; not independently verifiable here.
  • 36,488 FCRA registrations have been cancelled so far and 120 cases are pending in courts. — Stated in source as part of the MHA presentation to the panel.
  • The bill was introduced in the Lok Sabha on March 25 and referred to the JPC on August 12. — Dates appear in source without a citing document; internally consistent with the account given.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

सरकार ने अपनी दलील सोच-समझकर चुनी है — यह राष्ट्रीय सुरक्षा का कानून है, किसी समुदाय के खिलाफ नहीं। लेकिन जेपीसी में डीएमके, कांग्रेस और सपा सांसदों ने अल्पसंख्यक हितों पर सवाल उठाकर बहस को नियामक तकनीकी दायरे से निकालकर पहचान और प्रतिनिधित्व की राजनीति में पहुंचा दिया है। केंद्र ने जिस आंकड़े को औचित्य के रूप में रखा — कि धार्मिक संस्थाओं में सबसे बड़ा हिस्सा ईसाई संगठनों को मिला — विपक्ष उसी को कानून की मार किस पर पड़ेगी, इसका संकेत बता सकता है। बिल को संयुक्त समिति को भेजना और सभी ईसाई मुख्यमंत्रियों सहित कई मुख्यमंत्रियों से मिलने की घोषणा, राजनीतिक तापमान घटाने की कोशिश के रूप में पढ़ी जा सकती है।

  • आंतरिक सुरक्षा के ढांचे में बिल को रखकर केंद्र इसे किसी एक समुदाय के खिलाफ बताए जाने की कोशिश को पहले ही काटना चाहता है।
  • डीएमके, कांग्रेस और सपा सांसदों का एक ही अल्पसंख्यक-हित वाले सवाल पर आना विपक्ष के उभरते साझा नैरेटिव का संकेत है।
  • तमिलनाडु में सर्वाधिक 2,102 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण होना इस मुद्दे को वहां केंद्र-राज्य टकराव की राजनीति में खींच सकता है।
  • जेपीसी अध्यक्ष का सरदार सरोवर बांध और कूडनकुलम परियोजना के विरोध का उल्लेख 'विकास में अड़चन' वाले जाने-पहचाने राजनीतिक ढांचे से मेल खाता है।
  • सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण को संपत्ति बेचने, उपयोग करने या हस्तांतरित करने का अधिकार सबसे संवेदनशील प्रावधान है और राज्यों की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि मुख्यमंत्रियों से बातचीत के बाद जेपीसी संपत्ति-अध्याय में कोई नरमी सुझाती है या नहीं, और विपक्षी सदस्य असहमति नोट देते हैं या नहीं।

यह खबर यह स्पष्ट नहीं करती कि समिति अंतत: क्या सिफारिश करेगी, बिल में संशोधन होगा या नहीं, और कोई दल आखिर में किस रुख पर टिकेगा।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) उन संगठनों को नियंत्रित करता है जो विदेश से चंदा प्राप्त करते हैं। सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 लाई है, जिसमें पंजीकरण समाप्त हो चुके संगठनों की संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान के लिए सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण का प्रस्ताव है। विपक्षी दलों तथा कई नागरिक समाज और धार्मिक संगठनों की आपत्तियों के बाद विधेयक भाजपा सांसद संजय जायसवाल की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय संसदीय संयुक्त समिति (जेपीसी) को भेजा गया। शुक्रवार को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने समिति के समक्ष प्रस्तुति देते हुए कहा कि संशोधन किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय हित से जुड़े हैं।

मुख्य तथ्य

  • गृह सचिव गोविंद मोहन ने शुक्रवार को जेपीसी को बताया कि एफसीआरए संशोधन किसी समुदाय के खिलाफ नहीं; एफसीआरए मूलतः राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है।
  • विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश हुआ और 12 अगस्त को जेपीसी को भेजा गया।
  • 2024-25 में एफसीआरए-पंजीकृत एनजीओ को 22,974 करोड़ रुपये विदेशी अंशदान मिला, जिसमें 5,150 करोड़ रुपये धार्मिक संगठनों को गए।
  • धार्मिक समूहों में ईसाई संगठनों को सर्वाधिक 1,345 करोड़ रुपये, हिंदू संगठनों को 328 करोड़ और मुस्लिम समूहों को 19 करोड़ रुपये मिले।
  • उद्देश्य-वार: सामाजिक कार्यों के लिए 13,071 करोड़, शिक्षा के लिए 6,933 करोड़ और धार्मिक गतिविधियों के लिए 1,841 करोड़ रुपये।
  • वित्त वर्ष 2025 में सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण सर्वाधिक तमिलनाडु में 2,102, फिर महाराष्ट्र 1,578 और कर्नाटक 1,355।
  • शीर्ष दानदाता देश अमेरिका (12,113 करोड़ रुपये), उसके बाद ब्रिटेन (2,414 करोड़) और जर्मनी (1,782 करोड़)।
  • गृह मंत्रालय की प्रस्तुति के अनुसार अब तक 36,488 पंजीकरण रद्द किए गए और 120 मामले अदालतों में लंबित हैं।

समयरेखा

  1. 2010एफसीआरए में संशोधन से हर पाँच वर्ष में लाइसेंस नवीनीकरण और सरकार को लाइसेंस निलंबित करने की शक्ति जैसे कड़े प्रावधान लाए गए।
  2. 25 मार्चविदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किया गया।
  3. 12 अगस्तविपक्ष तथा नागरिक समाज व धार्मिक संगठनों की आपत्तियों के बाद विधेयक संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया।
  4. शुक्रवार (हालिया बैठक)गृह सचिव गोविंद मोहन ने राजधानी में जेपीसी को प्रस्तुति दी; सांसदों ने अल्पसंख्यक हितों पर सवाल उठाए।

किसका दाँव

  • केंद्रीय गृह मंत्रालय / गृह सचिव गोविंद मोहन — मौजूदा कानून के अव्यावहारिक प्रावधानों को ठीक करना और एफसीआरए को राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे के रूप में लागू कराना।
  • संयुक्त संसदीय समिति (अध्यक्ष: संजय जायसवाल, 31 सदस्य) — विधेयक की समीक्षा; व्यापक बहस के लिए कई मुख्यमंत्रियों से मिलने की योजना।
  • विपक्षी सांसद — पी विल्सन (डीएमके), क्रिस्टोफर टिलक व एंटो एंटनी (कांग्रेस), जिया उर रहमान (सपा) — आशंका कि विधेयक अल्पसंख्यक हितों पर प्रतिकूल असर डालेगा।
  • एफसीआरए-पंजीकृत एनजीओ और धार्मिक संगठन — पंजीकरण समाप्त होने पर संपत्तियों की बिक्री/हस्तांतरण, बैंक खाते जमे रहना और विदेशी धन प्राप्ति पर समय-सीमा।
  • जाँच एजेंसियाँ (अधिसूचित एजेंसियाँ) — नए प्रस्ताव में एफसीआरए उल्लंघन की जाँच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य।
  • राज्य सरकारें (निर्धारित प्राधिकरण) — निहित संपत्तियों के प्रबंधन/निपटान के स्पष्ट नियमों के अभाव में प्रावधान लागू करने में असमर्थता।

क्यों अहम है

विदेशी चंदे का नियमन नागरिक समाज की कार्य-क्षमता, धार्मिक व सामाजिक सेवा संस्थाओं की वित्तीय व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा—तीनों को छूता है। प्रस्तावित प्राधिकरण को संपत्ति बेचने, उपयोग करने या हस्तांतरित करने की शक्ति देने का प्रावधान संपत्ति अधिकार और संघ बनाने की स्वतंत्रता पर बहस खड़ी करता है। 2024-25 में 22,974 करोड़ रुपये के प्रवाह और 36,488 रद्द पंजीकरणों के आँकड़े बताते हैं कि इस कानून का दायरा कितना बड़ा है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 — 25 मार्च को लोकसभा में पेश, 12 अगस्त को जेपीसी को भेजा गया।
  • जेपीसी: 31 सदस्य, अध्यक्ष भाजपा सांसद संजय जायसवाल।
  • 2024-25 में एफसीआरए एनजीओ को कुल 22,974 करोड़ रुपये; धार्मिक संगठनों को 5,150 करोड़ रुपये।
  • शीर्ष दानदाता देश: अमेरिका 12,113 करोड़, ब्रिटेन 2,414 करोड़, जर्मनी 1,782 करोड़ रुपये।
  • सर्वाधिक सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण: तमिलनाडु 2,102, महाराष्ट्र 1,578, कर्नाटक 1,355 (वित्त वर्ष 2025)।
  • 2010 के संशोधन ने पाँच-वर्षीय लाइसेंस नवीनीकरण और लाइसेंस निलंबन की सरकारी शक्ति दी।

मेन्स दृष्टिकोण

एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 पर बहस विदेशी वित्त-पोषण के नियमन और नागरिक समाज की स्वायत्तता के बीच संतुलन की क्लासिक समस्या है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा ढाँचे के कुछ प्रावधान लागू ही नहीं हो पाए — राज्य स्तरीय 'निर्धारित प्राधिकरण' संपत्तियों के निहितीकरण के प्रावधान लागू नहीं कर सका और निहित संपत्तियों के प्रबंधन/निपटान के स्पष्ट नियम नहीं थे, जिससे संपत्तियाँ संस्थाओं के पास रहीं जबकि उनके बैंक खाते जमे रहे; इसलिए सरकार-नियुक्त प्राधिकरण को संपत्ति बेचने, उपयोग या हस्तांतरित करने की शक्ति प्रस्तावित है, क्योंकि "अनिश्चित काल तक मात्र अभिरक्षक" बने रहना अव्यावहारिक है। विधेयक जाँच शुरू करने से पहले केंद्र की पूर्व अनुमति और पूर्व अनुमति मार्ग से प्राप्त धन की प्राप्ति व उपयोग पर समय-सीमा तय करने का अधिकार भी देता है, क्योंकि दो मार्गों से लंबी अवधि तक बड़ी राशि लेकर नवीनीकरण जाँच से बचाव संभव था। दूसरी ओर, डीएमके, कांग्रेस और सपा के सांसदों ने अल्पसंख्यक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव की आशंका जताई, जबकि अध्यक्ष जायसवाल ने सरदार सरोवर बाँध और कुडनकुलम परियोजना के विरोध का हवाला देकर विदेशी वित्त-पोषित एनजीओ की भूमिका पर सवाल उठाया। आगे का रास्ता: विधेयक के भावी प्रभाव (prospective effect) पर स्पष्टता, संपत्ति निपटान की पारदर्शी प्रक्रिया व अपील का अवसर, और जेपीसी द्वारा मुख्यमंत्रियों तथा हितधारकों से व्यापक परामर्श।

मुख्य शब्द

एफसीआरए
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम — विदेश से चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों के पंजीकरण व निगरानी का कानून; सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून बताती है।
संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी)
दोनों सदनों के सांसदों की समिति; यहाँ 31 सदस्यीय समिति एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 की समीक्षा कर रही है।
निर्धारित/नामित प्राधिकरण
विधेयक में प्रस्तावित सरकार-नियुक्त प्राधिकरण, जो पंजीकरण समाप्त संगठनों की निहित संपत्तियों को बेच, उपयोग या हस्तांतरित कर सकेगा।
संपत्तियों का निहितीकरण (vesting of assets)
पंजीकरण रद्द/समाप्त होने पर संगठन की संपत्तियों का सरकारी प्राधिकरण में निहित होना; स्पष्ट नियम न होने से प्रावधान लागू नहीं हो सका।
पूर्व अनुमति मार्ग (prior permission)
विदेशी धन प्राप्ति का वह मार्ग जिसमें अलग अनुमति ली जाती है; नए विधेयक में इसके तहत धन प्राप्ति व उपयोग की समय-सीमा तय करने का प्रावधान।
2010 संशोधन
एफसीआरए में कड़े प्रावधान लाया गया — हर पाँच वर्ष में लाइसेंस नवीनीकरण और सरकार को लाइसेंस निलंबित करने की शक्ति।

अभ्यास प्रश्न

  1. एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधानों का परीक्षण कीजिए और बताइए कि विदेशी वित्त-पोषण के नियमन तथा नागरिक समाज की स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है।
  2. क्या विदेशी अंशदान का नियमन मुख्य रूप से 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का विषय है? स्रोत में दिए आँकड़ों और तर्कों के आलोक में चर्चा कीजिए।
  3. पंजीकरण समाप्त हो चुके संगठनों की संपत्तियों के निपटान का अधिकार सरकार-नियुक्त प्राधिकरण को देने के संभावित लाभ और जोखिम क्या हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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