पांच राज्यों और दिल्ली ने 422 मेगावाट किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए

हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली ने 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ₹15,624 करोड़ की अनुमानित लागत वाली 422 मेगावाट किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के कार्यान्वयन के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए। मुख्यमंत्रियों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए। उत्तराखंड-हिमाचल सीमा पर टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा बांध बनेगा, जिससे 97,000 हेक्टेयर की सिंचाई होगी। लागत का 90% केंद्र वहन करेगा। मुख्यमंत्री सुक्खू ने इसे राज्य की बड़ी जीत बताया।

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Five States and Delhi signed an agreement on September 15, 2026 for the 422 MW Kishau multipurpose project costing an estimated ₹15,624 crore. — Figures and date appear in the source; signing described as held in New Delhi in presence of Union Ministers.
  • The Centre will bear about 90% of the cost, with 10% shared by the States and UT as per the 1994 agreement. — Stated in the source without further documentation cited; internally consistent.
  • A 232.6-metre-high concrete gravity dam on the Tons river will store 1,562 million cubic metres, irrigate 97,000 hectares and generate 1,476 million units of hydropower. — Technical figures appear in the source, attributed in context to Union Home Minister Amit Shah's remarks.
  • Amit Shah said this is the tenth water dispute set to be resolved since Narendra Modi became Prime Minister, and Delhi will be the biggest beneficiary. — Directly attributed to Amit Shah; political claim not independently verifiable here.
  • CM Sukhu said Himachal will get 1,000 million units a year, likely worth more than ₹1,000 crore, and that the previous BJP government had agreed to a ₹800 crore state share. — Attributed to Sukhu in remarks to media; projection and political assertion, no counter-response included.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

छह सरकारों — जिनमें कांग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश भी शामिल है — को एक मंच पर हस्ताक्षर के लिए ले आना केंद्र के लिए संघीय समन्वय की राजनीतिक रूप से उपयोगी तस्वीर है। अमित शाह इसे "ऐतिहासिक" और प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में सुलझने वाला दसवाँ जल विवाद बताकर जल विवाद निपटारे को शासन की उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री सुक्खू इसी समझौते को राज्य की जीत बता रहे हैं — पिछली भाजपा सरकार द्वारा स्वीकार किए गए ₹800 करोड़ के हिस्से को ठुकराने का नतीजा। एक समझौता, दो अलग राजनीतिक कथानक।

  • लगभग 90% लागत केंद्र द्वारा उठाना ही वह राजनीतिक चिकनाई है जिसने राज्यों की वित्तीय आपत्तियाँ दूर कीं और हस्ताक्षर संभव बनाए।
  • शाह का यह कहना कि दिल्ली सबसे बड़ी लाभार्थी होगी, ऐसी राजधानी में आता है जहाँ अब भाजपा सत्ता में है — शहरी मतदाताओं के लिए पानी की गारंटी के रूप में पेश करना आसान।
  • सुक्खू का यह ज़ोर कि विस्थापन का बोझ हिमाचल पर पड़ेगा, संकेत देता है कि पुनर्वास और मुआवज़ा अगला स्थानीय राजनीतिक दबाव-बिंदु बनेगा।
  • "बिजली परियोजनाओं में राज्य का जायज़ हिस्सा" का नैरेटिव हिमाचल कांग्रेस को टकराव के बजाय मोलभाव से जीत का दावा करने की गुंजाइश देता है।
  • हस्ताक्षर केवल पहला चरण है; असली राजनीतिक परीक्षा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और धन प्रवाह के चरण में होगी।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि पुनर्वास की शर्तें और हिमाचल को मिलने वाला बिजली हिस्सा ज़मीन पर कैसे लागू होता है, और उस चरण में अंतर-राज्यीय या केंद्र-राज्य तनाव फिर उभरता है या नहीं।

यह खबर परियोजना की समय-सीमा, विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या या पुनर्वास पैकेज का ब्योरा स्थापित नहीं करती, और सुक्खू के राजस्व अनुमान राज्य सरकार का दावा हैं, स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

यमुना की सहायक टोंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना दशकों से लंबित थी, क्योंकि लागत-भागीदारी पर राज्यों में सहमति नहीं बन पा रही थी। 15 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली ने इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह 422 मेगावाट की परियोजना उत्तराखंड-हिमाचल सीमा पर बनेगी और इसकी अनुमानित लागत ₹15,624 करोड़ है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सुलझने वाला दसवां जल विवाद है।

मुख्य तथ्य

  • 15 सितंबर 2026 को पांच राज्यों (हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान) और दिल्ली ने 422 मेगावाट किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • परियोजना की अनुमानित लागत ₹15,624 करोड़ है; लगभग 90% वित्तीय भार भारत सरकार वहन करेगी।
  • शेष 10% लागत 1994 के समझौते के अनुसार भागीदार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश द्वारा वहन की जाएगी।
  • टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रैविटी बांध बनेगा, जिसकी जल भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन घन मीटर होगी।
  • परियोजना से 97,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ पनबिजली का उत्पादन होगा।
  • अमित शाह के अनुसार दिल्ली इस परियोजना की सबसे बड़ी लाभार्थी होगी और यह मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सुलझने वाला दसवां जल विवाद है।
  • मुख्यमंत्री सुक्खू के अनुसार लागत-भागीदारी पर आठ साल पुराना गतिरोध टूटा; पूर्व भाजपा सरकार ₹800 करोड़ राज्यांश देने को सहमत थी, जिसे उनकी सरकार ने अस्वीकार किया।
  • हिमाचल को परियोजना के विद्युत घटक से प्रति वर्ष 1000 मिलियन यूनिट हिस्सा मिलेगा, जो निर्माण के बाद संभवतः ₹1000 करोड़ से अधिक मूल्य का होगा।

समयरेखा

  1. 1994समझौता, जिसके अनुसार भागीदार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश के बीच 10% लागत का बंटवारा तय होगा।
  2. पिछले आठ वर्षपरियोजना की वित्तीय लागत वहन करने के मुद्दे पर गतिरोध; पूर्व भाजपा राज्य सरकार ₹800 करोड़ राज्यांश देने को सहमत हुई थी।
  3. 15 सितंबर 2026नई दिल्ली में अमित शाह और सी.आर. पाटिल की उपस्थिति में छह मुख्यमंत्रियों द्वारा किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर।
  4. 16 सितंबर 2026समाचार प्रकाशित (12:42 am IST)।

किसका दाँव

  • हिमाचल प्रदेश — मुख्यमंत्री सुक्खू के अनुसार राज्य को सबसे अधिक नुकसान—विस्थापन राज्य की आबादी का होगा; बदले में प्रति वर्ष 1000 मिलियन यूनिट बिजली हिस्सा।
  • दिल्ली — अमित शाह के अनुसार परियोजना की सबसे बड़ी लाभार्थी; मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • उत्तराखंड — बांध उत्तराखंड-हिमाचल सीमा पर टोंस नदी पर बनेगा; मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हस्ताक्षरकर्ता।
  • हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान — भागीदार राज्य—सिंचाई व जल हिस्से के लाभार्थी तथा 10% लागत में अंशदाता; मुख्यमंत्री सैनी, आदित्यनाथ, शर्मा हस्ताक्षरकर्ता।
  • केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय व जल शक्ति मंत्रालय) — लगभग 90% वित्तीय भार वहन करेगी; अंतरराज्यीय जल विवाद सुलझाने का श्रेय।
  • विस्थापित होने वाली आबादी — 232.6 मीटर ऊंचे बांध और 1,562 मिलियन घन मीटर जलाशय के कारण विस्थापन का सामना।

क्यों अहम है

यह समझौता उत्तर भारत के छह राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के बीच वर्षों पुराने जल-लागत विवाद को सुलझाकर 97,000 हेक्टेयर सिंचाई, 1,562 मिलियन घन मीटर भंडारण और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ बिजली का रास्ता खोलता है। दिल्ली जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्र के लिए यह पेयजल सुरक्षा का सवाल है, वहीं हिमाचल के लिए विस्थापन और मुआवजे का। यह दिखाता है कि केंद्र द्वारा 90% लागत उठाने से अंतरराज्यीय नदी परियोजनाओं का गतिरोध कैसे टूट सकता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना: 422 मेगावाट, टोंस नदी पर, उत्तराखंड-हिमाचल प्रदेश सीमा; अनुमानित लागत ₹15,624 करोड़।
  • बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर, कंक्रीट ग्रैविटी बांध; भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन घन मीटर।
  • सिंचाई क्षमता 97,000 हेक्टेयर; विद्युत उत्पादन 1,476 मिलियन यूनिट।
  • लागत बंटवारा: लगभग 90% केंद्र, 10% भागीदार राज्य/केंद्रशासित प्रदेश (1994 के समझौते के अनुसार)।
  • हस्ताक्षरकर्ता: हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली — 15 सितंबर 2026, नई दिल्ली।
  • अमित शाह के कथन अनुसार यह मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हल होने वाला दसवां जल विवाद।

मेन्स दृष्टिकोण

भारत में अंतरराज्यीय नदी परियोजनाएं अक्सर लागत-भागीदारी, जल-आवंटन और विस्थापन के प्रश्नों पर वर्षों अटकी रहती हैं; किशाऊ परियोजना का आठ वर्ष पुराना गतिरोध इसी प्रवृत्ति का उदाहरण था, जहां हिमाचल प्रदेश ने सीमित संसाधनों का हवाला देकर ₹800 करोड़ के राज्यांश से इनकार किया। केंद्र द्वारा लगभग 90% वित्तीय भार वहन करने के निर्णय ने सहमति का रास्ता खोला, और 1994 के समझौते के ढांचे में शेष 10% राज्यों व दिल्ली पर आया। परियोजना के लाभ असमान रूप से वितरित हैं — दिल्ली सबसे बड़ी लाभार्थी बताई गई है, जबकि विस्थापन का भार मुख्यतः हिमाचल की आबादी पर पड़ेगा, जिसकी भरपाई प्रति वर्ष 1000 मिलियन यूनिट बिजली हिस्से (संभावित ₹1000 करोड़ से अधिक मूल्य) से करने की बात है। आगे की राह में महत्वपूर्ण होगा कि 232.6 मीटर ऊंचे बांध के पुनर्वास पैकेज को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाए, लाभ-बंटवारे की शर्तें लिखित रूप में स्पष्ट रहें, और परियोजना निर्माण की लागत व समय-सीमा पर निगरानी हो — ताकि "ऐतिहासिक" समझौता कागज़ से आगे बढ़कर सिंचाई, पेयजल और स्वच्छ ऊर्जा के वादे पूरे कर सके।

मुख्य शब्द

बहुउद्देशीय परियोजना
ऐसी नदी परियोजना जो एक साथ सिंचाई, जल भंडारण/पेयजल और बिजली उत्पादन जैसे कई उद्देश्य पूरे करती है — किशाऊ इसका उदाहरण है।
कंक्रीट ग्रैविटी बांध
अपने भारी वजन से पानी के दबाव को रोकने वाला कंक्रीट बांध; किशाऊ में इसकी ऊंचाई 232.6 मीटर होगी।
टोंस नदी
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली नदी, जिस पर किशाऊ बांध बनाया जाएगा।
1994 का समझौता
वह पूर्ववर्ती करार जिसके अनुसार परियोजना की शेष 10% लागत भागीदार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश के बीच बंटेगी।
मिलियन यूनिट (MU)
बिजली उत्पादन मापने की इकाई; परियोजना 1,476 मिलियन यूनिट पनबिजली देगी, जिसमें हिमाचल का हिस्सा 1000 मिलियन यूनिट प्रति वर्ष।
जल शक्ति मंत्रालय
जल संसाधन व नदी विकास से संबंधित केंद्रीय मंत्रालय; हस्ताक्षर समारोह में मंत्री सी.आर. पाटिल उपस्थित रहे।

अभ्यास प्रश्न

  1. अंतरराज्यीय नदी परियोजनाओं में लागत-भागीदारी विवाद विकास को कैसे बाधित करते हैं? किशाऊ परियोजना समझौते के आलोक में परीक्षण करें।
  2. बड़े बांधों के लाभ और लागत विभिन्न राज्यों के बीच असमान रूप से बंटते हैं। किशाऊ परियोजना में हिमाचल प्रदेश की मुआवजे की मांग के संदर्भ में इस पर चर्चा करें।
  3. किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना की मुख्य विशेषताएं (क्षमता, लागत, सिंचाई व भंडारण) बताइए और उत्तर भारत की जल सुरक्षा में इसकी भूमिका स्पष्ट कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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