1960 में आज ही भारत और पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए
भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे। भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति फील्ड मार्शल मोहम्मद अयूब खान ने प्रतिनिधित्व किया। नौ वर्ष चली बातचीत में विश्व बैंक और उसके तत्कालीन अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने मध्यस्थता की। संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज भारत को तथा सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को आवंटित किए गए। 26 लोगों की जान लेने वाले अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि स्थगित कर दी।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- India and Pakistan signed the Indus Waters Treaty on September 19, 1960, after nine years of negotiations mediated by the World Bank under then-president Eugene Black. — Attributed in source to the World Bank; dates and names appear in the source text.
- Jawaharlal Nehru signed for India and President Field Marshal Mohammad Ayub Khan for Pakistan. — Stated in source without direct quotation or further citation.
- The treaty allocates the eastern rivers Ravi, Beas and Sutlej to India and the western rivers Indus, Jhelum and Chenab to Pakistan. — Attributed to the World Bank framework as described in the source.
- India put the treaty in abeyance after the April 2025 Pahalgam terror attack, which claimed 26 lives. — Figure and sequence appear in the source; no independent verification possible here.
- On August 31 India rejected the Permanent Court of Arbitration's order, calling the body 'illegally constituted'. — Directly quoted from a Ministry of External Affairs statement in the source.
विश्लेषकों की राय राय
1960 में नेहरू सरकार के दौर में हुई सिंधु जल संधि छह दशकों तक भारत-पाकिस्तान के बीच टिकी रहने वाली गिनी-चुनी व्यवस्थाओं में से एक थी। अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद इसे स्थगित रखना केवल सैन्य जवाब की जगह कूटनीतिक और आर्थिक दबाव के इस्तेमाल की रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है — और घरेलू राजनीति में इसका संदेश मजबूत है। हेग ट्रिब्यूनल के आदेश को अधिकारक्षेत्र से बाहर बताकर खारिज करते हुए नई दिल्ली ने इसे "संप्रभु निर्णय" के दायरे में रखा है, यानी बातचीत का विषय नहीं।
- 1960 की संधि को स्थगित करना सरकार को आतंकवाद के खिलाफ एक दिखने वाला, गैर-सैन्य जवाब देता है, जो घरेलू स्तर पर राजनीतिक रूप से उपयोगी है।
- खबर में राष्ट्रपति मुर्मू के इसे राष्ट्र और किसानों के हित का कदम बताने का उल्लेख संकेत देता है कि निर्णय को पंजाब, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा जैसे क्षेत्रों के लिए पेश किया जा रहा है।
- संधि नेहरू के कार्यकाल में हुई थी — इससे घरेलू राजनीति में यह बहस उठ सकती है कि यह अत्यधिक उदार रियायत थी या नहीं।
- पाकिस्तान की रणनीति जल सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाना रही है, जैसा 2016 में मध्यस्थता न्यायालय की मांग में दिखा, जबकि खबर के अनुसार विश्व बैंक की भूमिका सीमित और प्रक्रियात्मक है।
- ट्रिब्यूनल को "अवैध रूप से गठित" कहकर खारिज करना भविष्य में ऐसे अंतरराष्ट्रीय फैसलों पर भारत के रुख की मिसाल बनेगा।
किस पर नज़र रखें — जम्मू-कश्मीर में पनबिजली परियोजनाओं की रफ्तार, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के अगले कदम, और घरेलू चुनावी भाषणों में यह मुद्दा कितना प्रमुख रहता है — इन पर नजर रखें।
यह खबर यह स्पष्ट नहीं करती कि स्थगन का नदियों के वास्तविक प्रवाह या दोनों देशों के किसानों पर व्यावहारिक असर क्या होगा, और यह कब तक जारी रहेगा।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 9 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान ने विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल संधि (IWT) पर हस्ताक्षर किए थे। 1947 के विभाजन के बाद सिंधु बेसिन की नदी प्रणाली दो देशों के बीच बँट गई थी, जिसके जल-बँटवारे को सुलझाने के लिए नौ वर्ष तक बातचीत चली। संधि के तहत पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को आवंटित हुईं। अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 लोगों की जान गई, के बाद भारत ने इस संधि को स्थगित (abeyance में) रखा हुआ है।
मुख्य तथ्य
- सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए; भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति फील्ड मार्शल मोहम्मद अयूब खान।
- नौ वर्ष चली बातचीत में विश्व बैंक और उसके तत्कालीन अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई; विश्व बैंक संधि का सह-हस्ताक्षरकर्ता है।
- पहली (उद्घाटन) बैठकें 6 मई 1952 को अमेरिका में हुईं और अगले आठ वर्ष तक विभिन्न पहलुओं पर बातचीत चली।
- पूर्वी नदियाँ रावी, ब्यास, सतलुज भारत के अप्रतिबंधित उपयोग के लिए; पश्चिमी नदियाँ सिंधु, झेलम, चिनाब पाकिस्तान के उपयोग के लिए, निर्दिष्ट अधिकारों व दायित्वों के अधीन।
- केंद्रीय जल आयोग के सिंधु बेसिन संगठन के अनुसार सिंधु उपमहाद्वीप की सबसे पश्चिमी नदी प्रणाली है; सहायक नदियाँ- झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज।
- 2016 में पाकिस्तान ने किशनगंगा और रातले पनबिजली परियोजनाओं पर तदर्थ मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) की मांग की; भारत ने तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) की नियुक्ति मांगी।
- भारत ने 31 अगस्त को स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसने संधि स्थगित करने के भारत के निर्णय को रद्द किया था।
- विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह 'अवैध रूप से गठित' तथाकथित न्यायालय संधि की शर्तों के स्पष्ट उल्लंघन में विश्व बैंक द्वारा गठित किया गया और उसे भारत के संप्रभु निर्णयों पर टिप्पणी का कोई अधिकार नहीं।
समयरेखा
- 1947विभाजन के बाद लाखों लोगों की जीवनरेखा सिंधु बेसिन नदी प्रणाली भारत और पाकिस्तान के बीच अचानक विभाजित हो गई।
- 6 मई 1952अमेरिका में उद्घाटन बैठकें; इसके बाद आठ वर्ष तक विभिन्न पहलुओं पर बातचीत।
- 19 सितंबर 1960सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर; नेहरू और अयूब खान ने प्रतिनिधित्व किया।
- 2016पाकिस्तान ने किशनगंगा व रातले परियोजनाओं पर तदर्थ मध्यस्थता न्यायालय गठित करने को कहा; भारत ने तटस्थ विशेषज्ञ मांगा।
- दिसंबर 2016तत्कालीन विश्व बैंक समूह अध्यक्ष जिम योंग किम ने प्रक्रिया पर विराम (pause) की घोषणा की।
- मार्च 2022विश्व बैंक ने तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय के अध्यक्ष की नियुक्ति की प्रक्रिया फिर शुरू करने का निर्णय लिया।
- नवंबर 2022विश्व बैंक ने तटस्थ विशेषज्ञ और न्यायालय के अध्यक्ष के साथ दो अलग-अलग हैंड-ओवर बैठकें कीं।
- अप्रैल 2025जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला, 26 लोगों की मौत; भारत ने संधि को स्थगित रखा।
- 31 अगस्तभारत ने स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के अंतरिम उपायों संबंधी 'अवार्ड' को खारिज किया; स्थगन जारी रहने की पुष्टि।
किसका दाँव
- भारत सरकार / विदेश मंत्रालय — संधि को स्थगित रखने के संप्रभु निर्णय का बचाव; जम्मू-कश्मीर में पनबिजली परियोजनाओं पर काम तेज करना।
- पाकिस्तान — पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) के जल पर निर्भरता; किशनगंगा व रातले परियोजनाओं का विरोध।
- विश्व बैंक — संधि का सह-हस्ताक्षरकर्ता; भूमिका सीमित व प्रक्रियात्मक—तटस्थ विशेषज्ञ/मध्यस्थता न्यायालय के लिए व्यक्तियों का नामांकन।
- स्थायी मध्यस्थता न्यायालय / तथाकथित Court of Arbitration — भारत के स्थगन निर्णय पर आदेश दिया, जिसे भारत ने अवैध रूप से गठित बताकर खारिज किया।
- केंद्रीय जल आयोग का सिंधु बेसिन संगठन — सिंधु नदी प्रणाली व उसकी सहायक नदियों से जुड़ी तकनीकी निगरानी और जानकारी।
- किसान व बेसिन की आबादी — सिंधु बेसिन लाखों लोगों की आजीविका का आधार; राष्ट्रपति मुर्मू ने स्थगन को राष्ट्र व किसानों के हित में निर्णायक कदम कहा।
क्यों अहम है
सिंधु जल संधि छह दशक से भारत-पाकिस्तान के बीच सबसे टिकाऊ समझौतों में गिनी जाती रही—पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने इसे "बहुत निराशाजनक विश्व चित्र में एक उजला बिंदु" कहा था। पहलगाम हमले के बाद इसका स्थगन जल-बँटवारे को आतंकवाद से जोड़ते हुए द्विपक्षीय संबंधों का एक नया मोर्चा खोलता है। भारत का मध्यस्थता न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र को अस्वीकार करना संधि-विवाद निपटान तंत्र और विश्व बैंक की प्रक्रियात्मक भूमिका पर भी बड़े प्रश्न खड़े करता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- सिंधु जल संधि: 19 सितंबर 1960, हस्ताक्षरकर्ता—जवाहरलाल नेहरू (भारत), अयूब खान (पाकिस्तान), विश्व बैंक सह-हस्ताक्षरकर्ता।
- पूर्वी नदियाँ—रावी, ब्यास, सतलुज (भारत); पश्चिमी नदियाँ—सिंधु, झेलम, चिनाब (पाकिस्तान)।
- सिंधु उपमहाद्वीप की सबसे पश्चिमी नदी प्रणाली; सहायक नदियाँ—झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज (स्रोत: केंद्रीय जल आयोग, सिंधु बेसिन संगठन)।
- विवाद तंत्र: तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) और मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration); विश्व बैंक की भूमिका सीमित व प्रक्रियात्मक।
- विवादित परियोजनाएँ: किशनगंगा और रातले पनबिजली परियोजनाएँ (पाकिस्तान ने 2016 में आपत्ति उठाई)।
- अप्रैल 2025 पहलगाम आतंकी हमला (26 मृत) के बाद भारत ने संधि को 'abeyance' में रखा।
मेन्स दृष्टिकोण
1947 के विभाजन ने सिंधु बेसिन की एकीकृत नदी प्रणाली को दो संप्रभु राज्यों के बीच बाँट दिया, जिससे जल-बँटवारे का विवाद पैदा हुआ; नौ वर्ष की बातचीत और विश्व बैंक अध्यक्ष यूजीन ब्लैक की मध्यस्थता के बाद 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि ने पूर्वी नदियाँ भारत और पश्चिमी नदियाँ पाकिस्तान को आवंटित करके एक व्यावहारिक ढाँचा दिया, जिसमें कोई भी देश दूसरे को आवंटित नदियों के उपयोग से पूर्णतः वंचित नहीं है। किंतु संधि की विवाद-निपटान वास्तुकला में तनाव दिखा—2016 में पाकिस्तान ने किशनगंगा व रातले पर मध्यस्थता न्यायालय मांगा, भारत ने तटस्थ विशेषज्ञ, और संधि स्वयं यह तय नहीं करती कि कौन-सी प्रक्रिया प्राथमिक होगी; विश्व बैंक ने दिसंबर 2016 में विराम लगाया और मार्च–नवंबर 2022 में प्रक्रिया बहाल की। अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद भारत ने संधि को स्थगित रखा, 31 अगस्त को स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के आदेश को 'अवैध रूप से गठित' निकाय का बताकर खारिज किया और जम्मू-कश्मीर में पनबिजली परियोजनाओं पर काम तेज किया। आगे का रास्ता स्रोत में विस्तार से नहीं बताया गया; उत्तर में आतंकवाद-संबंधी सुरक्षा चिंताओं, संधि की संस्थागत वैधता और जल-उपयोग के अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को ही केंद्र में रखना चाहिए।
मुख्य शब्द
- सिंधु जल संधि (IWT)
- 1960 में भारत-पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित जल-बँटवारा ढाँचा, जिसका विश्व बैंक सह-हस्ताक्षरकर्ता है।
- Abeyance (स्थगन)
- संधि को अमल से रोककर रखने की स्थिति; भारत ने पहलगाम हमले के बाद IWT को इसी स्थिति में रखा।
- तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert)
- संधि के तहत तकनीकी 'differences' सुलझाने वाला व्यक्ति, जिसकी नियुक्ति में विश्व बैंक की प्रक्रियात्मक भूमिका है।
- मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration)
- संधि के 'disputes' के लिए गठित निकाय; भारत इसे अवैध रूप से गठित मानकर इसके अधिकार-क्षेत्र को खारिज करता है।
- किशनगंगा व रातले परियोजनाएँ
- भारत की पनबिजली परियोजनाएँ, जिन पर पाकिस्तान ने 2016 में संधि के प्रावधानों के तहत आपत्ति उठाई।
- सिंधु बेसिन संगठन
- केंद्रीय जल आयोग का संगठन, जो सिंधु नदी प्रणाली से संबंधित जानकारी देता है।
अभ्यास प्रश्न
- सिंधु जल संधि (1960) के जल-आवंटन ढाँचे और विवाद-निपटान तंत्र की व्याख्या कीजिए। विश्व बैंक की भूमिका किस अर्थ में 'सीमित और प्रक्रियात्मक' है?
- पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के भारत के निर्णय के कूटनीतिक और सामरिक निहितार्थों का परीक्षण कीजिए।
- क्या अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता निकायों के निर्णय संप्रभु निर्णयों पर लागू हो सकते हैं? भारत द्वारा मध्यस्थता न्यायालय के 'अवार्ड' को खारिज करने के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
