कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्थायी गुजारा भत्ता 2 करोड़ से 50 लाख किया
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महिला को मिला स्थायी गुजारा भत्ता 2 करोड़ रुपये से घटाकर 50 लाख रुपये कर दिया और पूर्व पति को दो बच्चों के लिए हर महीने 50,000 रुपये, यानी प्रत्येक बच्चे पर 25,000 रुपये देने का निर्देश दिया। जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण की बेंच ने विवाह टूटने तथा क्रूरता साबित होने का मानते हुए तलाक बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा, भत्ता संपत्ति बराबर करने का साधन नहीं; महिला स्वतंत्र आय वाली चिकित्सा पेशेवर है। फैसला 24 अगस्त 2026 को आया।
स्रोत
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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Karnataka HC reduced permanent alimony from Rs 2 crore to Rs 50 lakh — Attributed to the high court order described in the source; figures appear in source
- Judgment delivered on August 24, 2026 — Date stated in source without further attribution; appears to be a future/unusual date and should be checked by an editor
- Husband to pay Rs 25,000 per month per child, totalling Rs 50,000, rising by Rs 5,000 per child every year until majority — Figures appear in source as part of the court's direction
- Bench of Justice D K Singh and Justice H Shanthi Bhushan; family court relied on WhatsApp conversations — Named in source and attributed to the court record
- Mother granted exclusive physical custody with father allowed three-hour visitation on Saturdays and Sundays in her presence — Attributed to the court's directions in the source
विश्लेषकों की राय राय
ఇది న్యాయస్థాన తీర్పే అయినా, దాని రాజకీయ ప్రతిధ్వని చిన్నది కాదు. భరణం "ఆస్తుల సమానీకరణ" కాకూడదని, మహిళకు స్వతంత్ర ఆదాయం ఉందని ధర్మాసనం చెప్పిన తర్కం — కుటుంబ చట్టాల సంస్కరణలపై ఇప్పటికే జరుగుతున్న బహిరంగ చర్చకు కొత్త ఇంధనం అందిస్తుంది. మహిళా హక్కుల సంఘాలు, పురుషుల హక్కుల సంఘాలు రెండూ ఈ తీర్పులో తమకు అనుకూలమైన భాగాలను ఎంచుకుని ముందుకు తెచ్చే అవకాశం ఉంది.
- భరణం తగ్గింపు కారణంగా — స్వతంత్ర ఆదాయం ఉన్న మహిళలకు భరణం ఎంత ఉండాలన్న ప్రశ్న ఇప్పుడు రాజకీయ చర్చాంశంగా మారే అవకాశం ఉంది.
- క్రూరత్వం రుజువైందని, విడాకులను సమర్థించిన భాగం మహిళా సంఘాలకు అనుకూల అంశం; భరణం తగ్గింపు భాగం పురుషుల హక్కుల సంఘాలకు ఊతం.
- ఉమ్మడి పౌర స్మృతి, కుటుంబ చట్టాల సంస్కరణలపై పార్టీలు మాట్లాడేటప్పుడు ఇలాంటి తీర్పులు ఉదాహరణలుగా ఉపయోగపడతాయి — ఇది శాసనసభల పరిధిలోని విషయమన్న వాదన బలపడవచ్చు.
- పిల్లల పోషణ మొత్తాన్ని ఏటా పెంచే నిబంధన, తల్లికి పూర్తి భౌతిక సంరక్షణ ఇవ్వడం — సంరక్షణ హక్కులపై విధాన చర్చకు మరో కోణం.
- అయితే ఇది ఒక వ్యక్తిగత కేసు; ఇందులో ఏ పార్టీ, ఏ ప్రభుత్వం పక్షకారుగా లేదు — కాబట్టి ప్రత్యక్ష ఎన్నికల ప్రభావం పరిమితమే.
किस पर नज़र रखें — సుప్రీంకోర్టులో అప్పీలు దాఖలవుతుందా, మహిళా సంఘాలు లేదా పురుషుల హక్కుల సంఘాల నుంచి సంఘటిత స్పందన వస్తుందా — ఆ రెండూ ఈ తీర్పు రాజకీయ చర్చగా మారుతుందా లేదా అన్నది నిర్ణయిస్తాయి.
ఈ కథనం ఎవరైనా రాజకీయ నాయకుడు, పార్టీ లేదా ప్రభుత్వం ఈ తీర్పుపై స్పందించారని చెప్పలేదు; అప్పీలు, చట్ట సవరణ లేదా విధాన మార్పు గురించి ఎలాంటి సమాచారం ఇందులో లేదు.
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक तलाक मामले में फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए 2 करोड़ रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते को घटाकर 50 लाख रुपये कर दिया, लेकिन तलाक और क्रूरता के निष्कर्ष को बरकरार रखा। दंपति 2011 में मंगलुरु में विवाहित हुए, बाद में ब्रिटेन चले गए और उनकी दो बेटियां हैं। पत्नी ने शारीरिक-मानसिक क्रूरता, करियर और उच्च शिक्षा में बाधा तथा मानसिक बीमारी के आरोपों का हवाला देते हुए तलाक मांगा था। हाईकोर्ट ने कहा कि स्थायी गुजारा भत्ता उचित वित्तीय सुरक्षा देने के लिए है, पक्षकारों की संपत्ति बराबर करने के लिए नहीं। फैसला 24 अगस्त 2026 को आया।
मुख्य तथ्य
- कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्थायी गुजारा भत्ता 2 करोड़ रुपये से घटाकर 50 लाख रुपये किया; फैसला 24 अगस्त 2026 को सुनाया गया।
- 50 लाख रुपये तीन महीने में देने होंगे, अन्यथा डिक्री की तारीख से भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा।
- पूर्व पति को प्रत्येक बच्चे के लिए 25,000 रुपये यानी कुल 50,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण, शिक्षा व चिकित्सा हेतु देने का निर्देश।
- बच्चों के वयस्क होने तक हर वर्ष प्रत्येक बच्चे के लिए राशि में 5,000 रुपये प्रति माह की वृद्धि होगी।
- फैमिली कोर्ट ने 2 करोड़ भत्ता तथा दोनों बच्चों के लिए 25,000 रुपये मासिक (हर दो वर्ष में 5,000 रुपये वृद्धि) दिया था।
- फैमिली कोर्ट ने मुख्य रूप से दंपति के व्हाट्सएप संवादों पर भरोसा किया, जिनमें पति द्वारा मारपीट की स्वीकारोक्ति और पश्चाताप दिखा।
- कोर्ट ने कहा कि उचित चिकित्सा साक्ष्य के बिना पत्नी की मानसिक बीमारी के आरोप मानसिक क्रूरता के समान हैं।
- मां को बच्चों की विशेष (एक्सक्लूसिव) भौतिक अभिरक्षा; पिता को शनिवार-रविवार तीन-तीन घंटे मां की उपस्थिति में मुलाकात की अनुमति।
समयरेखा
- 2011कॉलेज के सहपाठी रहे दंपति का मंगलुरु में विवाह; बाद में वे ब्रिटेन चले गए।
- तारीख स्रोत में नहींदंपति ने काउंसलिंग कराई और कुछ समय तक संबंध फिर शुरू किया, लेकिन विवाद जारी रहे।
- तारीख स्रोत में नहींफैमिली कोर्ट ने तलाक दिया, 2 करोड़ रुपये स्थायी गुजारा भत्ता और 25,000 रुपये मासिक बाल भरण-पोषण तय किया।
- 24 अगस्त 2026कर्नाटक हाईकोर्ट ने तलाक बरकरार रखा, भत्ता 50 लाख किया और बाल भरण-पोषण 50,000 रुपये मासिक किया।
किसका दाँव
- पत्नी (योग्य चिकित्सा पेशेवर) — तलाक और क्रूरता का निष्कर्ष बरकरार रहा, बच्चों की विशेष अभिरक्षा मिली, लेकिन स्थायी भत्ता 2 करोड़ से 50 लाख घटा।
- पूर्व पति — एकमुश्त भुगतान का बोझ घटा, पर प्रति माह 50,000 रुपये बाल भरण-पोषण और वार्षिक वृद्धि की जिम्मेदारी।
- दो बेटियां — भरण-पोषण, शिक्षा, चिकित्सा की सुरक्षा तथा माता-पिता दोनों से स्वस्थ संबंध बनाए रखने का निर्देश।
- जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण की बेंच — साक्ष्य को संपूर्ण वैवाहिक संबंध के रूप में आंकने और भत्ता निर्धारण के सिद्धांत तय करना।
- फैमिली कोर्ट — उसका तलाक-निर्णय कायम रहा पर भत्ते की मात्रा में संशोधन हुआ।
- पति के वृद्ध माता-पिता — पति की आय, देनदारियों और उनके प्रति जिम्मेदारी को कोर्ट ने भत्ता तय करते समय ध्यान में रखा।
क्यों अहम है
यह फैसला स्थायी गुजारा भत्ते की कसौटी स्पष्ट करता है — यह उचित वित्तीय सुरक्षा देने का साधन है, पक्षकारों की संपत्ति बराबर करने का नहीं, विशेषकर जब पत्नी की स्वतंत्र आय हो। साथ ही यह दिखाता है कि डिजिटल साक्ष्य (व्हाट्सएप चैट) और चिकित्सा साक्ष्य के बिना मानसिक बीमारी के आरोप क्रूरता के निर्धारण में निर्णायक हो सकते हैं। सीमापार (भारत-ब्रिटेन) वैवाहिक विवादों और बच्चों की अभिरक्षा में संतुलित व्यवस्था का यह उदाहरण है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- कर्नाटक हाईकोर्ट की बेंच: जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण; फैसला 24 अगस्त 2026।
- स्थायी गुजारा भत्ता 2 करोड़ से 50 लाख; तीन माह में भुगतान न होने पर 6% वार्षिक ब्याज।
- बाल भरण-पोषण: प्रत्येक बच्चे 25,000 रुपये मासिक, कुल 50,000 रुपये; हर वर्ष 5,000 रुपये प्रति बच्चा वृद्धि।
- कोर्ट का सिद्धांत: भत्ता उचित वित्तीय सुरक्षा देता है, पक्षकारों की संपत्ति बराबर नहीं करता।
- चिकित्सा साक्ष्य के अभाव में पत्नी पर मानसिक बीमारी का आरोप मानसिक क्रूरता माना गया।
- अभिरक्षा: मां को विशेष भौतिक अभिरक्षा; पिता को शनि-रवि तीन घंटे, मां की उपस्थिति में मुलाकात।
मेन्स दृष्टिकोण
यह मामला वैवाहिक विवादों में क्रूरता के निर्धारण और स्थायी गुजारा भत्ते की गणना के दो अलग-अलग प्रश्नों को अलग करता है। हाईकोर्ट ने माना कि क्रूरता को अलग-अलग घटनाओं में बांटकर नहीं, बल्कि संपूर्ण वैवाहिक संबंध और पक्षकारों के आचरण के सामूहिक प्रभाव के रूप में देखा जाना चाहिए; काउंसलिंग के बाद भी विवाद जारी रहना और भारत तथा ब्रिटेन में लंबा मुकदमेबाजी संबंध के टूटने का संकेत था। भत्ते के प्रश्न पर कोर्ट ने पत्नी की योग्यता एवं स्वतंत्र आय, तथा पति की आय, संपत्ति, देनदारियां, बच्चों व वृद्ध माता-पिता की जिम्मेदारी को तौलकर राशि घटाई — यह रेखांकित करते हुए कि भत्ता संपत्ति के बराबरीकरण का उपकरण नहीं है। व्यापक निहितार्थ: व्हाट्सएप जैसे डिजिटल साक्ष्य की बढ़ती भूमिका, बिना चिकित्सकीय आधार पर मानसिक बीमारी के आरोपों की गंभीरता, और बच्चों के हित में संरचित अभिरक्षा-मुलाकात व्यवस्था। आगे का रास्ता कोर्ट के शब्दों में निहित है कि विवाह साथ, विश्वास और भावनात्मक सुरक्षा देता है और उसे लगातार मुकदमेबाजी व आरोप-प्रत्यारोप का स्रोत नहीं बनना चाहिए; इसलिए समयबद्ध निपटारा, बाल-केंद्रित दृष्टिकोण और मुद्रास्फीति के अनुरूप स्वचालित वृद्धि जैसे उपाय (जैसे हर वर्ष 5,000 रुपये की वृद्धि) व्यावहारिक संतुलन देते हैं।
मुख्य शब्द
- स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony)
- तलाक के बाद एकमुश्त या नियमित रूप से दी जाने वाली राशि, जिसका उद्देश्य कोर्ट के अनुसार उचित वित्तीय सुरक्षा देना है।
- मानसिक क्रूरता
- ऐसा आचरण, जैसे उचित चिकित्सा साक्ष्य बिना जीवनसाथी पर मानसिक बीमारी का आरोप, जिसे कोर्ट ने तलाक के आधार के रूप में माना।
- विवाह का टूटना (Breakdown of marriage)
- कोर्ट का निष्कर्ष कि सुलह प्रयासों के बावजूद संबंध बिगड़ चुका था और विवाद समाप्त नहीं हुए।
- विशेष भौतिक अभिरक्षा
- बच्चों का दैनिक निवास व देखभाल एक अभिभावक (यहां मां) के पास होना, दूसरे को मुलाकात का अधिकार।
- विजिटेशन राइट्स
- गैर-अभिरक्षक अभिभावक को बच्चों से मिलने का अधिकार; यहां शनि-रवि तीन घंटे, मां की उपस्थिति में।
- फैमिली कोर्ट
- वैवाहिक व पारिवारिक विवादों की सुनवाई करने वाली अदालत, जिसने पहले 2 करोड़ भत्ता तय किया था।
अभ्यास प्रश्न
- क्या स्थायी गुजारा भत्ता तय करते समय पत्नी की स्वतंत्र आय को निर्णायक कारक बनाया जाना चाहिए? कर्नाटक हाईकोर्ट के 24 अगस्त 2026 के फैसले के आलोक में परीक्षण करें।
- वैवाहिक विवादों में व्हाट्सएप जैसे डिजिटल साक्ष्य की भूमिका और उसकी सीमाओं पर चर्चा करें।
- बच्चों की अभिरक्षा और मुलाकात व्यवस्था तय करते समय अदालतें किन हितों को संतुलित करती हैं? इस मामले के उदाहरण से समझाएं।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।