पीएमएलए में एकल सदस्य निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से सवाल किए
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से सवाल किया कि पीएमएलए अधिनिर्णय प्राधिकरण का एकल सदस्य संपत्ति कुर्की के मामलों का निर्णय कैसे कर सकता है। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूछा कि वैधानिक 180 दिन की अवधि में 3,000-5,000 मामले निपटाने पर वास्तविक विवेक प्रयोग होगा या केवल हस्ताक्षर। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना वाली पीठ ने फैसला सुरक्षित रखते हुए ईडी को कुर्की आदेशों का विवरण देने को कहा। ईडी ने 2024-25 में 461 आदेश बताए।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- A bench led by CJI Surya Kant, with justices Joymalya Bagchi and V Mohana, asked whether a single member can apply mind to 3,000-5,000 cases in six months — Attributed in source to the bench during the hearing; quote appears in source
- Petitioner counsel Gopal Sankaranarayanan cited website data showing 8,851 cases initiated by ED, only 60 reaching trial, and over 3,000 attachment orders — Attributed to named senior advocate citing the authority's website; figures appear in source
- ASG Anil Kaushik said only 461 attachment orders were issued between April 1, 2024 and March 31, 2025 — Attributed to the ED's counsel in source; disputes petitioners' figures
- The court reserved judgment and directed ED to file a note within a week with attachment and disposal data — Stated as court direction in source; no order copy cited
- Karvy Realty (India) Ltd has challenged a 2024 Telangana High Court ruling upholding single-member adjudication under Section 8 of PMLA — Case detail as described in source; not independently verified
विश्लेषकों की राय राय
ऊपर से यह ट्रिब्यूनल के गठन से जुड़ा तकनीकी सवाल लगता है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह ईडी की शक्तियों पर चल रही लंबी लड़ाई के बीचोंबीच है। सुप्रीम कोर्ट का यह पूछना कि क्या एक ही सदस्य — वह भी संभवतः न्यायिक अनुभव के बिना — संपत्ति कुर्की की पुष्टि कर सकता है, विपक्ष की उस पुरानी शिकायत को संस्थागत वजन देता है कि प्रक्रिया ही सजा बन जाती है। दूसरी ओर ईडी का पक्ष भी कमजोर नहीं है: पीएमएलए की धारा 6 एक या दो सदस्यीय बेंच की अनुमति देती है, और उसने याचिकाकर्ताओं के आंकड़ों को खारिज करते हुए 2024-25 में केवल 461 कुर्की आदेश बताए।
- कोर्ट की चिंता निर्णय की गुणवत्ता पर है, ईडी की मंशा पर नहीं — पर इसकी राजनीतिक गूंज कानूनी सवाल से कहीं तेज होगी।
- असली मुद्दा यह है कि विजय मदनलाल चौधरी (2022) में पीएमएलए को वैध ठहराते समय कोर्ट ने जिन सुरक्षा उपायों का भरोसा किया था, वे व्यवहार में काम कर रहे हैं या नहीं।
- विपक्षी दल इस सुनवाई को अपनी पुरानी शिकायतों की पुष्टि के रूप में पेश कर सकते हैं, जबकि सरकार पक्ष इसे एक सांविधिक निकाय से जुड़ा प्रक्रियात्मक प्रश्न बता सकता है।
- आंकड़ों की टकराहट — 3,000 से अधिक कुर्की आदेश बनाम ईडी के 461 — ही राजनीतिक कथानक तय करेगी, क्योंकि पूरा बोझ-संबंधी तर्क इसी पर टिका है।
- फैसला सुरक्षित रखकर भी आंकड़े मांगना बताता है कि कोर्ट केवल सैद्धांतिक घोषणा नहीं, व्यावहारिक समाधान की तलाश में हो सकता है।
किस पर नज़र रखें — एक हफ्ते में आने वाला ईडी का डेटा नोट और उसके बाद का फैसला देखें — क्या कोर्ट अधिनिर्णयन प्राधिकरण में न्यायिक सदस्य अनिवार्य करेगा या धारा 6 को यथावत छोड़ेगा।
यह खबर यह स्थापित नहीं करती कि ईडी की कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है, और कोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया है — ये सुनवाई के दौरान उठाए गए सवाल भर हैं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत ईडी संपत्तियों की अस्थायी कुर्की करता है, जिसकी पुष्टि अधिनिर्णय प्राधिकरण (एडजुडिकेटिंग ऑथोरिटी) को वैधानिक 180 दिन की अवधि में करनी होती है। सवाल यह है कि क्या इस प्राधिकरण का एकल सदस्य — विशेषकर वह जिसे विधिक अनुभव न हो — धारा 8 के तहत कुर्की की पुष्टि कर सकता है। तेलंगाना उच्च न्यायालय के 2024 के फैसले ने इसकी अनुमति दी थी, जिसे मेसर्स कार्वी रियल्टी (इंडिया) लि. ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
मुख्य तथ्य
- सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने पूछा — "वास्तविक विवेक प्रयोग होगा या केवल निर्धारित जगह पर हस्ताक्षर?"
- पीठ ने कहा कि छह महीने में 3,000-5,000 मामले देखने का दबाव प्राधिकरण पर पड़ता है, जिससे शक्ति भ्रामक (illusory) हो सकती है।
- पीएमएलए की धारा 6 में अधिनिर्णय प्राधिकरण में एक अध्यक्ष और विधि, प्रशासन या वित्त में विशेषज्ञता वाले दो अन्य सदस्य का प्रावधान है; अध्यक्ष विशिष्ट परिस्थितियों में एक या दो सदस्यीय पीठ गठित कर सकता है।
- याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने प्राधिकरण की वेबसाइट के आंकड़े दिए — ईडी ने 8,851 मामले शुरू किए, जिनमें से केवल 60 मुकदमे तक पहुंचे; 3,000 से अधिक कुर्की आदेश।
- अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने कहा कि 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 के बीच केवल 461 कुर्की आदेश जारी हुए।
- 2013 की पीएमएलए अधिनिर्णय प्राधिकरण विनियमावली का विनियम 26(2) कहता है कि आदेश के प्रत्येक पृष्ठ पर अध्यक्ष और एक सदस्य के हस्ताक्षर होने चाहिए।
- कोर्ट ने कहा कि कुर्की के गंभीर सिविल परिणाम हैं — कब्जे और संपत्ति में प्रवेश के अधिकार पर असर; यह नियमित प्रशासनिक कार्य नहीं है।
- पीठ ने ईडी को एक सप्ताह में नोट दाखिल कर कुर्की आदेशों की संख्या और चुनौतियों के निपटारे में लगे समय का विवरण देने का निर्देश दिया।
समयरेखा
- 2022विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, अधिनिर्णय तंत्र में निहित सुरक्षा उपायों का संज्ञान लेते हुए।
- 2024तेलंगाना उच्च न्यायालय ने कहा कि एकल सदस्यीय अधिनिर्णय प्राधिकरण धारा 8 के तहत शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, चाहे उस सदस्य को विधिक अनुभव न हो।
- 1 अप्रैल 2024 – 31 मार्च 2025ईडी के अनुसार इस अवधि में 461 कुर्की आदेश जारी किए गए।
- मंगलवार (सुनवाई का दिन)सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से सवाल किए, फैसला सुरक्षित रखा और एक सप्ताह में आंकड़ों का नोट मांगा।
किसका दाँव
- प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) — पीएमएलए के तहत अस्थायी कुर्की की शक्ति और एकल सदस्यीय पुष्टि तंत्र का बचाव; आंकड़े प्रस्तुत करने का निर्देश।
- पीएमएलए अधिनिर्णय प्राधिकरण — इसकी संरचना, विधिक सदस्य की आवश्यकता और 180 दिन में बड़े मामलों के बोझ पर कार्यक्षमता सवालों के घेरे में।
- मेसर्स कार्वी रियल्टी (इंडिया) लि. व अन्य याचिकाकर्ता — तेलंगाना उच्च न्यायालय के 2024 के फैसले को चुनौती; संपत्ति कुर्की पर स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग।
- सुप्रीम कोर्ट की पीठ (सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस बागची, जस्टिस मोहना) — यह तय करना कि विधिक अनुभव के बिना एकल सदस्य कुर्की की पुष्टि कर सकता है या नहीं।
- कुर्की से प्रभावित संपत्ति स्वामी — कब्जे और संपत्ति में प्रवेश के अधिकार पर सीधा असर; निष्पक्ष व शीघ्र अधिनिर्णय पर निर्भरता।
क्यों अहम है
पीएमएलए के तहत संपत्ति कुर्की अभियोजन का \"हृदय\" है और इसके गंभीर सिविल परिणाम होते हैं, इसलिए पुष्टि की प्रक्रिया ईडी की शक्ति पर एक स्वतंत्र जांच मानी जाती है। यदि एकल, गैर-विधिक सदस्य 180 दिन में हजारों मामले निपटाता है तो यह जांच औपचारिकता बनकर रह सकती है। मामले का फैसला अधिनिर्णय प्राधिकरणों की संरचना, शक्तियों के पृथक्करण और कार्यपालिका से स्वतंत्रता पर असर डालेगा।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- पीएमएलए की धारा 6: अधिनिर्णय प्राधिकरण — अध्यक्ष + विधि/प्रशासन/वित्त में विशेषज्ञता वाले दो सदस्य; एक या दो सदस्यीय पीठ का प्रावधान।
- पीएमएलए की धारा 8: कुर्की आदेशों की पुष्टि से संबंधित अधिनिर्णय प्रक्रिया।
- अस्थायी कुर्की की पुष्टि के लिए वैधानिक समय-सीमा: 180 दिन।
- विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022): सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी।
- पीएमएलए अधिनिर्णय प्राधिकरण विनियमावली, 2013 का विनियम 26(2): आदेश के हर पृष्ठ पर अध्यक्ष और एक सदस्य के हस्ताक्षर।
- ईडी का आंकड़ा: 2024-25 में 461 कुर्की आदेश; याचिकाकर्ताओं के अनुसार 8,851 मामले शुरू, 60 मुकदमे तक पहुंचे।
मेन्स दृष्टिकोण
पीएमएलए के तहत अस्थायी कुर्की की पुष्टि करने वाला अधिनिर्णय प्राधिकरण, विजय मदनलाल चौधरी (2022) में उल्लिखित सुरक्षा उपायों की श्रृंखला का अहम हिस्सा है; इसलिए प्रश्न यह है कि क्या विधिक अनुभव के बिना एकल सदस्य 180 दिन की वैधानिक सीमा में हजारों मामलों में \"विवेक का वास्तविक प्रयोग\" कर सकता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वैधानिक योजना में न्यायिक तत्व अंतर्निहित है, विनियम 26(2) दो हस्ताक्षरों की अपेक्षा करता है, कार्यवाही में साक्ष्य दर्ज होता है और उसमें न्यायालय जैसे लक्षण हैं — अतः विधिक सदस्य के अभाव से शक्तियों के पृथक्करण और कार्यपालिका से स्वतंत्रता पर प्रश्न उठते हैं। ईडी का बचाव है कि धारा 6 विशिष्ट परिस्थितियों में एक या दो सदस्यीय पीठ की अनुमति देती है, हर मामला जटिल विधि-प्रश्न नहीं उठाता, और प्रावधानों को सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ा जाना चाहिए; उसने 3,000 आदेशों के आंकड़े को भी विवादित बताते हुए 2024-25 में 461 आदेश बताए। आगे का रास्ता अदालत के आदेश पर निर्भर है — स्रोत में कोई नीति-समाधान नहीं बताया गया; अदालत ने कुर्की आदेशों की संख्या और निपटारे में लगे समय पर आंकड़े मांगे हैं, यह रेखांकित करते हुए कि संपत्ति से जुड़े मामलों का शीघ्र और सारगर्भित निर्णय आवश्यक है।
मुख्य शब्द
- पीएमएलए
- धन शोधन निवारण अधिनियम — जिसके तहत ईडी संपत्ति की कुर्की सहित कार्रवाई करता है।
- अधिनिर्णय प्राधिकरण (Adjudicating Authority)
- पीएमएलए की धारा 6 के तहत गठित निकाय जो ईडी की अस्थायी कुर्की की पुष्टि पर निर्णय करता है।
- अस्थायी कुर्की (Provisional Attachment)
- ईडी का आदेश जो संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगाता है; कोर्ट के अनुसार इसके कब्जे व प्रवेश अधिकार पर सिविल परिणाम होते हैं।
- विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022)
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिसने पीएमएलए की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी, अधिनिर्णय तंत्र के सुरक्षा उपायों का संज्ञान लेते हुए।
- विनियम 26(2), 2013
- पीएमएलए अधिनिर्णय प्राधिकरण विनियमावली का प्रावधान जिसके तहत आदेश के हर पृष्ठ पर अध्यक्ष और एक सदस्य के हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
- 180 दिन की वैधानिक अवधि
- वह समय-सीमा जिसमें अधिनिर्णय प्राधिकरण को कुर्की मामलों का निर्णय करना होता है।
अभ्यास प्रश्न
- पीएमएलए के तहत संपत्ति कुर्की की पुष्टि करने वाले अधिनिर्णय प्राधिकरण में न्यायिक सदस्य की अनिवार्यता के पक्ष और विपक्ष के तर्कों का परीक्षण कीजिए।
- क्या 180 दिन की वैधानिक समय-सीमा अधिनिर्णय की गुणवत्ता को कमजोर कर सकती है? विवेक के प्रयोग और शीघ्र न्याय के बीच संतुलन पर चर्चा कीजिए।
- विजय मदनलाल चौधरी (2022) में उल्लिखित "अंतर्निहित सुरक्षा उपायों" के आलोक में एकल सदस्यीय पीठ की वैधता पर टिप्पणी कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
