एनसीएलटी, एनसीएलएटी की खराब बुनियादी सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और अपीलीय एनसीएलएटी में बेहद अपर्याप्त बुनियादी ढांचे तथा बड़ी संख्या में रिक्तियों को अस्वीकार्य बताया, जहां रोज हजारों करोड़ रुपये के दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) मामले आते हैं। सीजेआई सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की पीठ ने कहा कि ये न्यायाधिकरण सरकार की जीवनरेखा हैं, यहीं राष्ट्रीयकृत बैंकों और अधोसंरचना परियोजनाओं की जांच होती है। एनसीएलटी बार एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव सेन ने कहा कि छत से रिसाव, सीलन और रिक्तियों के कारण दिल्ली की अधिकतर बेंच आधा दिन ही बैठती हैं।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (4)
  • Supreme Court said infrastructure and vacancies at NCLT and NCLAT are unacceptable — Attributed in source to a bench of CJI Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana.
  • The tribunals daily handle IBC matters involving thousands of crores of rupees — Stated in source as part of the court's observation; no figures or data cited.
  • Leaking roofs, seepage and vacancies have restricted business hours at the Delhi NCLT building, with most benches sitting half a day — Attributed to senior advocate Sanjiv Sen for the NCLT Bar Association; source notes he 'claimed' the staff shortage.
  • CJI asked how an institution can function without buildings, staff, judgment writers and adequate technology — Direct quote attributed to the CJI in the source.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह खबर असल में टपकती छतों की नहीं, बल्कि आर्थिक प्रशासन में सरकार की प्राथमिकताओं पर सुप्रीम कोर्ट की राजनीतिक टिप्पणी है। जब दिवालिया कानून (आईबीसी) को सरकार अपने बड़े सुधारों में गिनाती है, तब उसी सुधार को लागू करने वाले ट्रिब्यूनलों में इमारत, सदस्य और स्टाफ की कमी पर अदालत की सार्वजनिक नाराजगी एक असहज विरोधाभास है। पीठ ने इन ट्रिब्यूनलों को "सरकार की जीवनरेखा" कहकर मांग को न्यायपालिका की ख्वाहिश नहीं, बल्कि सरकार के ही हित से जोड़ दिया — जिसका जवाब देना कठिन है।

  • रिक्तियां भरना और बुनियादी ढांचे के लिए धन देना पूरी तरह कार्यपालिका का काम है, इसलिए सरकार के पास जिम्मेदारी टालने की गुंजाइश कम है।
  • ट्रिब्यूनलों की नियुक्ति और स्वतंत्रता पर न्यायपालिका-कार्यपालिका के पुराने टकराव का यह नया अध्याय है, पर इस बार मुद्दा संवैधानिक बहस नहीं, व्यावहारिक अव्यवस्था है।
  • बार एसोसिएशन का यह दावा सही निकले कि ज्यादातर बेंच आधे दिन ही बैठती हैं, तो देरी की कीमत बैंकों और कर्जदाताओं को चुकानी पड़ेगी — यह आर्थिक विश्वसनीयता का सवाल बन जाएगा।
  • सरकार के पक्ष में भी तर्क है: नियुक्ति प्रक्रिया और भवन आवंटन की धीमी, ढांचागत दिक्कतें — हालांकि इस खबर में सरकार का जवाब दर्ज नहीं है।
  • राजनीतिक रूप से, आलोचना अदालत से आने के कारण विपक्ष को "संस्थाएं कमजोर की जा रही हैं" वाली दलील का तैयार आधार मिल सकता है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि अदालत रिक्तियां भरने और इमारतों को सुधारने पर सरकार से समयबद्ध हलफनामा मांगती है या नहीं, और वित्त व कॉरपोरेट मामलों के विभाग क्या प्रतिक्रिया देते हैं।

यह खबर रिक्तियों की वास्तविक संख्या, सरकार का स्पष्टीकरण या अदालत का कोई ठोस आदेश स्थापित नहीं करती — अभी सिर्फ बार एसोसिएशन की दलीलें और पीठ की मौखिक टिप्पणियां हैं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 2 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) तथा कंपनी मामलों का निपटारा करने वाले प्रमुख न्यायाधिकरण हैं, जहां रोज हजारों करोड़ रुपये के मामले आते हैं। एनसीएलटी बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा कि ये न्यायाधिकरण जीर्ण-शीर्ण इमारतों, खराब बुनियादी ढांचे और सदस्यों के बड़ी संख्या में रिक्त पदों के कारण ठीक से काम नहीं कर पा रहे। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को अस्वीकार्य बताते हुए सरकार से बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर सवाल किया।

मुख्य तथ्य

  • सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एनसीएलटी और एनसीएलएटी के बेहद अपर्याप्त बुनियादी ढांचे तथा बड़ी संख्या में रिक्तियों को 'अस्वीकार्य' करार दिया।
  • सुनवाई करने वाली पीठ में सीजेआई सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल थे।
  • कोर्ट ने कहा कि ये दोनों न्यायाधिकरण रोज आईबीसी के हजारों करोड़ रुपये के मामलों से निपटते हैं।
  • पीठ के अनुसार, 'ये अब सरकार की जीवनरेखा हैं'; सभी राष्ट्रीयकृत बैंक, बैंकिंग क्षेत्र और अधोसंरचना परियोजनाएं इन्हीं न्यायाधिकरणों के समक्ष जांच का विषय हैं।
  • एनसीएलटी बार एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव सेन ने कहा कि न्यायाधिकरण जीर्ण-शीर्ण इमारतों से चल रहे हैं और सदस्यों के पद बड़ी संख्या में रिक्त हैं।
  • सेन के अनुसार छत से रिसाव और लगातार सीलन तथा रिक्तियों के कारण दिल्ली की एनसीएलटी इमारत में कामकाजी घंटे सीमित हो गए हैं और अधिकतर बेंच आधा दिन ही बैठती हैं।
  • सेन ने कहा कि सहायक कर्मचारियों की गंभीर कमी उपलब्ध सदस्यों के न्यायनिर्णयन कार्य में बाधा बन रही है।
  • सीजेआई ने कहा, 'बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध न कराने पर कोई संस्था कैसे काम करेगी? आपके पास इमारतें नहीं, स्टाफ नहीं, जजमेंट राइटर नहीं, पर्याप्त तकनीकी समावेश नहीं।'

समयरेखा

  1. सोमवार (स्रोत में तारीख नहीं दी गई)एनसीएलटी बार एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव सेन ने सुप्रीम कोर्ट में बुनियादी ढांचे और रिक्तियों का मुद्दा उठाया।
  2. उसी सुनवाई मेंसीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने स्थिति को अस्वीकार्य बताया और सरकार से बुनियादी सुविधाओं पर सवाल किया।

किसका दाँव

  • एनसीएलटी और एनसीएलएटी — जीर्ण-शीर्ण इमारतों, सदस्यों की रिक्तियों और स्टाफ की कमी के कारण न्यायनिर्णयन क्षमता प्रभावित।
  • सुप्रीम कोर्ट (सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस वी मोहना) — न्यायाधिकरणों के कामकाज और बुनियादी सुविधाओं पर सरकार से जवाबदेही मांग रही है।
  • केंद्र सरकार — इमारतें, स्टाफ, जजमेंट राइटर और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पर सवाल उठे।
  • राष्ट्रीयकृत बैंक और बैंकिंग क्षेत्र — इनके मामलों की जांच इन्हीं न्यायाधिकरणों में होती है; देरी से वसूली और समाधान प्रभावित।
  • अधोसंरचना परियोजनाएं और आईबीसी वादकारी — हजारों करोड़ रुपये के मामलों का निपटारा आधे दिन बैठने वाली बेंचों पर निर्भर।
  • एनसीएलटी बार एसोसिएशन — वकीलों और वादकारियों के हित में बुनियादी ढांचे व रिक्तियों के मुद्दे को अदालत में उठाया।

क्यों अहम है

एनसीएलटी और एनसीएलएटी में हजारों करोड़ रुपये के दिवाला मामले तय होते हैं, इसलिए वहां आधे दिन बैठने वाली बेंचें और खाली पद सीधे बैंकों की वसूली, ऋण चक्र और अधोसंरचना परियोजनाओं की गति को प्रभावित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी न्यायाधिकरणों को 'सरकार की जीवनरेखा' बताकर बुनियादी ढांचे को आर्थिक मुद्दा बनाती है। यह न्यायाधिकरण सुधार और संस्थागत क्षमता निर्माण पर बहस को फिर केंद्र में लाती है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • एनसीएलटी = राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण; एनसीएलएटी इसका अपीलीय न्यायाधिकरण है।
  • आईबीसी (दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता) के मामले एनसीएलटी/एनसीएलएटी के समक्ष आते हैं।
  • सुनवाई करने वाली पीठ: सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस वी मोहना।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये न्यायाधिकरण 'सरकार की जीवनरेखा' हैं, जहां राष्ट्रीयकृत बैंकों व अधोसंरचना परियोजनाओं के मामले आते हैं।
  • एनसीएलटी बार एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव सेन ने पक्ष रखा।
  • दिल्ली की एनसीएलटी इमारत में छत से रिसाव व सीलन; अधिकतर बेंच आधा दिन ही बैठती हैं।

मेन्स दृष्टिकोण

भारत में न्यायाधिकरण व्यवस्था का उद्देश्य विशेषज्ञता और शीघ्र निपटारा था, लेकिन एनसीएलटी-एनसीएलएटी का मामला दिखाता है कि संस्थागत डिजाइन के साथ भौतिक और मानव संसाधन न जुड़ें तो उद्देश्य विफल हो जाता है। स्रोत के अनुसार जीर्ण-शीर्ण इमारतें, छत से रिसाव, लगातार सीलन, सदस्यों के रिक्त पद और सहायक कर्मचारियों की गंभीर कमी के कारण दिल्ली में अधिकतर बेंच आधा दिन ही बैठ पाती हैं, जबकि रोज हजारों करोड़ रुपये के आईबीसी मामले लंबित रहते हैं। इसका असर केवल न्याय तक पहुंच पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की परिसंपत्ति वसूली, बैंकिंग क्षेत्र की सेहत और अधोसंरचना परियोजनाओं पर भी पड़ता है—इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें 'सरकार की जीवनरेखा' कहा। सीजेआई का प्रश्न—बिना इमारत, स्टाफ, जजमेंट राइटर और पर्याप्त तकनीकी समावेश के संस्था कैसे चलेगी—आगे का रास्ता भी संकेतित करता है: समयबद्ध नियुक्तियां, पर्याप्त सहायक स्टाफ, उपयुक्त भवन और प्रौद्योगिकी का समावेश। स्रोत में सरकार की ओर से किसी घोषणा या समयसीमा का उल्लेख नहीं है।

मुख्य शब्द

एनसीएलटी
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण, जो कंपनी व दिवाला मामलों का निर्णय करता है।
एनसीएलएटी
एनसीएलटी के आदेशों के विरुद्ध अपील सुनने वाला अपीलीय न्यायाधिकरण।
आईबीसी
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, जिसके तहत कर्ज में डूबी कंपनियों के समाधान व परिसमापन के मामले चलते हैं।
एनसीएलटी बार एसोसिएशन
एनसीएलटी में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों का संगठन, जिसने अदालत में बुनियादी ढांचे का मुद्दा उठाया।
जजमेंट राइटर
निर्णय लेखन में सदस्यों/न्यायाधीशों की सहायता करने वाला सहायक कर्मचारी, जिसकी कमी बताई गई।

अभ्यास प्रश्न

  1. एनसीएलटी और एनसीएलएटी में बुनियादी ढांचे की कमी और रिक्तियां आईबीसी के तहत समयबद्ध समाधान के लक्ष्य को कैसे प्रभावित करती हैं? चर्चा करें।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने इन न्यायाधिकरणों को 'सरकार की जीवनरेखा' क्यों कहा? बैंकिंग क्षेत्र और अधोसंरचना परियोजनाओं के संदर्भ में समझाएं।
  3. न्यायाधिकरणों की संस्थागत स्वायत्तता और क्षमता सुनिश्चित करने के लिए कार्यपालिका की जवाबदेही किस प्रकार तय की जा सकती है? मूल्यांकन करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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