कस्तूरीरंगन रिपोर्ट: जनता की राय के बाद सर्वे पर फैसला करेगी कर्नाटक सरकार
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने शुक्रवार को कहा कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के दायरे में आने वाले क्षेत्रों के भौतिक सर्वेक्षण की मांग पर सरकार अधिकारियों से चर्चा कर फैसला लेगी। उडुपी जिले के हेब्री में निवासियों और संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत में उन्होंने कहा कि राज्य का निर्णय 27 सितंबर तक केंद्र को भेजना है। किसानों, सूखे और रिपोर्ट पर चर्चा के लिए तीन दिवसीय विशेष विधानसभा सत्र बुलाया गया है। समिति ने छह राज्यों में 60,000 वर्ग किमी यानी पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत हिस्से को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की थी।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Karnataka CM D K Shivakumar said the government will discuss the demand for a physical survey with officials before deciding. — Directly attributed to Shivakumar at a meeting in Hebri, Udupi district; quotes appear in source.
- Karnataka must send its decision on the Kasturirangan report to the Centre by September 27. — Quoted statement by the Chief Minister; date appears in source.
- The Kasturirangan Committee recommended declaring 37% of the Western Ghats, about 60,000 sq km across six states, as an Eco-Sensitive Area. — Figure appears in source as background; no document or official cited.
- The report covers about 13,000 sq km in Kerala and nearly 20,000 sq km in Karnataka, and a survey could exclude around 5,000 sq km. — Attributed to representatives of organisations at the meeting, not verified by officials in the source.
- Government is considering a uniform 25-year limit under the Forest Rights Act. — Attributed to Shivakumar with direct quote; no further detail given.
विश्लेषकों की राय राय
27 सितंबर की समयसीमा सिर पर होने के बीच मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार का पश्चिमी घाट क्षेत्र में जाकर लोगों की बात सुनना राजनीतिक रूप से सधा हुआ कदम है। अधिकारियों से चर्चा, विधानसभा का विशेष सत्र और फिर केंद्र को भेजा जाने वाला प्रस्ताव — इस रास्ते से वे संरक्षण बनाम आजीविका जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जिम्मेदारी बाँट रहे हैं। "हम भावनाओं की राजनीति नहीं करते" कहते हुए भी भौतिक सर्वेक्षण और विशेषज्ञ समिति की मांग को खारिज न करना स्थानीय दबाव की स्वीकारोक्ति है।
- कर्नाटक का लगभग 20,000 वर्ग किमी क्षेत्र रिपोर्ट के दायरे में बताया जा रहा है, जिससे यह घाट जिलों के मतदाताओं के लिए जमीन, घर और रोजी-रोटी का सीधा मुद्दा बन गया है।
- प्रतिनिधियों का यह तर्क कि केरल जैसी भौतिक जांच से करीब 5,000 वर्ग किमी बाहर हो सकता है, सरकार को जनता के साथ खड़ी दिखने का आसान और बचाव-योग्य रास्ता देता है।
- अंतिम फैसला केंद्र के पास होने से राज्य को दोहरा लाभ है — लोगों की पैरवी का श्रेय, और प्रतिकूल नतीजे की जिम्मेदारी दिल्ली पर।
- किसान, सूखा और इस रिपोर्ट को तीन दिन के विशेष सत्र में एक साथ रखना विपक्ष द्वारा ग्रामीण नाराजगी पर कब्जा करने से पहले मैदान संभालने की कोशिश दिखती है।
- वन अधिकार कानून के तहत एकसमान 25 साल की सीमा और बगैर हुकुम खेती की चर्चा, ईएसए की चिंता के साथ भूमि अधिकार पर भरोसा जोड़ने का प्रयास लगती है।
किस पर नज़र रखें — देखना यह होगा कि विशेष सत्र के पहले दिन की चर्चा और शिवमोग्गा-चिक्कमगलूरु दौरों के बाद 27 सितंबर तक केंद्र को भेजे जाने वाले प्रस्ताव में भौतिक सर्वेक्षण की मांग शामिल होती है या नहीं।
यह खबर यह स्पष्ट नहीं करती कि सरकार भौतिक सर्वेक्षण पर सहमत होगी, केंद्र की प्रतिक्रिया क्या रहेगी, या विपक्ष का रुख क्या है — अभी तक यह विचार करने का आश्वासन है, प्रतिबद्धता नहीं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों पर कर्नाटक में विरोध जारी है। समिति ने छह राज्यों — गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु — में करीब 60,000 वर्ग किमी यानी पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत हिस्से को ESA घोषित करने की सिफारिश की थी, ताकि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बने। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने उडुपी जिले के हेब्री में निवासियों और संगठनों से बातचीत कर उनकी चिंताएँ सुनीं। राज्य को अपना निर्णय 27 सितंबर तक केंद्र को भेजना है।
मुख्य तथ्य
- कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत हिस्से, लगभग 60,000 वर्ग किमी को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की थी।
- यह सिफारिश छह राज्यों — गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु — से जुड़ी है।
- मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार के अनुसार राज्य को अपना निर्णय केंद्र को 27 सितंबर तक भेजना है।
- किसानों, सूखे और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर चर्चा के लिए तीन दिवसीय विशेष विधानसभा सत्र बुलाया गया है; रिपोर्ट पहले दिन चर्चा में आएगी।
- प्रतिनिधियों के अनुसार रिपोर्ट केरल में लगभग 13,000 वर्ग किमी और कर्नाटक में लगभग 20,000 वर्ग किमी को कवर करती है।
- प्रतिनिधियों का दावा है कि केरल जैसा भौतिक सर्वेक्षण कर्नाटक में करने से लगभग 5,000 वर्ग किमी क्षेत्र बाहर हो सकता है।
- प्रतिनिधियों ने कहा कि समिति ने उपग्रह और GPS आधारित मैपिंग पर भरोसा किया, भौतिक सर्वेक्षण नहीं किया।
- वन अधिकार अधिनियम के संदर्भ में सरकार एकसमान 25 वर्ष की सीमा तय करने के प्रस्ताव पर विचार करेगी; अभी कुछ के लिए 25 और कुछ के लिए 75 वर्ष की सीमा है।
समयरेखा
- पूर्व में (तारीख स्रोत में नहीं)कस्तूरीरंगन समिति ने छह राज्यों में 60,000 वर्ग किमी यानी पश्चिमी घाट के 37% को ESA घोषित करने की सिफारिश की।
- पूर्व में (तारीख स्रोत में नहीं)केरल ने उच्चस्तरीय समिति के जरिये भौतिक सर्वेक्षण कराकर आबादी वाले क्षेत्रों को वन क्षेत्रों से अलग किया।
- शुक्रवार (तारीख स्रोत में नहीं)मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने उडुपी के हेब्री में निवासियों व संगठनों के प्रतिनिधियों से बैठक की।
- आगामी दिनों मेंशिवकुमार शिवमोग्गा और चिक्कमगलुरु का दौरा करेंगे; उडुपी में निर्वाचित प्रतिनिधियों से चर्चा करेंगे।
- तीन दिवसीय विशेष सत्र का पहला दिनविधानसभा में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर चर्चा होगी।
- 27 सितंबर तककर्नाटक सरकार को अपना निर्णय केंद्र को भेजना है।
किसका दाँव
- कर्नाटक सरकार / मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार — 27 सितंबर तक केंद्र को निर्णय भेजना; जनभावना और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना।
- पश्चिमी घाट क्षेत्र के निवासी (उडुपी, हेब्री, शिवमोग्गा, चिक्कमगलुरु) — आशंका है कि सिफारिशों के लागू होने से उनके घर और आजीविका प्रभावित होंगे।
- केंद्र सरकार — राज्यों से प्राप्त निर्णयों के आधार पर ESA अधिसूचना पर अंतिम रुख तय करना।
- संगठनों व निर्वाचित प्रतिनिधि — विशेषज्ञ समिति, भौतिक सर्वेक्षण, ज़ोनल प्रबंधन योजना और हेब्री में तालुक अस्पताल की मांग।
- वन विभाग के अधिकारी — मुख्यमंत्री का निर्देश कि वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को परेशान न किया जाए।
- सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) — प्रतिनिधियों के अनुसार सर्वेक्षण के निष्कर्ष आवश्यकता पड़ने पर इनके समक्ष रखे जा सकते हैं।
क्यों अहम है
पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत हिस्से को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का प्रश्न संरक्षण और लाखों लोगों की आजीविका के बीच सीधे टकराव को सामने लाता है। कर्नाटक में करीब 20,000 वर्ग किमी क्षेत्र दायरे में है और 27 सितंबर की समयसीमा से पहले राज्य का रुख केंद्र की अंतिम अधिसूचना को प्रभावित कर सकता है। यह मामला यह भी दिखाता है कि उपग्रह/GPS आधारित मैपिंग और जमीनी भौतिक सर्वेक्षण के बीच अंतर नीतिगत परिणाम बदल सकता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- कस्तूरीरंगन समिति: पश्चिमी घाट के 37% यानी ~60,000 वर्ग किमी को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश।
- प्रभावित छह राज्य: गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु।
- स्रोत के अनुसार रिपोर्ट का दायरा: केरल ~13,000 वर्ग किमी, कर्नाटक ~20,000 वर्ग किमी।
- कर्नाटक को अपना निर्णय केंद्र को 27 सितंबर तक भेजना है।
- वन अधिकार अधिनियम: कर्नाटक एकसमान 25 वर्ष की सीमा के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है (वर्तमान में 25 व 75 वर्ष)।
- बगैर हुकुम कृषि: खेती करने वालों को भूमि देने से जुड़ी राज्य सरकार की पहल।
मेन्स दृष्टिकोण
कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिश पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत (लगभग 60,000 वर्ग किमी) को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर संरक्षण और विकास में संतुलन साधने का प्रयास है, लेकिन कर्नाटक में इसका विरोध इस बात से उभरा है कि सीमांकन उपग्रह और GPS आधारित मैपिंग पर आधारित है, भौतिक सर्वेक्षण पर नहीं। प्रतिनिधियों का तर्क है कि इससे आबादी वाले गाँव भी दायरे में आ गए और 20 प्रतिशत से कम संरक्षित वन आवरण वाले क्षेत्र भी शामिल हुए, जिससे घरों व आजीविका पर असर की आशंका है; केरल ने उच्चस्तरीय समिति से भौतिक सर्वेक्षण कराकर आबादी वाले क्षेत्रों को अलग किया, और कर्नाटक में ऐसा करने से ~5,000 वर्ग किमी बाहर हो सकता है। सरकार का रुख विशेषज्ञ समिति, भौतिक सर्वेक्षण, ज़ोनल प्रबंधन योजना जैसी मांगों पर अधिकारियों से चर्चा और विधानसभा में बहस के बाद 27 सितंबर तक केंद्र को निर्णय भेजने का है। आगे का रास्ता — जनसुनवाई के साथ वैज्ञानिक आकलन को जोड़ना, वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में एकरूपता, और निष्कर्षों को केंद्र तथा आवश्यकता पड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय व NGT के समक्ष रखना।
मुख्य शब्द
- कस्तूरीरंगन समिति रिपोर्ट
- पश्चिमी घाट के 37% (~60,000 वर्ग किमी) को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश करने वाली रिपोर्ट।
- पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESA)
- वह घोषित क्षेत्र जहाँ पर्यावरण संरक्षण और विकास में संतुलन के लिए विशेष प्रावधान लागू होते हैं।
- भौतिक सर्वेक्षण
- जमीनी स्तर पर सीमांकन; प्रतिनिधियों के अनुसार समिति ने इसके बजाय उपग्रह व GPS मैपिंग का सहारा लिया।
- वन अधिकार अधिनियम
- वन क्षेत्रों में रहने वालों के अधिकारों से जुड़ा कानून; कर्नाटक एकसमान 25 वर्ष की सीमा पर विचार कर रहा है।
- बगैर हुकुम कृषि
- खेती कर रहे लोगों को भूमि देने से संबंधित राज्य सरकार की पहल, जैसा मुख्यमंत्री ने बताया।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)
- पर्यावरण मामलों का अधिकरण, जिसके समक्ष प्रतिनिधियों ने आवश्यकता पड़ने पर निष्कर्ष रखने की बात कही।
अभ्यास प्रश्न
- पश्चिमी घाट को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की कस्तूरीरंगन सिफारिशों पर स्थानीय विरोध के कारणों की समीक्षा करें। संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन कैसे साधा जा सकता है?
- उपग्रह/GPS आधारित मैपिंग और भौतिक सर्वेक्षण के बीच अंतर पर्यावरणीय सीमांकन के परिणामों को कैसे बदल सकता है? केरल और कर्नाटक के अनुभव के आधार पर चर्चा करें।
- केंद्र-राज्य संबंधों के परिप्रेक्ष्य में परखें कि पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र की अधिसूचना में राज्यों की राय और समयसीमा की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
