वाम धर्म का नहीं, धार्मिक थोपने का विरोधी: माकपा नेता सलीम
माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव मोहम्मद सलीम ने रविवार को कोलकाता के एस्प्लेनेड में डीवाईएफआई रैली में आरोप लगाया कि भाजपा बंगालियों की जीवनशैली तय करने और लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि वाम धर्म का नहीं, धार्मिक थोपने का विरोध करता है। ममता बनर्जी पर भी धर्म का राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग का आरोप लगाया। 2026 में सत्ता में आई भाजपा ने बेरोजगार युवाओं, छात्रों और किसानों पर युद्ध छेड़ा है तथा लाल झंडा धारकों पर 85,000 से अधिक झूठे मुकदमे दर्ज किए गए, उन्होंने कहा।
स्रोत
Left (CPI-M) · मूल ख़बर पढ़ें ↗
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- CPI(M) leader Mohammed Salim said the Left opposes religious imposition, not religion. — Directly quoted and attributed to Salim at a DYFI rally at Esplanade, Kolkata.
- Salim referred to Bageshwar Dham head priest Dhirendra Krishna Shastri's remarks on eating non-vegetarian food during Durga Puja. — Attributed as the reporter's contextual explanation of Salim's comment; the remarks themselves are not quoted in the source.
- More than 85,000 false cases have been lodged against Red flag holders. — Figure appears in the source as Salim's own claim; no official or independent corroboration given.
- BJP came to power in West Bengal in 2026 and Suvendu Adhikari is Chief Minister. — Stated in the source text; presented as background without separate attribution.
- Salim alleged Mamata Banerjee used religion for political mileage and tried to rewrite Bengal's history. — Allegation attributed to Salim; no response from Banerjee or TMC included in the source.
विश्लेषकों की राय राय
बंगाल में सत्ता बीजेपी के हाथ में जाने के बाद सलीम का भाषण वाम दलों के लिए एक अलग राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश दिखता है — "धर्म के विरोधी नहीं, धार्मिक थोपने के विरोधी" के फॉर्मूले पर। बीजेपी के साथ-साथ ममता बनर्जी पर भी वही आरोप लगाकर वे संकेत दे रहे हैं कि वाम दल तृणमूल की जगह मुख्य विपक्ष बनना चाहते हैं। युवा संगठन डीवाईएफआई के मंच से रोजगार, स्कूल और किसानों के मुद्दे उठाना बहस को धर्म से हटाकर रोजी-रोटी और जवाबदेही पर लाने की सोची-समझी चाल है।
- धर्म-विरोधी होने की छवि वाम दलों के लिए पुरानी अड़चन रही है, और इस बयान का मुख्य मकसद उसी ठप्पे को हटाना है।
- बीजेपी और तृणमूल दोनों को एक ही कटघरे में रखकर वाम दल खुद को दोनों की सांप्रदायिक राजनीति के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं।
- अगले कुछ महीनों में होने वाले नगर निकाय चुनाव तत्काल लक्ष्य हैं, और "ट्रिपल इंजन" वाला तंज सत्तारूढ़ दल के विस्तार के खिलाफ प्रचार का ढांचा तैयार करता है।
- बेरोजगारी, शिक्षकों की नियुक्ति और स्कूल बंद होने के मुद्दे उठाना नई सरकार को चुनावी वादों पर घेरकर युवा मतदाताओं को लौटाने की कोशिश है।
- 85,000 से अधिक झूठे मुकदमों का दावा कार्यकर्ताओं को दबाव में भी कानूनी लड़ाई लड़ने का नैतिक आधार देने की कोशिश लगता है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि वाम दल नगर निकाय चुनाव अकेले लड़ते हैं या विपक्षी वोट बंटने से बचाने के लिए किसी तालमेल की ओर बढ़ते हैं, क्योंकि उसी से उनके पुनरुद्धार की संभावना तय होगी।
ये एक पार्टी नेता के रैली में लगाए आरोप हैं; खबर में मुकदमों की संख्या या स्कूल बंद होने पर बीजेपी या तृणमूल की प्रतिक्रिया नहीं है, और वाम समर्थन बढ़ने का कोई प्रमाण भी नहीं है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
पश्चिम बंगाल में 2026 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद राज्य की राजनीति में धर्म, संस्कृति और आजीविका के मुद्दों पर टकराव तेज हुआ है। माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव मोहम्मद सलीम ने रविवार को कोलकाता के एस्प्लेनेड में पार्टी की युवा शाखा डीवाईएफआई की रैली में भाजपा पर बंगालियों की जीवनशैली तय करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी राजनीतिक लाभ के लिए धर्म के इस्तेमाल का आरोप दोहराया। सलीम का मुख्य तर्क यह रहा कि वाम धर्म का विरोधी नहीं, बल्कि "धार्मिक थोपने" का विरोधी है।
मुख्य तथ्य
- माकपा नेता मोहम्मद सलीम ने रविवार को मध्य कोलकाता के एस्प्लेनेड में डीवाईएफआई (माकपा की युवा शाखा) की रैली को संबोधित किया; रिपोर्ट 20 सितंबर 2026 को अद्यतन।
- सलीम ने कहा, "हम धर्म के विरोधी नहीं हैं... हम धार्मिक थोपने के विरोधी हैं।"
- उन्होंने बागेश्वर धाम के मुख्य पुजारी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार पर की गई टिप्पणियों का संदर्भ दिया।
- सलीम का आरोप: भाजपा 2026 में बंगाल में सत्ता में आने के बाद "डबल इंजन सरकार" के नाम पर बेरोजगार युवाओं, छात्रों, विश्वविद्यालयों, फेरीवालों, छोटे व्यापारियों, श्रमिकों और किसानों पर युद्ध छेड़ चुकी है।
- उनके अनुसार लाल झंडा धारकों (वामपंथियों) के खिलाफ 85,000 से अधिक झूठे मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
- सलीम ने कहा कि नगरपालिका चुनाव अगले कुछ महीनों में होने हैं और भाजपा उन्हें जीतकर "ट्रिपल इंजन सरकार" बनाने की कोशिश कर रही है।
- उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नौकरी गंवाने वाले आंदोलनकारी शिक्षकों से नौकरी का वादा किया था, लेकिन अब स्कूल बंद करने का इरादा है।
- सलीम का कहना है कि भाजपा देश और पश्चिम बंगाल का इतिहास दोबारा लिखने की कोशिश कर रही है, जैसा ममता बनर्जी ने भी किया— मानो बंगाल की कहानी 2011 में तृणमूल के सत्ता में आने से शुरू हुई।
समयरेखा
- 2011तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई; सलीम का आरोप कि इतिहास को इस तरह पेश किया गया मानो बंगाल की कहानी यहीं से शुरू हुई।
- 2026भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई; शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री, ममता बनर्जी पूर्व मुख्यमंत्री।
- रविवार (रिपोर्ट 20 सितंबर 2026 को अद्यतन)एस्प्लेनेड, कोलकाता में डीवाईएफआई रैली में सलीम का भाषण; भाजपा और ममता बनर्जी पर धर्म के राजनीतिक उपयोग का आरोप।
- अगले कुछ महीनों में (प्रस्तावित)नगरपालिका चुनाव होने हैं, जिन्हें जीतकर भाजपा "ट्रिपल इंजन सरकार" बनाना चाहती है, सलीम के अनुसार।
किसका दाँव
- माकपा (सीपीआई-एम) और उसकी युवा शाखा डीवाईएफआई — वाम राजनीति की पुनर्वापसी; धार्मिक थोपने के विरोध और रोजगार-शिक्षा के मुद्दों पर अपनी जगह बनाना।
- मोहम्मद सलीम, माकपा पश्चिम बंगाल इकाई सचिव — वाम की वैचारिक स्थिति स्पष्ट करना— धर्म का विरोध नहीं, थोपने का विरोध; कार्यकर्ताओं पर मुकदमों का मुद्दा उठाना।
- भाजपा और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी — 2026 में किए वादों— विशेषकर नौकरी गंवाने वाले शिक्षकों से— पर जवाबदेही; आगामी नगरपालिका चुनाव।
- ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस — सत्ता गंवाने के बाद धर्म के राजनीतिक उपयोग और इतिहास-लेखन के आरोपों का सामना।
- बेरोजगार युवा, छात्र, फेरीवाले, छोटे व्यापारी, श्रमिक और किसान — रोजगार, स्कूल-कॉलेज, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा; सलीम के अनुसार इन पर "युद्ध" छेड़ा गया है।
- धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर धाम) — दुर्गा पूजा में मांसाहार पर उनकी टिप्पणी बंगाल की खान-पान व सांस्कृतिक स्वायत्तता की बहस के केंद्र में।
क्यों अहम है
यह बहस धर्म और राज्य के संबंध पर है— सरकार का काम धर्म का प्रचार है या स्कूल-कॉलेज चलाना, रोजगार देना, ढांचा बनाना और सामाजिक सुरक्षा देना। बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद खान-पान व जीवनशैली जैसे सांस्कृतिक प्रश्न चुनावी ध्रुवीकरण का औजार बनते दिख रहे हैं, और वाम इसे रोजगार-शिक्षा की जवाबदेही की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहा है। कार्यकर्ताओं पर 85,000 से अधिक "झूठे मुकदमों" का दावा राजनीतिक विरोध की जगह और लोकतांत्रिक मानकों का सवाल भी उठाता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- मोहम्मद सलीम— माकपा (सीपीआई-एम) की पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव।
- डीवाईएफआई— माकपा की युवा शाखा; रैली मध्य कोलकाता के एस्प्लेनेड में हुई।
- भाजपा पश्चिम बंगाल में 2026 में सत्ता में आई; शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बताए गए।
- तृणमूल कांग्रेस 2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई थी।
- सलीम का दावा— लाल झंडा धारकों पर 85,000 से अधिक झूठे मुकदमे।
- "डबल इंजन" और "ट्रिपल इंजन" सरकार— केंद्र-राज्य तथा नगरपालिका स्तर पर एक ही दल के शासन का मुहावरा।
मेन्स दृष्टिकोण
पश्चिम बंगाल का यह प्रकरण भारतीय राजनीति के दो स्थायी प्रश्नों को एक साथ उठाता है— राज्य और धर्म के बीच की रेखा, तथा सांस्कृतिक पहचान का चुनावी उपयोग। सलीम का तर्क यह है कि वाम धर्म का विरोधी नहीं, बल्कि "धार्मिक थोपने" का विरोधी है, और सरकार का दायित्व धर्म-प्रचार नहीं बल्कि शिक्षा, रोजगार, अधोसंरचना और सामाजिक सुरक्षा है; दुर्गा पूजा में मांसाहार पर बाहरी धर्मगुरु की टिप्पणी को वे बंगाल की जीवनशैली तय करने की कोशिश बताते हैं। दूसरी ओर वे तृणमूल को भी दोषमुक्त नहीं करते— आरोप है कि ममता बनर्जी ने भी राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का उपयोग किया और इतिहास को 2011 से शुरू होता दिखाया, यानी ध्रुवीकरण किसी एक दल की परिघटना नहीं। इसका व्यावहारिक निहितार्थ यह है कि सत्ता परिवर्तन के बाद बेरोजगार युवाओं, छात्रों, फेरीवालों, छोटे व्यापारियों, श्रमिकों और किसानों से जुड़े वादों पर जवाबदेही— विशेषकर नौकरी गंवाए शिक्षकों का मुद्दा— सांस्कृतिक विवादों में दब सकती है, और आगामी नगरपालिका चुनाव इस प्रतिस्पर्धा का अगला मैदान हैं। आगे का रास्ता यही दिखता है जिसे सलीम स्वयं रेखांकित करते हैं: कानून के दायरे में, लोकतांत्रिक मानकों का पालन करते हुए राजनीतिक लड़ाई, और शासन के प्रदर्शन-आधारित मुद्दों पर बहस— जबकि कार्यकर्ताओं पर मुकदमों के आरोप असहमति की जगह की रक्षा का प्रश्न बने रहते हैं।
मुख्य शब्द
- माकपा / सीपीआई-एम
- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी); मोहम्मद सलीम इसकी पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव हैं।
- डीवाईएफआई
- माकपा की युवा शाखा, जिसकी रैली एस्प्लेनेड, कोलकाता में हुई।
- धार्मिक थोपना (religious imposition)
- राज्य या संगठनों द्वारा किसी धार्मिक आचरण/जीवनशैली को लोगों पर लादना— सलीम के अनुसार वाम इसी का विरोधी है।
- डबल इंजन सरकार
- केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार का राजनीतिक मुहावरा; सलीम इसके नाम पर वर्गों पर "युद्ध" का आरोप लगाते हैं।
- ट्रिपल इंजन सरकार
- केंद्र-राज्य के साथ नगर निकायों में भी एक ही दल का शासन; सलीम के अनुसार भाजपा का आगामी नगरपालिका चुनाव लक्ष्य।
- बागेश्वर धाम
- वह धार्मिक स्थल जिसके मुख्य पुजारी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की दुर्गा पूजा में मांसाहार संबंधी टिप्पणी विवाद का कारण बनी।
अभ्यास प्रश्न
- "सरकार का काम धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा देना है"— पश्चिम बंगाल के हाल के राजनीतिक विवाद के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए।
- सांस्कृतिक पहचान और खान-पान जैसे प्रश्न चुनावी ध्रुवीकरण के औजार कैसे बनते हैं? बंगाल के उदाहरण से समझाइए।
- राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर बड़े पैमाने पर मुकदमों के आरोप लोकतांत्रिक असहमति की जगह के लिए क्या चुनौती पेश करते हैं? चर्चा कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
