गोराडा के किसानों ने रासायनिक खाद छोड़ने की शपथ ली

पार्वतीपुरम-मन्यम जिले के गुम्मलक्ष्मीपुरम मंडल स्थित गोराडा गांव के निवासियों ने खेती से रासायनिक खाद और कीटनाशक हटाने का प्रस्ताव पारित किया। एपी रायथु साधिकार संस्था (एपी-आरवाईएसएस) और गैर सरकारी संगठन जट्टू ट्रस्ट के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में किसानों ने शत-प्रतिशत प्राकृतिक खेती की शपथ ली। यूरिया खरीद चुके चार किसानों ने उसे पानी में घोल दिया और जीवामृतम तैयार किया। 2018 में शुरू हुआ बायो-विलेज अभियान अब 242 गांवों, 93 बायो-विलेज, 65,000 एकड़ और 55,000 से अधिक किसानों तक पहुंच चुका है।

स्रोत

Parvathipuram Manyam — news · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (4)
  • Gorada village in Gummalaxmipuram mandal passed a resolution to eliminate chemical fertilisers and pesticides. — Stated in source and confirmed in a quote by Bio-Village coordinator P Uma Maheshwari.
  • Four farmers who had bought urea dissolved it in water as a symbolic act. — Appears in source narrative; no separate official confirmation given.
  • Natural farming now covers 242 villages, including 93 bio-villages, 65,000 acres and over 55,000 farmers. — Figures appear in source, presented in the context of the AP-RySS programme; no document cited.
  • Zero Budget Natural Farming was introduced in 2016 with the Union government; Bio-Village campaign launched in 2018 at Kondabaridi. — Dates appear in source; village name spelt both Kondabariki and Kondabaridi, an internal inconsistency to check.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

गोराडा का प्रस्ताव मूल रूप से लागत घटाने का फैसला है। रासायनिक खाद और कीटनाशक छोड़ने से किसान की नगद लागत घटती है, जो छोटे आदिवासी जोतों को कर्ज और अस्थिर इनपुट कीमतों से कुछ राहत देती है। लेकिन आय केवल लागत से तय नहीं होती — उपज पर क्या असर पड़ेगा और उत्पाद को ऊंचा दाम मिलेगा या नहीं, यह इस खबर में स्थापित नहीं है। खबर खुद कहती है कि पिछले कुछ वर्षों में किसान उपज बढ़ाने के लिए फिर रसायनों की ओर लौटे थे — यही इस संकल्प की असली आर्थिक परीक्षा है।

  • तत्काल लाभ इनपुट खर्च में कमी है: जीवामृतम जैसे घरेलू इनपुट नगद लागत की जगह श्रम लागत लाते हैं, यानी पैसा बचता है पर काम का बोझ बढ़ सकता है।
  • सस्ता इनपुट अपने आप ज्यादा कमाई नहीं है — उपज गिरे तो शुद्ध आय घट सकती है, और यहां उपज या आय के कोई आंकड़े नहीं दिए गए।
  • 242 गांव, 65,000 एकड़ और 55,000 से अधिक किसानों का पैमाना छोटा नहीं है: इससे स्थानीय खाद-कीटनाशक कारोबार की मांग घट सकती है और राज्य पर सब्सिडी का बोझ हल्का हो सकता है।
  • खरीदी हुई यूरिया को पानी में घोलना प्रतीकात्मक रूप से मजबूत है, पर यह सब्सिडी वाले इनपुट का नुकसान भी है — यानी प्रतिबद्धता की अपनी कीमत है।
  • बीते वर्षों में रसायनों की ओर वापसी यह संकेत देती है कि मूल्य प्रोत्साहन या पक्के बाजार के बिना ऐसे संकल्प टिकाना कठिन है।

किस पर नज़र रखें — अगले दो-तीन सीजन में गोराडा और मूलीगुडा में उपज और शुद्ध आय कैसी रहती है, और प्राकृतिक उत्पादों के लिए अलग बाजार या प्रीमियम दाम बनता है या नहीं — इस पर नजर रखें।

यह खबर उपज, कीमतों या किसान की शुद्ध आय पर कोई आंकड़ा नहीं देती, और यह भी स्पष्ट नहीं करती कि कितने किसानों ने शपथ ली या कितने रकबे पर यह बदलाव लागू होगा।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 7 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम-मन्यम जिले के गुम्मलक्ष्मीपुरम मंडल के गोराडा गांव के निवासियों ने खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल को पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव पारित किया है। यह पहल एपी रायथु साधिकार संस्था (एपी-आरवाईएसएस) और स्थानीय गैर सरकारी संगठन जट्टू ट्रस्ट के 'बायो-विलेज' अभियान का हिस्सा है, जो 2018 में कोंडाबरिडी गांव से शुरू हुआ था। राज्य सरकार ने केंद्र के सहयोग से 2016 में शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) की शुरुआत की थी। पिछले कुछ वर्षों में उपज बढ़ाने के लिए किसानों के फिर से रासायनिक उपादानों की ओर लौटने की प्रवृत्ति को पलटने के लिए यह अभियान पुनर्जीवित किया गया है।

मुख्य तथ्य

  • गोराडा गांव (गुम्मलक्ष्मीपुरम मंडल, पार्वतीपुरम-मन्यम जिला) ने खेती से रासायनिक खाद व कीटनाशक हटाने का प्रस्ताव पारित किया।
  • एपी-आरवाईएसएस और जट्टू ट्रस्ट के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में कई किसानों ने 100% प्राकृतिक खेती की शपथ ली।
  • यूरिया खरीद चुके चार किसानों ने प्रतीकात्मक रूप से उसे पानी में घोल दिया और विकल्प के रूप में जीवामृतम तैयार किया।
  • सरकार ने केंद्र सरकार के सहयोग से 2016 में शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) शुरू की थी।
  • जिला प्रशासन ने अविभाजित विजयनगरम जिले के कोंडाबरिकी गांव से शुरुआत की, जिसमें 50 गांवों के 3,161 किसान शामिल थे।
  • पहल अब 242 गांवों तक पहुंची है, जिनमें 93 बायो-विलेज शामिल हैं, 65,000 एकड़ क्षेत्र और 55,000 से अधिक किसान जुड़े हैं।
  • 'बायो-विलेज' अभियान मूल रूप से 2018 में कोंडाबरिडी गांव में शुरू किया गया था और अब नए बने पार्वतीपुरम-मन्यम जिले में पुनर्जीवित किया गया है।
  • गांव स्तर पर महिला स्वयं सहायता समूहों, किसानों और युवाओं वाली बायो-कमेटियां बनाई गईं; ग्राम सभाएं और पारंपरिक कलाओं से जागरूकता फैलाई जा रही है।

समयरेखा

  1. 2016राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के सहयोग से शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) की शुरुआत की।
  2. 2018कोंडाबरिडी गांव में 'बायो-विलेज' आंदोलन की शुरुआत।
  3. प्रारंभिक चरण (तिथि स्रोत में नहीं)अविभाजित विजयनगरम जिले के कोंडाबरिकी गांव में 50 गांवों के 3,161 किसानों के साथ प्राकृतिक खेती शुरू।
  4. पिछले कुछ वर्षउपज बढ़ाने के लिए कई किसान फिर से रासायनिक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग करने लगे।
  5. हाल के दिनों मेंएपी-आरवाईएसएस व जट्टू ट्रस्ट ने बायो-कमेटियां बनाईं, ग्राम सभाएं और पारंपरिक कला के जरिये जागरूकता अभियान चलाया।
  6. हाल की ग्राम सभामूलीगुडा और गोराडा जैसी सीमावर्ती बस्तियों ने प्राकृतिक खेती अपनाई; चार किसानों ने यूरिया घोलकर शपथ ली।
  7. 01 सितंबर 2026 (रिपोर्ट अद्यतन)गोराडा के निवासियों द्वारा रासायनिक उपादान न इस्तेमाल करने का प्रस्ताव पारित करने की खबर प्रकाशित।

किसका दाँव

  • गोराडा और मूलीगुडा के किसान — उपादान लागत में कमी और मिट्टी की सेहत का लाभ, लेकिन रासायनिक खाद छोड़ने पर उपज का जोखिम।
  • एपी रायथु साधिकार संस्था (एपी-आरवाईएसएस) — राज्य में प्राकृतिक खेती के विस्तार और बायो-विलेज मॉडल की सफलता की जिम्मेदारी।
  • जट्टू ट्रस्ट (गैर सरकारी संगठन) — जमीनी स्तर पर जागरूकता, बायो-कमेटी गठन और अभियान के क्रियान्वयन में साझेदार।
  • महिला स्वयं सहायता समूह (SHGs), किसान व युवा — गांव स्तर की बायो-कमेटियों के सदस्य के रूप में अभियान की निरंतरता बनाए रखना।
  • जिला प्रशासन, पार्वतीपुरम-मन्यम — नए बने जिले में 93 बायो-विलेज और 65,000 एकड़ के दायरे को बढ़ाना व बनाए रखना।
  • बायो-विलेज समन्वयक पी उमा माहेश्वरी — ग्राम सभाओं के जरिये जागरूकता और मन्यम जिले को बायो-विलेज बनाने का लक्ष्य।

क्यों अहम है

यह घटना दिखाती है कि प्राकृतिक खेती की सफलता केवल योजना घोषित करने से नहीं, बल्कि गांव स्तर पर सामूहिक निर्णय और निरंतर जागरूकता से तय होती है — क्योंकि पिछले वर्षों में कई किसान उपज बढ़ाने के लिए रसायनों की ओर लौट गए थे। स्रोत के अनुसार प्राकृतिक खेती उपादान लागत घटाती है, संसाधनों का संरक्षण करती है और जलवायु संबंधी जोखिम कम करती है। आदिवासी क्षेत्रों में 242 गांवों और 55,000 से अधिक किसानों तक पहुंचा यह मॉडल अन्य जिलों के लिए संदर्भ बिंदु बन सकता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) आंध्र प्रदेश में 2016 में केंद्र सरकार के सहयोग से शुरू की गई।
  • एपी रायथु साधिकार संस्था (एपी-आरवाईएसएस) आंध्र प्रदेश में प्राकृतिक खेती कार्यक्रम की क्रियान्वयन संस्था है।
  • 'बायो-विलेज' अभियान 2018 में कोंडाबरिडी गांव से शुरू हुआ था।
  • वर्तमान प्रसार: 242 गांव, 93 बायो-विलेज, 65,000 एकड़, 55,000 से अधिक किसान।
  • प्रारंभिक चरण: अविभाजित विजयनगरम जिले के कोंडाबरिकी में 50 गांवों के 3,161 किसान।
  • जीवामृतम — प्राकृतिक खेती में रासायनिक खाद के विकल्प के रूप में तैयार किया जाने वाला जैविक उपादान।

मेन्स दृष्टिकोण

गोराडा गांव का प्रस्ताव भारत में प्राकृतिक खेती के संक्रमण की केंद्रीय चुनौती को उजागर करता है: नीति स्तर पर ZBNF 2016 से लागू है और आंध्र प्रदेश में एपी-आरवाईएसएस के नेतृत्व में यह 242 गांवों, 65,000 एकड़ और 55,000 से अधिक किसानों तक फैली है, फिर भी पिछले कुछ वर्षों में अधिक उपज की चाह में किसान रासायनिक खाद व कीटनाशकों की ओर लौटते रहे। इसके कारणों में उपज-सुरक्षा की चिंता, व्यक्तिगत निर्णय पर पड़ोसी खेतों का प्रभाव और निरंतर हैंडहोल्डिंग की कमी शामिल हैं — इसीलिए हस्तक्षेप का स्वरूप व्यक्तिगत से सामूहिक (ग्राम सभा प्रस्ताव, बायो-विलेज) की ओर बढ़ा है। निहितार्थ दोहरे हैं: उपादान लागत में कमी से शुद्ध आय बढ़ने की संभावना, और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व जलवायु जोखिम में कमी जैसे पारिस्थितिक लाभ, जो विशेष रूप से आदिवासी व सीमावर्ती बस्तियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। आगे का रास्ता स्रोत में वर्णित तत्वों पर ही आधारित दिखता है — महिला स्वयं सहायता समूहों, किसानों और युवाओं वाली गांव स्तरीय बायो-कमेटियां, ग्राम सभाओं के जरिये सामूहिक संकल्प, पारंपरिक कलाओं से संवाद, और जीवामृतम जैसे सुलभ विकल्पों की स्थानीय तैयारी, ताकि संकल्प स्थायी व्यवहार परिवर्तन में बदल सके।

मुख्य शब्द

एपी रायथु साधिकार संस्था (एपी-आरवाईएसएस)
आंध्र प्रदेश की वह संस्था जिसके तत्वावधान में राज्य में प्राकृतिक खेती व बायो-विलेज कार्यक्रम चलाया जाता है।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF)
2016 में केंद्र सरकार के सहयोग से शुरू की गई खेती पद्धति, जिसमें बाहरी रासायनिक उपादानों पर खर्च न्यूनतम रखा जाता है।
बायो-विलेज अभियान
2018 में कोंडाबरिडी से शुरू हुआ आंदोलन, जिसमें पूरा गांव सामूहिक रूप से रसायन-मुक्त खेती अपनाता है; अब 93 बायो-विलेज बने हैं।
जीवामृतम
प्राकृतिक/जैविक उपादान, जिसे किसान रासायनिक खाद के विकल्प के रूप में स्वयं तैयार करते हैं।
जट्टू ट्रस्ट
स्थानीय गैर सरकारी संगठन, जो एपी-आरवाईएसएस के साथ मिलकर बायो-विलेज अभियान को जमीनी स्तर पर चला रहा है।
बायो-कमेटी
गांव स्तर की समिति, जिसमें महिला स्वयं सहायता समूह, किसान और युवा शामिल होते हैं और जो अभियान की गति बनाए रखती है।

अभ्यास प्रश्न

  1. आंध्र प्रदेश के 'बायो-विलेज' मॉडल के उदाहरण से समझाइए कि प्राकृतिक खेती को अपनाने में सामूहिक ग्राम-स्तरीय निर्णय व्यक्तिगत प्रयासों से अधिक प्रभावी क्यों हो सकते हैं।
  2. शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) किसानों की उपादान लागत और जलवायु जोखिम को कैसे प्रभावित करती है? आंध्र प्रदेश के अनुभव के आधार पर चर्चा करें।
  3. किसान उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद व कीटनाशकों की ओर वापस क्यों लौटते हैं, और इस प्रवृत्ति को पलटने के लिए संस्थागत तंत्र क्या भूमिका निभा सकते हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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